
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की संस्थापक ममता बनर्जी ने 18 सितंबर को ऐलान किया कि उनकी पार्टी आगामी नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान का समर्थन करेगी. उन्होंने कहा कि रेजीनगर सीट पर उनका फैसला उचित समय पर बताया जाएगा.
यह ऐलान उस वक्त हुआ जब नंदीग्राम से ममता की ओर से उतारी गई उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की और अपना नामांकन वापस ले लिया. इस साल हुए विधानसभा चुनाव में अधिकारी ने नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटों पर जीत हासिल की थी लेकिन उन्होंने भवानीपुर सीट अपने पास रखने का फैसला किया.
ममता ने मीडिया से बातचीत में कहा, "उन्होंने (डे) हमें मैसेज करके चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी. मैंने कल रात राहुल (गांधी) जी से बात की थी. लेकिन मैंने उन्हें कुछ नहीं बताया था क्योंकि यह हमारी पार्टी का फैसला है. यह एक सरप्राइज है. लेकिन उन्होंने हर तरह के समर्थन का वादा किया था."
दिलचस्प बात यह है कि विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन के विचार को ही खारिज कर चुकीं ममता अब बिना कांग्रेस के कहे नंदीग्राम में उसके उम्मीदवार को समर्थन दे रही हैं. उनकी पार्टी के सूत्रों का दावा है कि डे को वैसे भी आखिरी समय में नामांकन वापस लेने के लिए कहा जाना था ताकि पार्टी कांग्रेस को समर्थन दे सके.
हालांकि मीडिया से बातचीत में ममता ने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ BJP ने डे पर नामांकन वापस लेने के लिए दबाव डाला. उन्होंने यह भी कहा कि नंदीग्राम उपचुनाव भविष्य के चुनावी गठबंधनों के संदर्भ में, खासकर 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए उनका संदेश होगा.

उनके इस बयान से राजनीतिक अटकलें और तेज हो गईं. इसी बीच खबर आई कि कांग्रेस उम्मीदवार प्रधान को पुलिस ने एक पुराने हत्या के मामले में गिरफ्तार कर लिया है.
बंगाल की राजनीति में चल रही इस उथल-पुथल का ताजा दौर चुनाव आयोग (EC) के एक फैसले के बाद शुरू हुआ. 28 साल तक तृणमूल कांग्रेस और उसका ‘फूल-घास’ यानी घास पर दो फूल वाला जाना-पहचाना चुनाव चिह्न ममता से जुड़ा रहा. लेकिन 17 सितंबर की शाम यह रिश्ता अचानक, कम से कम आगामी उपचुनावों की अवधि के लिए रोक दिया गया.
चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश में तृणमूल कांग्रेस के भीतर प्रतिद्वंद्वी गुटों को पार्टी के नाम या उसके आरक्षित चुनाव चिह्न, दोनों में से किसी का इस्तेमाल करने से रोक दिया. यह फैसला पार्टी के मालिकाना हक पर अंतिम फैसला नहीं था.
लेकिन 1998 में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना करने वाली और पार्टी के गठन के समय चुनाव चिह्न का खाका खुद तैयार करने वाली ममता के लिए यह आदेश एक असाधारण उलटफेर था. उन्हें उस पार्टी के बजाय एक नए नाम और चुनाव चिह्न के साथ चुनाव लड़ने का फैसला करना पड़ा जिसे उन्होंने खड़ा किया और बंगाल में 15 साल तक लगातार सत्ता में पहुंचाया.
चुनाव आयोग ने ममता के गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न दिया. अरूप रॉय और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न दिया गया.
चुनाव आयोग ने आधिकारिक तौर पर इस विवाद को दो गुटों के बीच का विवाद बताया. एक गुट का नेतृत्व ममता कर रही हैं जबकि दूसरे का नेतृत्व अरूप रॉय कर रहे हैं. आयोग ने कहा कि दोनों ही तृणमूल कांग्रेस होने का दावा करते हैं.
पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत उस चुनौती का राजनीतिक चेहरा हैं, जिसने ममता के खिलाफ संगठनात्मक टकराव को जन्म दिया. कभी ममता के करीबी सहयोगी और उनके मंत्रिमंडल में मंत्री रहे रॉय बागी गुट के अध्यक्ष हैं.

तात्कालिक विवाद 6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजीनगर में होने वाले उपचुनावों को लेकर शुरू हुआ जहां दोनों गुटों ने तृणमूल के नाम से उम्मीदवार उतारे.
चुनाव आयोग ने कहा कि चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैराग्राफ 15 के तहत पूरी जांच पूरी करने के लिए पर्याप्त समय नहीं है. इसलिए उसने अंतिम फैसला आने तक दोनों पक्षों को ‘बराबर स्थिति’ में रखने का फैसला किया.
दोनों गुटों को तीन-तीन पसंदीदा नाम और तीन-तीन स्वतंत्र चुनाव चिह्न बताने को कहा गया. चुनाव आयोग हर गुट के लिए एक नाम मंजूर करेगा और एक चुनाव चिह्न आवंटित करेगा. गुट चाहें तो इन नामों में मूल संगठन यानी तृणमूल कांग्रेस का संदर्भ बनाए रख सकते थे.
चुनाव आयोग ने चुनाव चिह्न चुनने के लिए 11 घंटे का समय दिया था. ममता के गुट ने 17 सितंबर को रात 11.36 बजे अपना जवाब दाखिल किया. सूत्रों के मुताबिक, उसने अंतरिम आदेश के खिलाफ ‘कड़े विरोध’ के साथ तीन पसंदीदा नाम और चुनाव चिह्न जमा किए.
यह बेहद अहम बात है. ममता चुनाव आयोग की अंतरिम व्यवस्था को इस बात की स्वीकृति नहीं मान रही हैं कि उन्होंने तृणमूल कांग्रेस खो दी है. उनके गुट ने इस आदेश को चुनौती दी है और प्रतिद्वंद्वी गुट की संगठनात्मक कवायद की संवैधानिक वैधता पर सवाल कायम रखा है. साथ है उपचुनाव में उसके उम्मीदवार हिस्सा ले सकें, इसके लिए उसने तत्काल की गई मांग का पालन किया है.
तृणमूल कांग्रेस का सफर
इस पूरे घटनाक्रम की विडंबना तृणमूल कांग्रेस के इतिहास में छिपी है. ममता दो दशक से ज्यादा समय तक कांग्रेस की नेता रहीं फिर पार्टी से अलग हो गईं. 1997 में बंगाल में वामपंथ विरोधी राजनीति की दिशा को लेकर कांग्रेस नेतृत्व के साथ बढ़ते टकराव के बीच उन्होंने अलग संगठन खड़ा करना शुरू किया.
तृणमूल कांग्रेस की स्थापना 1 जनवरी 1998 को हुई. पार्टी के अपने विवरण के मुताबिक, ममता ने 1997 में नेताजी इंडोर स्टेडियम में चल रही कांग्रेस की बैठक से इतर, बाहर समानांतर सम्मेलन आयोजित किया था. यह उनकी उस दलील की बुनियाद पर था कि बंगाल को जमीनी राजनीति पर आधारित एक स्वतंत्र मंच की जरूरत है.
शुरुआत से ही इसमें व्यक्तिगत प्रतीकवाद जुड़ा था. पार्टी के गठन के दिन ममता ने खुद इसका चुनाव चिह्न बनाया था: घास से निकलती हरी रंग की दो कलियां. बाद में यही तस्वीर ‘फूल-घास’ चुनाव चिह्न बनी, जिसे मतदाता ममता और तृणमूल कांग्रेस से जोड़ने लगे.

1998 के लोकसभा चुनाव में इस नई पार्टी ने सात सीटें जीतीं. 1999 में वह BJP के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में शामिल हो गईं और ममता केंद्रीय रेल मंत्री बनीं. 2001 तक, गठबंधन बदलने के बाद तृणमूल कांग्रेस बंगाल में वाम मोर्चे की मुख्य चुनौती बन चुकी थी.
निर्णायक बदलाव एक दशक बाद आया. 2011 में ममता ने तृणमूल कांग्रेस को सत्ता में पहुंचाया और बंगाल में वाम मोर्चे के 34 साल के शासन का अंत कर दिया. इसके बाद पार्टी ने 2016 और 2021 के विधानसभा चुनाव भी जीते. इस तरह दो फूल वाला चुनाव चिह्न राज्य में सबसे ज्यादा पहचाने जाने वाले चुनाव चिह्नों में शामिल हो गया.
यही इतिहास बताता है कि चुनाव आयोग का आदेश सिर्फ ईवीएम से जुड़ा मामला क्यों नहीं है. ममता के लिए पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न महज संगठनात्मक संपत्ति नहीं हैं. इनके साथ करीब तीन दशक की राजनीतिक स्मृतियां जुड़ी हैं: वामपंथ विरोधी आंदोलन, सिंगूर और नंदीग्राम के भूमि आंदोलन, 2011 में बंगाल में सत्ता परिवर्तन, मुख्यमंत्री के तौर पर उनके लगातार तीन कार्यकाल और पार्टी का व्यापक जमीनी नेटवर्क.
अब कम से कम कुछ समय के लिए ममता को मतदाताओं से अपने राजनीतिक संगठन को उस पहचान के बिना पहचानने के लिए कहना होगा जो 1998 से उसका प्रतिनिधित्व करती रही है.
विद्रोह से पार्टी पर कब्जे की कोशिश तक
तृणमूल कांग्रेस में संकट 2026 के विधानसभा चुनाव में हार और उसके बाद पार्टी में हुए विद्रोह के बाद शुरू हुआ. पहली बार विधायक बने ऋतब्रत, जिन्हें बाद में तृणमूल कांग्रेस ने निष्कासित कर दिया, इस विद्रोह का चेहरा बनकर उभरे.
जून तक बागी गुट ने तृणमूल कांग्रेस के 80 में से करीब 60 विधायकों के समर्थन का दावा किया. इन विधायकों ने ऋतब्रत को तृणमूल कांग्रेस विधायक दल का नेता चुना. इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष ने उन्हें विपक्ष के नेता के तौर पर मान्यता दी.
शुरुआत में बागियों ने कहा था कि वे तृणमूल कांग्रेस छोड़ना नहीं चाहते. उनका कहना था कि ममता को पार्टी की नेता बनी रहना चाहिए लेकिन पार्टी के कामकाज में बदलाव की जरूरत है. खास तौर पर उनके भतीजे और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर. हालांकि टकराव जल्द ही आंतरिक सुधार के सवालों से आगे बढ़ गया.
22 जून को प्रतिद्वंद्वी गुट ने कोलकाता के एक होटल में पार्टी का विशेष अधिवेशन बुलाया और दावा किया कि उसने रॉय को राष्ट्रीय कार्यसमिति का अध्यक्ष चुन लिया है. इसके बाद ऋतब्रत ने उस संगठन की ओर से चुनाव आयोग से संपर्क किया. ममता के गुट ने इस पूरी कवायद को असंवैधानिक बताया.

मुख्य कानूनी विवाद पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति के कार्यकाल और उसके अधिकार को लेकर है. ऋतब्रत के गुट का तर्क था कि कार्यसमिति का कार्यकाल 11 फरवरी 2025 को खत्म हो गया था. इसलिए इसके बाद की गई नियुक्तियां जिनमें ममता के गुट की नियुक्तियां भी शामिल हैं, अमान्य हैं.
ममता के गुट का कहना था कि कार्यसमिति का कार्यकाल पांच साल का है और इसलिए यह 2027 तक जारी रहेगा. चुनाव आयोग के सामने ममता के गुट का प्रतिनिधित्व कर रहे डेरेक ओ'ब्रायन ने पार्टी के नियमों और चुनाव आयोग के साथ पहले हुए पत्राचार का हवाला देते हुए पांच साल के कार्यकाल के तर्क का समर्थन किया.
इसके बाद विवाद अदालतों तक पहुंच गया. अलीपुर की एक सिविल अदालत ने 7 जुलाई को अंतरिम आदेश जारी कर ममता और उनके जरिए काम करने वाले लोगों को 22 जून के विशेष अधिवेशन में चुनी गई राष्ट्रीय कार्यसमिति के कामकाज में हस्तक्षेप करने से रोक दिया. साथ ही उन्हें पार्टी के रिकॉर्ड, फंड, बैंक खातों और संपत्तियों से संबंधित काम करने से भी रोका गया.
लेकिन 6 अगस्त के आदेश में अदालत ने साफ किया कि उसका अंतरिम आदेश आरक्षित चुनाव चिह्न के सवाल पर कोई फैसला नहीं करता. इस मामले में अधिकार सिर्फ चुनाव आयोग के पास है.
यह अंतर अब महत्वपूर्ण हो गया है. चुनाव आयोग ने यह नहीं कहा है कि रॉय के गुट का तृणमूल कांग्रेस पर मालिकाना हक है. न ही उसने यह घोषित किया है कि ममता ने स्थाई रूप से पार्टी खो दी है. आयोग ने सिर्फ यह कहा है कि दो प्रतिद्वंद्वी दावेदार हैं और पैराग्राफ 15 के तहत ठोस फैसला अभी होना बाकी है.
तृणमूल कांग्रेस के सूत्रों का दावा है कि 6 जुलाई से 12 सितंबर के बीच बागी गुट ने चुनाव आयोग को एक लाइन का भी जवाब नहीं दिया. सूत्रों के मुताबिक, इन 72 दिनों के दौरान चुनाव आयोग ने कुछ नहीं कहा और उपचुनावों की घोषणा के बाद ही प्रक्रिया आगे बढ़ी. ऋतब्रत के गुट का चुनाव आयोग से एकमात्र संपर्क समय बढ़ाने की मांग को लेकर था.
ममता के लिए इसका क्या मतलब है
ममता के लिए तात्कालिक राजनीतिक समस्या पहचान की है. उपचुनावों में वह दो फूल वाले चुनाव चिह्न से मिलने वाली मतदाताओं की पहचान पर अब निर्भर नहीं रह सकतीं. नए नाम और चुनाव चिह्न का मतलब है कि प्रचार सामग्री और झंडों से लेकर बूथ स्तर की लामबंदी और मतदाताओं तक संदेश पहुंचाने तक, सब कुछ तेजी से नए सिरे से तैयार करना होगा.
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस विवाद ने तृणमूल कांग्रेस पर नियंत्रण का सवाल, अंदरूनी राजनीतिक बहस से निकालकर औपचारिक संस्थागत लड़ाई में बदल दिया है. आखिरकार चुनाव आयोग को तय करना होगा कि किस गुट को पार्टी के तौर पर मान्यता दी जानी चाहिए.
पहले से दाखिल नामांकन इस चुनौती का पैमाना दिखाते हैं. रेजीनगर में कुछ उम्मीदवारों ने रॉय और ममता, दोनों की ओर से मिले अधिकृत पत्र के आधार पर तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर नामांकन दाखिल किया है. नंदीग्राम में भी ऐसा ही हुआ है. चुनाव आयोग ने असम में ममता की ओर से अधिकृत तृणमूल कांग्रेस के एक नामांकन का भी जिक्र किया.
इसके राजनीतिक असर बंगाल से बाहर भी पहुंच चुके हैं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने BJP और चुनाव आयोग पर विपक्षी दलों को विभाजित करने और इसके बाद उनके चुनाव चिह्न छीन लिए जाने वाले एक पैटर्न का आरोप लगाया.
कांग्रेस नेता ने पहले हुए शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के विवादों का भी जिक्र किया. उन्होंने इस पूरे मामले को ‘वोट चोरी, सरकार की चोरी और अब पार्टी की चोरी’ से जोड़ते हुए कहा कि यह सिर्फ ममता का मुद्दा नहीं है बल्कि राजनीतिक दलों और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की मांग करने वाले मतदाताओं का मुद्दा है.
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भी इस घटनाक्रम की आलोचना की. उन्होंने X पर एक पोस्ट में कहा कि चुनाव आयोग लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने वाले फैसले लेकर सम्मान हासिल कर सकता है. इसके बाद उन्होंने सवाल किया कि क्या उनकी पार्टी की ओर से चुनाव आयोग को दिए गए हलफनामे उसे मिले हैं.
विपक्ष की प्रतिक्रिया से ममता को वह चीज मिलती है जिस पर उन्होंने राजनीतिक अलगाव के दौर में अक्सर भरोसा किया है: विपक्षी दलों के साथ किए जा रहे व्यवहार को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस. लेकिन ज्यादा अहम लड़ाई बंगाल के भीतर ही है- संगठन, विधायक, संपत्ति, कैडर नेटवर्क और आखिरकार तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक विरासत पर.
फिलहाल चुनाव आयोग ने उस विरासत के सबसे पहचाने जाने वाले हिस्से- ‘फूल-घास’ चुनाव चिह्न फ्रीज कर दिया है. इससे इतिहास का एक असाधारण क्षण सामने आया है: ममता की बनाई पार्टी बंगाल के एक चुनाव में उस नाम और चुनाव चिह्न के बिना उतरेगी, जिसके सहारे उन्होंने इसे खड़ा किया था.
अभी यह सिर्फ अस्थाई चुनावी परेशानी है या तृणमूल कांग्रेस के स्थाई पुनर्गठन की शुरुआत, यह आगे साफ होगा. यह चुनाव आयोग के पैराग्राफ 15 के तहत होने वाले अंतिम फैसले और इस पर निर्भर करेगा कि तब तक संगठन पर किस गुट का नियंत्रण रहता है.

