उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव का सबसे बड़ा रणक्षेत्र अगर कोई बनने जा रहा है तो वह युवा मतदाता है. किसानों, महिलाओं, दलितों और पिछड़ों के बाद अब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सबसे बड़ी चिंता प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों युवा हैं.
पिछले कुछ वर्षों में पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में देरी, चयन प्रक्रिया पर सवाल और बेरोजगारी जैसे मुद्दों ने युवाओं में गहरा असंतोष पैदा किया है. यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा परीक्षा माफिया के खिलाफ फास्ट ट्रैक कोर्ट और कड़े कानून की घोषणा के तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में राजनीतिक डैमेज कंट्रोल की रणनीति तेज कर दी.
24 जुलाई को लखनऊ में उत्तर प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी का मेडिकल प्रवेश परीक्षा (नीट) में सफल छात्रों और उनके अभिभावकों से मिलना महज एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था. यह उस राजनीतिक संदेश का हिस्सा था जिसके जरिए पार्टी बताना चाहती थी कि छात्रों का भरोसा वापस लाना उसकी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है.
कार्यक्रम में चौधरी ने स्पष्ट कहा कि "छात्र न पक्ष के होते हैं, न विपक्ष के." साथ ही उन्होंने यह स्वीकार भी किया कि "पेपर लीक एक समस्या है." उन्होंने दावा किया कि मोदी सरकार ने परीक्षाओं को लीक-प्रूफ बनाने के लिए कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर कड़े कदम उठाए हैं और हाल के दिनों में तीन बड़ी परीक्षाएं बिना किसी विवाद के कराई गई हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी सत्तारूढ़ दल के लिए यह असामान्य स्थिति होती है जब उसे सार्वजनिक रूप से यह भरोसा दिलाना पड़े कि परीक्षाएं निष्पक्ष होंगी. इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार भी मान रही है कि युवाओं के बीच भरोसे का संकट वास्तविक है और केवल प्रशासनिक कार्रवाई से नहीं बल्कि राजनीतिक संवाद से भी उसे दूर करना होगा.
इस कार्यक्रम से दो दिन पहले, 22 जुलाई को पंकज चौधरी ने राहुल गांधी के विरोध प्रदर्शन के जवाब में लखनऊ में VVIP गेस्ट हाउस से कांग्रेस कार्यालय तक मार्च का नेतृत्व किया था. BJP के भीतर इसे राजनीतिक जवाबी अभियान के रूप में देखा गया लेकिन पार्टी के एक वरिष्ठ नेता स्वीकार करते हैं कि पेपर लीक और दिल्ली में छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के बाद कार्यकर्ताओं को जनता के कठिन सवालों का सामना करना पड़ रहा था.
ऐसे में नेतृत्व को यह महसूस हुआ कि केवल विपक्ष पर हमला करने से काम नहीं चलेगा, छात्रों के बीच सीधे संवाद की भी जरूरत है. दरअसल, BJP नेतृत्व की चिंता अचानक पैदा नहीं हुई है. 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में पार्टी के प्रदर्शन ने यह संकेत दे दिया था कि युवा मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग उससे दूरी बना रहा है.
2019 में 62 सीटें जीतने वाली बीजेपी 2024 में 33 सीटों पर सिमट गई. उसका वोट शेयर लगभग 50 प्रतिशत से घटकर करीब 41 प्रतिशत रह गया. दूसरी ओर समाजवादी पार्टी 37 सीटें जीतकर अपने इतिहास का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने में सफल रही. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जातीय समीकरणों और संविधान जैसे मुद्दों के साथ-साथ प्रतियोगी छात्रों में व्याप्त असंतोष ने भी इस चुनावी परिणाम को प्रभावित किया.
यही कारण है कि बीजेपी के भीतर यह धारणा मजबूत हुई है कि अगर 2027 से पहले भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक का मुद्दा नियंत्रित नहीं हुआ तो इसका चुनावी नुकसान और अधिक गंभीर हो सकता है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि प्रधानमंत्री की हालिया घोषणाओं और धर्मेंद्र प्रधान के केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद यदि अगले कुछ महीनों में फिर किसी बड़ी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है तो विपक्ष इसे बीजेपी सरकार की सबसे बड़ी विफलता के रूप में पेश करेगा और इसका सीधा असर विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है.
दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम ने बीजेपी के अपने युवा संगठन की सक्रियता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. हाल ही में भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए रोहित मिश्रा से पार्टी को बड़ी उम्मीदें थीं. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से निकले रोहित मिश्रा को प्रयागराज जैसे छात्र राजनीति के केंद्र से जोड़कर बीजेपी ने यह संदेश देने की कोशिश की थी कि अब युवाओं के मुद्दे युवा नेतृत्व ही संभालेगा.
12 जुलाई को लखनऊ में उनका पदभार ग्रहण समारोह बेहद भव्य रहा. सैकड़ों वाहनों का काफिला, खुली गाड़ी में रोड शो, क्रेन से फूलों की माला, तलवार, गदा, फरसा और रामचरितमानस भेंट किए जाने जैसी तस्वीरें पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बनीं. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जिस समय प्रतियोगी छात्र पेपर लीक और शिक्षा सुधार को लेकर आंदोलन कर रहे थे, उस समय यह शक्ति प्रदर्शन युवाओं के बीच अपेक्षित राजनीतिक संदेश नहीं दे सका.
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक सुधीर विश्वकर्मा का कहना है, "भाजयुमो का उद्देश्य केवल संगठनात्मक कार्यक्रम करना नहीं बल्कि छात्र आंदोलनों के बीच पार्टी का पक्ष प्रभावी ढंग से रखना भी होता है. यदि छात्र आंदोलन लगातार विपक्ष के प्रभाव में दिखाई दें और युवा मोर्चा संवाद स्थापित न कर पाए तो स्वाभाविक रूप से वरिष्ठ नेतृत्व को सीधे हस्तक्षेप करना पड़ता है."
यही वजह मानी जा रही है कि अंततः पंकज चौधरी को स्वयं छात्रों के बीच जाकर संवाद करना पड़ा. बीजेपी युवा मोर्चा और एबीवीपी दोनों की अपेक्षाकृत कम सक्रियता के कारण प्रदेश नेतृत्व को यह महसूस हुआ कि युवा वर्ग तक पार्टी का संदेश अपेक्षित रूप से नहीं पहुंच रहा है.
इस पूरी राजनीतिक लड़ाई का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र प्रयागराज बनकर उभरा है. पिछले कुछ वर्षों में प्रयागराज देश के सबसे बड़े प्रतियोगी छात्र केंद्रों में शामिल हो चुका है. पूर्वांचल सहित प्रदेश के विभिन्न जिलों से लाखों छात्र यहां रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. यही कारण है कि लगभग सभी राजनीतिक दल प्रयागराज को युवाओं तक पहुंचने का सबसे प्रभावी मंच मान रहे हैं.
प्रयागराज में 28 जून को समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने प्रयागराज में बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में कथित भ्रष्टाचार और पेपर लीक को लेकर राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला था. कांग्रेस पहले से ही इस मुद्दे पर अभियान चला रही थी. विपक्ष की रणनीति साफ है कि युवाओं के बीच बढ़ते असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदला जाए. इसके जवाब में बीजेपी ने भी संगठनात्मक स्तर पर युवाओं को आगे बढ़ाने का प्रयास किया.
रोहित मिश्रा को भाजयुमो की कमान देने के साथ-साथ प्रयागराज की युवा नेता डॉ. कीर्तिका अग्रवाल को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाकर पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि नई पीढ़ी को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जा रही हैं. भाजपा इस चुनौती को इसलिए भी गंभीरता से ले रही है क्योंकि 2017 में उसने स्वयं युवाओं की इसी नाराजगी को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था.
उस समय समाजवादी पार्टी सरकार पर भर्ती परीक्षाओं में धांधली और भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर बीजेपी सत्ता तक पहुंची थी. सरकार बनने के बाद उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग से जुड़ी शिकायतों की सीबीआई जांच भी शुरू कराई गई थी. अब लगभग आठ वर्ष बाद विपक्ष वही मुद्दा बीजेपी के खिलाफ उठा रहा है. इसी कारण बीजेपी नेता लगातार पिछली समाजवादी सरकारों पर नकल संस्कृति और भर्ती अनियमितताओं के आरोप दोहरा रहे हैं.
पार्टी नेताओं का दावा है कि कल्याण सिंह सरकार ने नकल रोकने के लिए कठोर कानून बनाए थे जबकि समाजवादी सरकारों के दौरान परीक्षा प्रणाली कमजोर हुई. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अतीत की तुलना तब तक प्रभावी नहीं होगी जब तक वर्तमान सरकार अपने कार्यकाल में पूरी तरह भरोसेमंद परीक्षा व्यवस्था स्थापित नहीं कर देती.
सुधीर विश्वकर्मा बताते हैं, “युवाओं के मुद्दे पर बीजेपी की चिंता का एक और कारण यह है कि यह वर्ग जातीय और पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों से अपेक्षाकृत कम प्रभावित होता है. प्रतियोगी छात्र सोशल मीडिया के माध्यम से तेजी से संगठित होते हैं और किसी भी परीक्षा विवाद का असर कुछ ही घंटों में पूरे प्रदेश में फैल जाता है. पिछले एक वर्ष के दौरान कई छात्र आंदोलनों ने यह दिखाया है कि रोजगार और परीक्षा जैसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ चुके हैं.”
यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा फास्ट ट्रैक कोर्ट और कड़े कानून की घोषणा को बीजेपी केवल प्रशासनिक सुधार नहीं बल्कि राजनीतिक भरोसा बहाल करने के प्रयास के रूप में भी देख रही है. पार्टी चाहती है कि आने वाले महीनों में बिना किसी विवाद के भर्ती और प्रवेश परीक्षाएं संपन्न हों ताकि विपक्ष के सबसे प्रभावी मुद्दे की धार कमजोर की जा सके.

