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डार्क मोड

यूपी में बिजली सिस्टम के लिए EV बन रहे आफत

यूपी में 15 लाख से अधिक इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की रात में होने वाली चार्जिंग से पीक बिजली मांग बढ़ रही है जबकि अनधिकृत चार्जिंग और कमजोर वितरण नेटवर्क व्यवस्था के लिए नई चुनौती बन गए हैं

India's Rs 500 Crore EMPS 2024 Scheme Boosts Electric Mobility, Provides Subsidies for E-Vehicles
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 6 जुलाई , 2026

उत्तर प्रदेश में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) का विस्तार जितनी तेजी से हो रहा है, उतनी ही तेजी से बिजली व्यवस्था के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी हो रही हैं. कभी ई-रिक्शा और इलेक्ट्रिक स्कूटर को केवल सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल परिवहन माना जाता था लेकिन अब यही वाहन राज्य के बिजली तंत्र के लिए नई परीक्षा बन गए हैं. 

बिजली विभाग के आकलन के मुताबिक, शाम और रात के समय केवल इलेक्ट्रिक वाहनों की चार्जिंग से करीब 2,000 मेगावाट अतिरिक्त पीक लोड पैदा हो रहा है. यह वही समय है जब घरों में एयर कंडीशनर, कृषि क्षेत्र के ट्यूबवेल और घरेलू उपकरण भी पूरी क्षमता से चल रहे होते हैं, जबकि सौर ऊर्जा का उत्पादन पूरी तरह बंद हो चुका होता है.

उत्तर प्रदेश में अभी 15 लाख से अधिक EV रजिस्टर्ड हैं. इनमें 12 लाख से ज्यादा कमर्शियल वाहन हैं और सबसे बड़ी संख्या ई-रिक्शा की है. चूंकि अधिकांश ई-रिक्शा पूरे दिन सड़कों पर चलते हैं, इसलिए उनकी चार्जिंग रात में शुरू होती है. नतीजा यह है कि रात नौ बजे से आधी रात के बीच बिजली की मांग अचानक बढ़ जाती है. इसी दौरान प्रदेश की कुल पीक डिमांड लगभग 32,000 मेगावाट तक पहुंच रही है, जिससे वितरण व्यवस्था पर दबाव लगातार बढ़ रहा है.

चार्जिंग का समय बना सबसे बड़ी चुनौती

बिजली विभाग के अधिकारियों का कहना है कि समस्या केवल इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या नहीं बल्कि उनके चार्जिंग पैटर्न की है. अधिकांश वाहन चालक सस्ती घरेलू बिजली का उपयोग करते हुए रात में एक साथ वाहन चार्ज करते हैं. गांवों और छोटे शहरों में बड़ी संख्या में चार्जिंग अनधिकृत या अस्थाई कनेक्शनों से होती है. इससे किसी एक मोहल्ले या ट्रांसफार्मर पर अचानक अत्यधिक लोड आ जाता है. ई-रिक्शा इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. आमतौर पर एक ई-रिक्शा में 3 से 5 किलोवाट-घंटे क्षमता की बैटरी होती है, जिसे पूरी तरह चार्ज करने में 3 से 5 यूनिट बिजली लगती है. यदि चालक प्रतिदिन चार्जिंग करता है तो महीने में 90 से 150 यूनिट बिजली केवल वाहन पर खर्च होती है.

कई चालक दो बार भी चार्जिंग करते हैं जिससे बिजली की मांग और बढ़ जाती है. इलेक्ट्रिक स्कूटर और मोटरसाइकिलों की बैटरी अपेक्षाकृत छोटी होती है लेकिन उनकी संख्या तेजी से बढ़ रही है. वहीं इलेक्ट्रिक कारों में 25 से 80 किलोवाट-घंटे तक की बैटरियां होती हैं. एक बार पूरी तरह चार्ज करने में 25 से 80 यूनिट बिजली तक खर्च हो सकती है. यदि लाखों वाहन लगभग एक ही समय चार्ज होने लगें तो वितरण नेटवर्क पर उसका असर स्वाभाविक है.

यूपी पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) द्वारा यूपी इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन को उपलब्ध कराए गए आंकड़े बताते हैं कि स्वीकृत EV लोड 2024-25 में 76,376 किलोवाट था जो 2025-26 में बढ़कर 1,23,009 किलोवाट और 2026-27 में 1,83,779 किलोवाट तक पहुंच गया. यानी केवल एक वर्ष में लगभग 61 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. बिजली अधिकारियों के अनुसार यह सभी उपभोक्ता श्रेणियों में सबसे तेजी से बढ़ने वाला नया लोड है.

EV अकेले जिम्मेदार नहीं लेकिन सबसे तेजी से बढ़ती चुनौती

बिजली विभाग यह भी स्वीकार करता है कि बढ़ती मांग का कारण केवल इलेक्ट्रिक वाहन नहीं हैं. सबसे बड़ा योगदान घरेलू एयर कंडीशनरों का है. कूलर की जगह तेजी से AC अपनाए जाने से अकेले लगभग 5,000 मेगावाट अतिरिक्त पीक लोड बढ़ने का अनुमान लगाया गया है. इसके अलावा कृषि क्षेत्र भी बिजली का बड़ा उपभोक्ता बन चुका है. प्रदेश में लगभग 15 लाख निजी ट्यूबवेल हैं. इनमें से बड़ी संख्या अभी भी घरेलू फीडरों से जुड़ी है क्योंकि कृषि फीडरों का पृथक्करण पूरी तरह नहीं हो पाया है. ऐसे में जब शाम को घरेलू आपूर्ति बढ़ती है तो ट्यूबवेल भी उसी समय चलते हैं और ग्रिड पर दबाव और बढ़ जाता है. हाल के महीनों में घरेलू बिजली उपयोग का स्वरूप भी बदला है.

कुछ क्षेत्रों में एलपीजी आपूर्ति प्रभावित होने के दौरान लोगों ने खाना बनाने के लिए इंडक्शन कुकर और अन्य इलेक्ट्रिक उपकरणों का अधिक उपयोग किया. इससे भी शाम के समय बिजली की मांग में वृद्धि दर्ज की गई. इसी बीच इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री लगातार रिकॉर्ड बना रही है. वर्ष 2026 के पहले पांच महीनों में ही उत्तर प्रदेश में 1.31 लाख से अधिक शुद्ध इलेक्ट्रिक वाहन पंजीकृत हुए हैं, जो पिछले वर्ष की कुल बिक्री का लगभग 62 प्रतिशत है. यदि यही रफ्तार बनी रही तो इस वर्ष तीन लाख से अधिक नए इलेक्ट्रिक वाहन सड़कों पर आ सकते हैं. इसका सीधा अर्थ है कि अगले कुछ वर्षों में चार्जिंग के लिए बिजली की मांग और तेजी से बढ़ेगी.

अनधिकृत चार्जिंग से बढ़ रहा संकट, राजस्व को भी नुकसान

बिजली विभाग के सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक समस्या अनधिकृत चार्जिंग है. राजधानी लखनऊ समेत कई शहरों में बड़ी संख्या में ई-रिक्शा घरेलू बिजली कनेक्शन से चार्ज किए जा रहे हैं. विभागीय आकलन के अनुसार केवल लखनऊ में लगभग 30 हजार ई-रिक्शा घरेलू बिजली का उपयोग कर रहे हैं और हर महीने करीब 50 लाख यूनिट बिजली की खपत कर रहे हैं. स्थिति यह है कि शहर में अधिकृत ई-रिक्शा चार्जिंग प्वाइंट गिनती के हैं. इसके बजाय कई इलाकों में रात के समय अवैध चार्जिंग सेंटर संचालित किए जा रहे हैं, जहां प्रति वाहन लगभग 100 रुपए लेकर चार्जिंग की जाती है.

ये चार्जिंग सेंटर रात नौ बजे से सुबह छह बजे तक चलते हैं और अधिकांश घरेलू कनेक्शनों से बिजली लेते हैं. इससे बिजली विभाग को दोहरा नुकसान उठाना पड़ रहा है. पहला, घरेलू लाइनें और ट्रांसफार्मर उस लोड के लिए डिजाइन नहीं किए गए हैं, जिससे बार-बार फाल्ट और ओवरलोडिंग की समस्या पैदा होती है. दूसरा, यदि यही वाहन वाणिज्यिक श्रेणी के अधिकृत चार्जिंग स्टेशन से चार्ज होते तो विभाग को करोड़ों रुपए अतिरिक्त राजस्व मिलता. बिजली अभियंताओं का कहना है कि कई मामलों में स्थानीय थानों को शिकायतें दी गईं, लेकिन अवैध चार्जिंग पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी.

सरकार की तैयारी: चार्जिंग नेटवर्क, स्मार्ट ग्रिड और अलग फीडर पर जोर

बढ़ती चुनौती को देखते हुए सरकार और बिजली विभाग कई स्तरों पर तैयारी कर रहे हैं. प्रदेश में सार्वजनिक चार्जिंग नेटवर्क का तेजी से विस्तार किया जा रहा है. फरवरी 2024 में जहां केवल 582 सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन थे, वहीं अगस्त 2025 तक उनकी संख्या बढ़कर 2,326 हो गई. वर्तमान में प्रदेश में 2,400 से अधिक सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन उपलब्ध हैं और इनकी संख्या लगातार बढ़ाई जा रही है. बिजली विभाग भविष्य की जरूरतों को देखते हुए ट्रांसफार्मरों की क्षमता बढ़ाने, वितरण नेटवर्क को मजबूत करने और स्मार्ट ग्रिड तकनीक अपनाने पर काम कर रहा है.

अधिकारियों का मानना है कि अलग EV चार्जिंग फीडर विकसित करने और स्मार्ट मीटर आधारित चार्जिंग मैनेमेंट से रात के पीक लोड को नियंत्रित किया जा सकता है. साथ ही समय आधारित बिजली दरें लागू करने की संभावना भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है. यदि देर रात या कम मांग वाले समय में बिजली अपेक्षाकृत सस्ती उपलब्ध कराई जाए तो वाहन मालिक चार्जिंग का समय बदल सकते हैं. इससे रात के शुरुआती घंटों में पड़ने वाला दबाव कम होगा.

हालां‍कि पावर कार्पोरेशन का जोर दिन में ई रिक्शा या अन्य EV की चार्जिंग को लेकर है. विशेषज्ञों का यह भी सुझाव है कि चार्जिंग स्टेशनों को सौर ऊर्जा और बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम से जोड़ा जाए, ताकि दिन में उत्पन्न सौर ऊर्जा का उपयोग रात की चार्जिंग में किया जा सके. इसके अलावा कृषि फीडरों के पृथक्करण, अनधिकृत चार्जिंग पर सख्ती और कमर्शियल चार्जिंग स्टेशनों के विस्तार को भी जरूरी माना जा रहा है. 
 

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