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2027 के लिए कितनी तैयार मोना-मसूद की जोड़ी?

आराधना मिश्रा मोना को प्रदेश अध्यक्ष और इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने नई टीम तैयार की है. पार्टी का जोर संगठन के विस्तार, दलित-पिछड़े वर्गों तक पहुंच बढ़ाने और सामाजिक समीकरण साधने पर है

Aradhana Mishra and Imran Masood.
आराधना मिश्रा 'मोना' और इमरान मसूद (फाइल फोटो)
अपडेटेड 12 अक्टूबर , 2026

11 अक्टूबर को आराधना मिश्रा 'मोना' के उत्तर प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के साथ ही प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी की नई टीम की भूमिका अहम हो गई है. मोना के सामने विधानसभा में कांग्रेस की आवाज बुलंद रखने की चुनौती है तो इमरान मसूद को बतौर कार्यकारी अध्यक्ष प्रदेश संगठन में समन्वय और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी का आधार मजबूत करने की जिम्मेदारी है. 

एक तरफ प्रतापगढ़ की रामपुर खास सीट से लगातार तीन बार विधायक चुनी गई मोना हैं तो दूसरी तरफ सहारनपुर से लोकसभा सांसद मसूद हैं जिन्हें पश्चिमी यूपी में कांग्रेस का प्रमुख मुस्लिम चेहरा माना जाता है. कांग्रेस को उम्मीद है कि दोनों नेताओं के अनुभव और राजनीतिक प्रभाव से पार्टी को आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी में मदद मिलेगी. लेकिन सवाल है कि क्या मोना-मसूद की जोड़ी कांग्रेस को प्रदेश में प्रभावी राजनीतिक ताकत बनाने में कामयाब होगी? 

आराधना मिश्रा 'मोना' की राजनीतिक पहचान प्रतापगढ़ की रामपुर खास विधानसभा सीट और उनके पिता प्रमोद तिवारी की विरासत से जुड़ी है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा में उपनेता प्रतिपक्ष प्रमोद तिवारी इस सीट से लगातार नौ बार विधायक चुने गए. एक ही पार्टी और चुनाव चिह्न पर लगातार जीत के लिए उनका नाम रिकॉर्ड में दर्ज है. रामपुर खास लंबे समय से तिवारी परिवार का राजनीतिक गढ़ रहा है. 

मोना ने भी अपनी चुनावी सफलता से इस विरासत को आगे बढ़ाया है. प्रमोद तिवारी के राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद 2013-14 में रामपुर खास सीट पर हुए उपचुनाव में मोना पहली बार विधायक बनीं. इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में BJP की मजबूत लहर के बावजूद उन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी. 2022 में उन्होंने BJP उम्मीदवार को 14,741 मतों के अंतर से हराकर लगातार तीसरी बार जीत दर्ज की.

राज्यसभा में कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी (फाइल फोटो)
राज्यसभा में कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी (फाइल फोटो)

वे 2019 से उत्तर प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस विधानमंडल दल की नेता के रूप में पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रही थीं. 11 अक्टूबर को कार्यभार ग्रहण करने के साथ उनकी भूमिका एक बार फिर विधानसभा में कांग्रेस की रणनीति और राजनीतिक संदेश को प्रभावी बनाने के लिहाज से महत्वपूर्ण हो गई है. मोना के सामने अब चुनौती अपने विधानसभा क्षेत्र के अनुभव को प्रदेशव्यापी राजनीतिक प्रभाव में बदलने की है. 

मोना को प्रियंका गांधी वाड्रा का करीबी माना जाता है. उन्होंने 2022 के विधानसभा चुनाव में प्रियंका के 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' अभियान में भी काम किया था. महिला मतदाताओं और सामाजिक मुद्दों पर कांग्रेस की रणनीति में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है. लेकिन रामपुर खास से बाहर पार्टी के संगठन और नेताओं के साथ तालमेल स्थापित करना उनकी राजनीतिक क्षमता की बड़ी परीक्षा होगी.

सामाजिक समीकरण साधने की चुनौती

सहारनपुर से लोकसभा सांसद इमरान मसूद को उत्तर प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है. 55 वर्षीय मसूद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी का प्रमुख मुस्लिम चेहरा माने जाते हैं. वे समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में भी रह चुके हैं. उनके सामने अपनी क्षेत्रीय पहचान को व्यापक संगठनात्मक प्रभाव में बदलने की चुनौती है. कांग्रेस को उम्मीद है कि पश्चिमी यूपी में उनके अनुभव और राजनीतिक संपर्क से पार्टी को मजबूती मिलेगी. 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं के अलावा जाट, गुर्जर, दलित और अन्य पिछड़े वर्गों का समर्थन भी कई सीटों पर चुनावी नतीजों को प्रभावित करता है. किसान राजनीति, गन्ने का भुगतान, रोजगार, स्थानीय उद्योग और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे भी यहां महत्वपूर्ण हैं. मसूद के सामने चुनौती मुस्लिम मतदाताओं के बीच पार्टी की स्वीकार्यता बनाए रखने के साथ अन्य सामाजिक समूहों तक पहुंच बढ़ाने की है.

राजनीतिक विश्लेषक और मेरठ के दीवान इंस्टीट्यूट में प्रोफेसर संदीप कुमार वर्मा बताते हैं, “मोना और मसूद की भूमिकाएं अलग-अलग हैं लेकिन दोनों के सामने कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति मजबूत करने का साझा लक्ष्य है.

मोना को विधानसभा में पार्टी की भूमिका प्रभावी बनानी है जबकि मसूद को संगठनात्मक गतिविधियों और सामाजिक समीकरणों को मजबूती देनी है. इन दोनों के बीच तालमेल तभी कारगर होगा जब प्रदेश कांग्रेस की पूरी टीम स्पष्ट जिम्मेदारियों के साथ काम करे.”

इसी साल जून में कांग्रेस ने राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है (फाइल फोटो)
इसी साल जून में कांग्रेस ने राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है (फाइल फोटो)

मोना और मसूद के अलावा कांग्रेस ने अलग-अलग सामाजिक समूहों और संगठनात्मक क्षेत्रों में काम करने वाले नेताओं को भी जिम्मेदारियां सौंपी हैं. जून में कांग्रेस ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति विभाग के चेयरमैन राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश का प्रभारी नियुक्त किया था. 

गौतम के सामने प्रदेश में पार्टी के संगठनात्मक कामकाज को आगे बढ़ाने और दलित समुदाय के बीच कांग्रेस की पहुंच मजबूत करने की चुनौती है. बाराबंकी से लोकसभा सांसद तनुज पूनिया उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के चेयरमैन हैं.

तनुज राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष पी.एल. पूनिया के पुत्र हैं. वहीं महराजगंज क्षेत्र के पासी-दलित नेता आलोक प्रसाद को प्रदेश कांग्रेस का वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाया गया है. वे पहले अनुसूचित जाति विभाग की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं. 

इन नेताओं की भूमिका दलित समाज के विभिन्न समूहों से संवाद बढ़ाने और संगठन में उनकी भागीदारी मजबूत करने में महत्वपूर्ण हो सकती है. पिछड़े वर्गों के बीच पहुंच बढ़ाने के लिए गाजीपुर मूल के मनोज यादव को पिछड़ा वर्ग विभाग का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है. मनोज इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलन से राजनीति में आए.

गोरखपुर निवासी देवेंद्र कुमार निषाद प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष हैं. वे फिशरमैन कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और पिछला विधानसभा चुनाव गोरखपुर ग्रामीण सीट से लड़ा था. 

इन नेताओं के सामने पिछड़े वर्गों और विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच कांग्रेस का आधार बढ़ाने की चुनौती है. कांग्रेस ने वैचारिक विमर्श के लिए देवरिया निवासी लेखक और दलित विचारक एच.एल. दुसाध को उत्तर प्रदेश कांग्रेस के विचार विभाग का चेयरमैन बनाया है. दुसाध की भूमिका सामाजिक न्याय, जातीय प्रतिनिधित्व और संविधान से जुड़े मुद्दों पर पार्टी का पक्ष सामने रखने में महत्वपूर्ण हो सकती है. 

लखनऊ में विद्यान्त हिन्दू डिग्री कॉलेज के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर मनीष हिंदवी को कनेक्ट सेंटर/वार रूम का चेयरमैन बनाकर कांग्रेस ने संगठन और चुनावी रणनीति के बीच बेहतर समन्वय, जमीनी फीडबैक के विश्लेषण और 2027 विधानसभा चुनाव के लिए प्रभावी राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाया है.

वहीं मथुरा निवासी कुंवर सिंह निषाद को मीडिया एवं प्रचार विभाग का चेयरमैन बनाया गया है. उन्हें पार्टी के राजनीतिक संदेश को मीडिया और डिजिटल माध्यमों के जरिए जनता तक पहुंचाने की जिम्मेदारी मिली है. 

संगठनात्मक तैयारियों में संदीप दीक्षित की भूमिका भी अहम है. पार्टी के इस वरिष्ठ नेता को संगठन सृजन अभियान का वॉर रूम प्रभारी  बनाया गया है. वे पूर्व में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य और मनरेगा केंद्रीय परिषद के सदस्य रह चुके हैं. SIR निगरानी समिति में भी उनकी भूमिका है.

पार्टी को बूथ स्तर पर संगठन की स्थिति का आकलन करने, कमजोर इकाइयों को मजबूत करने और मतदाता सूची से जुड़े काम पर ध्यान देने की जरूरत होगी. दीक्षित के सामने संगठनात्मक गतिविधियों की निगरानी और विभिन्न स्तरों के नेताओं के बीच समन्वय स्थापित करने की चुनौती है. 

विधानसभा में कांग्रेस विधानमंडल दल के नेता वीरेंद्र चौधरी की भूमिका भी चुनावी रणनीति से जुड़ी है. महराजगंज जिले की फरेंदा सीट से विधायक चौधरी को मोना की जगह यह जिम्मेदारी दी गई है. चौधरी को सदन में सरकार को जनहित के मुद्दों पर घेरने और विधायकों के बीच समन्वय बनाए रखने का काम करना होगा. कांग्रेस के सीमित संख्याबल को देखते हुए सदन में उसकी प्रभावी मौजूदगी के लिए मुद्दों का चयन और तथ्यों के आधार पर सरकार से सवाल करना महत्वपूर्ण होगा.

संदीप कुमार वर्मा के मुताबिक कांग्रेस की नई टीम के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वह नेताओं की व्यक्तिगत राजनीतिक पहचान को प्रदेशव्यापी जनाधार में बदल सकती है. BJP के पास व्यापक संगठन और चुनावी तंत्र है जबकि समाजवादी पार्टी अपने पीडीए यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को साथ लाने के अभियान पर जोर दे रही है. कांग्रेस भी सामाजिक न्याय, संविधान और प्रतिनिधित्व के सवालों पर अपनी राजनीति आगे बढ़ाना चाहती है. लेकिन उसे इन मुद्दों को संगठनात्मक गतिविधियों और स्थानीय स्तर पर जनसंपर्क से जोड़ना होगा.

वर्मा के मुताबिक माजवादी पार्टी के साथ गठबंधन का सवाल भी कांग्रेस की तैयारी को प्रभावित करेगा. 2024 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन से दोनों दलों को लाभ मिला था लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर अलग परिस्थितियां बन सकती हैं. 

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