
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने भले ही अभी अपने उम्मीदवारों के पत्ते नहीं खोले हैं लेकिन टिकट की दौड़ ने कई सीटों पर सियासी तस्वीर साफ करनी शुरू कर दी है.
खासतौर पर उन सात विधानसभा सीटों पर BJP के सामने दिलचस्प चुनौती है जहां 2022 में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी. इन सीटों पर अब समाजवादी पार्टी (सपा) से बगावत कर BJP के साथ खड़े हुए नेताओं के साथ-साथ BJP के पुराने दावेदार भी टिकट की दौड़ में हैं.
इनमें अमेठी की गौरीगंज, अयोध्या की गोसाईंगंज, बदायूं की बिसौली, जालौन की कालपी, अंबेडकर नगर की जलालपुर, रायबरेली की ऊंचाहार और कौशांबी की चायल विधानसभा सीट शामिल हैं. इन सात सीटों की खासियत यह है कि 2022 में यहां BJP या उसके सहयोगी दलों को हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन 2024 के राज्यसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के कई विधायकों ने BJP के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग की.
इसके बाद इन नेताओं की राजनीतिक निष्ठा बदल गई और अब इनमें से कई BJP के टिकट पर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं. ऐसे में 2027 के चुनाव में BJP के सामने सिर्फ जिताऊ चेहरे का सवाल नहीं है बल्कि पुराने संगठनात्मक समीकरण, जातीय संतुलन और टिकट के दावेदारों के बीच तालमेल बैठाने की चुनौती भी है.
गोसाईंगंज में अभय सिंह बनाम खब्बू तिवारी
अयोध्या की गोसाईंगंज सीट इस पूरी कवायद में सबसे दिलचस्प मानी जा रही है. यहां सपा के टिकट पर 2022 में जीतने वाले अभय सिंह अब BJP के साथ हैं. हाल ही में उन्होंने अमेठी की गौरीगंज सीट से सपा के टिकट पर जीतने वाले राकेश प्रताप सिंह के साथ दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की.
दोनों नेताओं ने 2024 के राज्यसभा चुनाव में BJP के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग की थी और बाद में सपा से बाहर कर दिए गए. लेकिन गोसाईंगंज में अभय सिंह की राह पूरी तरह आसान नहीं है. BJP के पुराने चेहरे और पूर्व विधायक इंद्र प्रताप तिवारी उर्फ खब्बू तिवारी भी टिकट के लिए जोर लगा रहे हैं.
तिवारी ने 2017 के विधानसभा चुनाव में अभय सिंह को हराकर BJP के लिए यह सीट जीती थी. 2022 में उनकी पत्नी आरती तिवारी BJP उम्मीदवार थीं और दूसरे स्थान पर रहीं जबकि अभय सिंह ने सपा के टिकट पर जीत दर्ज की. खब्बू तिवारी की दावेदारी को सिर्फ एक विधानसभा सीट की लड़ाई के तौर पर नहीं देखा जा रहा.

फरवरी 2025 में मिल्कीपुर विधानसभा उपचुनाव के दौरान उन्होंने ब्राह्मण वोटरों को BJP के पक्ष में लामबंद करने में भूमिका निभाई थी. मिल्कीपुर में BJP के चंद्रभानु पासवान ने सपा के अजीत प्रसाद को 61,710 वोटों के बड़े अंतर से हराया था. अजीत प्रसाद, 2024 में फैजाबाद लोकसभा सीट जीतने वाले सपा नेता अवधेश प्रसाद के बेटे हैं.
BJP के एक नेता के मुताबिक पार्टी खब्बू तिवारी की दावेदारी को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकती क्योंकि ऐसा करने का असर अयोध्या और अंबेडकर नगर के ब्राह्मण मतदाताओं पर पड़ सकता है. इसी वजह से एक विकल्प यह भी माना जा रहा है कि तिवारी को गोसाईंगंज के बजाय किसी दूसरी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाया जाए.
यानी BJP के सामने एक ही सीट पर दो राजनीतिक रूप से उपयोगी चेहरों को साधने की चुनौती है. हालांकि खब्बू तिवारी को अयोध्या सदर से BJP उम्मीदवार बनाए जाने की अटकलें लग रही हैं. इस सीट पर पहले से ही सपा ने पूर्व विधायक पवन पांडेय को उम्मीदवार घोषित किया है.
गौरीगंज में बागी बनाम BJP का पुराना चेहरा
अमेठी की गौरीगंज सीट पर भी यही कहानी दोहराई जा रही है. 2022 में सपा के टिकट पर जीतने वाले राकेश प्रताप सिंह ने 2024 के राज्यसभा चुनाव में BJP के पक्ष में क्रॉस-वोट किया था. इसके बाद सपा ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया. अब सिंह BJP के टिकट पर 2027 का विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं. लेकिन यहां भी BJP के पास एक मजबूत पुराना दावेदार मौजूद है.
पूर्व विधायक चंद्र प्रकाश मिश्रा उर्फ मटियारी ने 2022 में राकेश प्रताप सिंह के खिलाफ BJP के टिकट पर चुनाव लड़ा था और उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. ऐसे में अगर BJP मौजूदा विधायक रहे राकेश प्रताप सिंह को उम्मीदवार बनाती है तो पार्टी को मिश्रा को राजनीतिक रूप से समायोजित करना होगा.

गौरीगंज में भी ब्राह्मण समीकरण को महत्वपूर्ण माना जा रहा है. यही वजह है कि BJP के भीतर एक विकल्प यह भी हो सकता है कि मटियारी को किसी दूसरी सीट पर मौका दिया जाए या उन्हें विधान परिषद के रास्ते समायोजित किया जाए. इस तरह टिकट का फैसला सिर्फ एक उम्मीदवार चुनने तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि दो प्रभावशाली नेताओं के राजनीतिक भविष्य को संतुलित करने का सवाल भी होगा.
बिसौली और कालपी में पुराने बनाम नए दावेदार
बदायूं की बिसौली विधानसभा सीट पर सपा से बगावत कर चुके आशुतोष मौर्य BJP के टिकट के प्रमुख दावेदार हैं. हालांकि उनके सामने BJP के पुराने चेहरे कुशाग्र सागर की चुनौती है. कुशाग्र सागर ने 2017 में BJP के टिकट पर यह सीट जीती थी और 2022 में भी वे कड़े मुकाबले में दूसरे स्थान पर रहे थे.
कुशाग्र पूर्व विधायक योगेंद्र सागर के बेटे हैं. ऐसे में BJP को यहां भी संगठन के पुराने चेहरे और सपा से आए नए दावेदार के बीच संतुलन बनाना होगा.
जालौन की कालपी विधानसभा सीट पर भी मुकाबला दिलचस्प है. सपा से बगावत करने वाले विनोद चतुर्वेदी और 2022 में निषाद पार्टी के उम्मीदवार रहे छोटे सिंह BJP टिकट की दौड़ में हैं. चतुर्वेदी ने 2022 के चुनाव में छोटे सिंह को करीब 2,800 वोटों से हराया था.
इससे पहले 2017 में BJP के नरेंद्र पाल सिंह ने यह सीट जीती थी. यानी BJP के सामने यहां भी एक ऐसा टिकट समीकरण है जिसमें सपा से आए नेता BJP के संभावित पुराने चेहरे और सहयोगी दल से जुड़े दावेदार सभी मौजूद हैं.
जलालपुर में पांडे परिवार की दावेदारी
अंबेडकर नगर की जलालपुर सीट पर सपा से बगावत करने वाले राकेश पांडे मौजूदा विधायक हैं और BJP के संभावित उम्मीदवारों में शामिल हैं. लेकिन यहां भी टिकट को लेकर एक से अधिक दावेदार हैं. पूर्व सपा विधायक सुभाष चंद्र राय, जिन्होंने 2022 में BJP के टिकट पर चुनाव लड़ा था, और 2017 के BJP उम्मीदवार रहे राजेश सिंह भी टिकट की दौड़ में हैं.
राय ने 2019 के उपचुनाव में सपा के टिकट पर जलालपुर सीट जीती थी. वहीं राजेश सिंह ने 2017 में BJP के टिकट पर चुनाव लड़ा था. जलालपुर की दावेदारी में एक और नाम रितेश पांडे का जुड़ सकता है.

राकेश पांडे हाल ही में अंबेडकर नगर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जनसभा में मौजूद नहीं थे लेकिन उनके बेटे रितेश पांडे कार्यक्रम में मौजूद रहे. रितेश पांडे ने 2017 में BSP के टिकट पर यह विधानसभा सीट जीती थी.
अब राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि वे भी BJP के टिकट के लिए दावा पेश कर सकते हैं. ऐसे में जलालपुर में मुकाबला केवल सपा से BJP में आए विधायक और BJP के पुराने नेताओं के बीच नहीं रह जाएगा, बल्कि पांडे परिवार की अगली राजनीतिक भूमिका भी अहम हो सकती है.
ऊंचाहार में मनोज पांडे सबसे आगे
रायबरेली की ऊंचाहार सीट पर BJP के सामने स्थिति अपेक्षाकृत स्पष्ट दिखाई दे रही है. सपा से बगावत करने वाले मनोज कुमार पांडे BJP के संभावित उम्मीदवार माने जा रहे हैं. वे फिलहाल BJP नेतृत्व वाली NDA सरकार में खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री हैं.
2022 में मनोज पांडे ने सपा के टिकट पर ऊंचाहार विधानसभा सीट जीती थी. उन्होंने BJP के अमरपाल मौर्य को छह हजार से अधिक वोटों से हराया था. बाद में BJP ने अमरपाल मौर्य को राज्यसभा भेजा और उन्हें पार्टी के OBC मोर्चे का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया.
ऊंचाहार में मनोज पांडे की उम्मीदवारी BJP के लिए सपा के एक मजबूत चेहरे को अपने पाले में बनाए रखने के साथ-साथ रायबरेली के राजनीतिक समीकरण को साधने की कोशिश होगी. यहां BJP के लिए चुनौती यह भी होगी कि 2022 में उसके उम्मीदवार रहे अमरपाल मौर्य के समर्थक खेमे को किस तरह साथ रखा जाए.
चायल में पूजा पाल के जरिए OBC समीकरण
कौशांबी की चायल सीट पर भी BJP सपा की बगावत से निकले चेहरे पर दांव लगा सकती है. 2022 में सपा के टिकट पर जीतने वाली पूजा पाल BJP के टिकट की प्रमुख दावेदार हैं. जून 2026 में उन्हें उत्तर प्रदेश BJP की राज्य कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष बनाया गया था. इससे उनके BJP संगठन में बढ़ते महत्व का संकेत मिलता है.

पूजा पाल का प्रभाव प्रयागराज और कौशांबी के OBC समुदाय के बीच माना जाता है. 2022 में उन्होंने अपना दल (एस) के उम्मीदवार नागेंद्र प्रताप सिंह पटेल को 13 हजार से अधिक वोटों के अंतर से हराया था. ऐसे में BJP के लिए पूजा पाल की उम्मीदवारी स्थानीय OBC समीकरण को मजबूत करने का जरिया बन सकती है.
सामाजिक समीकरण बड़ी चुनौती
इन सात सीटों पर चल रही टिकट की कवायद को केवल दलबदल की राजनीति के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा. BJP के सामने चुनौती यह है कि सपा से आए या सपा के बागी नेताओं को टिकट देकर पार्टी क्या हासिल कर सकती है और इससे उसके पुराने कार्यकर्ताओं तथा दावेदारों में असंतोष कितना बढ़ सकता है.
गौरीगंज और गोसाईंगंज में ब्राह्मण समीकरण, बिसौली और चायल में OBC प्रभाव, जलालपुर में स्थानीय राजनीतिक परिवारों की दावेदारी और ऊंचाहार में सपा के मजबूत चेहरे को अपने साथ बनाए रखने का सवाल अलग-अलग तरीके से BJP की रणनीति को प्रभावित कर रहा है.
इन सात सीटों पर BJP का टिकट सिर्फ चुनाव लड़ने का टिकट नहीं होगा. यह इस बात का संकेत भी होगा कि 2027 में पार्टी दलबदल कर आए नेताओं पर कितना भरोसा करती है, अपने पुराने कार्यकर्ताओं को कितनी प्राथमिकता देती है और जातीय समीकरणों के बीच राजनीतिक वफादारी को किस तरह तौलती है.
इन सीटों पर अंतिम फैसला आने के बाद यह भी साफ होगा कि BJP की चुनावी रणनीति में 2024 के क्रॉस-वोटर कितने महत्वपूर्ण हैं और 2027 में सपा के खिलाफ उसकी लड़ाई किस हद तक उन्हीं के सहारे आगे बढ़ेगी.

