
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता तेजस्वी यादव ने 19 अगस्त को पटना में लोक भवन (बिहार के राज्यपाल का आधिकारिक आवास) तक मार्च निकाला. यह मार्च पेपर लीक, छात्र आंदोलनों और सिवान में एक युवा प्रदर्शन के दौरान पुलिस कांस्टेबल के AK-47 इस्तेमाल के मुद्दे को लेकर था.
लेकिन राजनीतिक तौर पर यह इससे कहीं बड़ी बात थी. इसका मकसद राज्य में सड़कों पर अपनी पकड़ और शायद अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता भी फिर से हासिल करना था.
विपक्ष के नेता ने RJD कार्यकर्ताओं और समर्थकों के साथ मार्च का नेतृत्व किया. उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, बेरोजगारी और छात्र प्रदर्शनों पर पुलिस की कार्रवाई को लेकर कदम उठाने की मांग की.
प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने पानी की बौछारें कीं. यादव और RJD के कई अन्य नेताओं, जिनमें मीसा भारती भी शामिल थीं, को कुछ समय के लिए हिरासत में लिया गया.
तेजस्वी का यह कदम RJD के लिए राजनीतिक रूप से कमजोर दौर में आया है. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी को बड़ा झटका लगा था. उसे 243 में से सिर्फ 25 सीटें मिली थीं जबकि पिछली विधानसभा में उसके पास 75 सीटें थीं.
इसके आठ महीने बाद एक और चेतावनी सामने आई. बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में RJD उम्मीदवार रेखा कुमारी गुप्ता तीसरे स्थान पर रहीं और उनकी जमानत जब्त हो गई. जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने 64,000 से ज्यादा वोटों से सीट जीती और इस सीट पर BJP का तीन दशक पुराना कब्जा खत्म कर दिया.

बिहार की प्रमुख विपक्षी ताकत रहने की आदी RJD के लिए बांकीपुर का नतीजा खास तौर पर असहज करने वाला था. गुप्ता 2025 के चुनाव में इसी सीट पर दूसरे स्थान पर रही थीं. उनका तीसरे स्थान पर खिसक जाना और जमानत बचाने के लिए जरूरी वोट भी हासिल नहीं कर पाना तेजस्वी के सामने खड़ा बड़ा सवाल है.
इस पृष्ठभूमि में तेजस्वी का छात्र मुद्दे को अपने हाथ में लेना महत्वपूर्ण लगता है. हाल के महीनों में विपक्षियों और कुछ राजनीतिक जानकारों ने नेतृत्व को लेकर उनकी आलोचना की है. उन पर विधानसभा सत्र के दौरान लंबे समय तक गैरहाजिर रहने और बांकीपुर उपचुनाव में सीमित प्रचार करने को लेकर भी सवाल उठे हैं.
लोक भवन मार्च ने तेजस्वी को जमीन पर अपनी मौजूदगी फिर से दर्ज कराने का मौका दिया. साथ ही समर्थकों और विरोधियों को यह याद दिलाने का भी कि वे अब भी बिहार के प्रमुख विपक्षी नेता हैं.
लेकिन एक बड़ा प्रदर्शन शायद ही काफी होगा. छात्रों और युवाओं में बढ़ते गुस्से को राजनीतिक ताकत में बदलने के लिए उन्हें इस मुद्दे से लगातार जुड़े रहना होगा, उनकी चिंताओं के प्रति विश्वसनीयता कायम करनी होगी और ज्यादा सक्रिय व जमीन पर नजर आने वाले नेतृत्व का प्रदर्शन करना होगा.
बिहार में हालिया छात्र आंदोलन RJD के अभियान के तौर पर शुरू नहीं हुआ था. इसके बड़े हिस्से का नेतृत्व छात्र और युवा संगठनों ने किया था, जिनमें ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) और रिवोल्यूशनरी यूथ एसोसिएशन (RYA) शामिल हैं.
25 जुलाई को इन संगठनों ने NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं और छात्रों पर पुलिस की कार्रवाई के विरोध में बिहार बंद का आह्वान किया था. इसके बाद पटना, सिवान, छपरा और आरा समेत कई जिलों में प्रदर्शन हुए.
तेजस्वी ने इस आंदोलन से बनी स्थिति को अपने पक्ष में करने की कोशिश की है. उन्होंने BJP के नेतृत्व वाली सरकार पर बिहार की परीक्षा व्यवस्था को बर्बाद होने देने का आरोप लगाया. उनका कहना है कि पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों को पीटा गया और उन पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया गया.

RJD नेता ने सिवान की घटना में शामिल कांस्टेबल के खिलाफ ही नहीं, बल्कि AK-47 राइफल के इस्तेमाल का आदेश देने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की.
पार्टी के राज्यसभा सदस्य मनोज झा इस मुद्दे पर कहते हैं, "बुनियादी सवाल यह है कि छात्रों पर AK-47 क्यों चलाई गई? बुनियादी सवाल यह भी है कि एक भी परीक्षा निष्पक्ष तरीके से क्यों नहीं हो रही है. उन्होंने शिक्षा और रोजगार की पूरी व्यवस्था को गिरवी रख दिया है."
BJP ने तेजस्वी के मकसद पर सवाल उठाया. बिहार में BJP के वरिष्ठ नेता डॉ. निखिल आनंद ने कहा, "तेजस्वी यादव ऐसे ‘भागे हुए विपक्षी नेता’ बन गए हैं, जिन्हें लगता है कि उन्हें ऐश की जिंदगी मिल रही है. बांकीपुर में RJD की जमानत जब्त होने के बाद वह इस आंदोलन के जरिए अपनी खोई हुई प्रासंगिकता वापस पाने की बेताब कोशिश कर रहे हैं. लेकिन बिहार की जनता उनकी पार्टी को पहले ही खारिज कर चुकी है. उन्होंने अपना फैसला साफ कर दिया है."
कई लोगों के लिए RJD का लोक भवन मार्च की रणनीति बनाना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है. क्या तेजस्वी वास्तव में युवाओं के आंदोलन को आवाज दे रहे हैं या उस आंदोलन को अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं जो उनकी पार्टी से बाहर शुरू हुआ?
छात्रों के विरोध की वजह बनी समस्याएं विपक्षी दलों की बनाई हुई नहीं हैं. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए पेपर लीक या भर्ती प्रक्रिया में अनियमितता का मतलब महीनों या वर्षों की मेहनत का बेकार हो जाना हो सकता है.
बिहार लंबे समय से शिक्षित बेरोजगारी और पलायन जैसी बड़ी समस्याओं से भी जूझता रहा है. ऐसे में मौजूदा आंदोलन ने विपक्ष को एक असामान्य मौका दिया है. वह ऐसे मुद्दे से जुड़ सकता है जिसका छात्रों के बीच भावनात्मक असर है.
तेजस्वी की राजनीतिक रणनीति आंदोलन खड़ा करने से कम और उसकी गति का फायदा उठाने से ज्यादा जुड़ी दिखती है. जैसे ही आंदोलन का राजनीतिक वजन बढ़ा, वे खुद को उसके आगे रखने की कोशिश कर रहे हैं. इसकी एक बड़ी वजह है: प्रशांत किशोर.
किशोर के निर्वाचित राजनेता के तौर पर उभरने ने तेजस्वी की स्थिति को और जटिल बना दिया है. बांकीपुर के नतीजे ने दिखाया कि बिहार के मतदाताओं का एक वर्ग पारंपरिक RJD-NDA मुकाबले से बाहर के राजनीतिक विकल्प का समर्थन करने को तैयार है.
किशोर ने अपनी राजनीतिक पहचान सुशासन, शिक्षा, रोजगार और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द बनाई है. यही वे मुद्दे हैं, जो युवा मतदाताओं के बीच खास तौर पर असर रखते हैं.
यह तेजस्वी के लिए सीधी चुनौती है. RJD नेता कई वर्षों से अपनी पार्टी की पारंपरिक सामाजिक न्याय और जाति आधारित राजनीतिक पहचान से आगे निकलने और खुद को नए बिहार के युवा नेता के तौर पर पेश करने की कोशिश करते रहे हैं.
2020 के चुनाव में RJD के नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता के काफी करीब पहुंचा था, जिससे उनकी यह रणनीति सफल होती दिखी थी. 2025 के चुनाव ने ऐसा नहीं किया. बांकीपुर ने इस समस्या को और ज्यादा साफ कर दिया.
किशोर के पास अब चुनावी जनादेश और विधानसभा में एक सीट है. तेजस्वी अब भी विपक्ष के नेता हैं और उनके पास राज्यभर में कहीं मजबूत संगठन है. लेकिन अब वे यह मानकर नहीं चल सकते कि NDA विरोधी राजनीति की जगह सिर्फ RJD की है.
यही वजह है कि छात्र मुद्दा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया है. पेपर लीक, भर्ती में अनियमितता, बेरोजगारी और पुलिस कार्रवाई जैसे मुद्दे उठाकर तेजस्वी सीधे उस वर्ग से बात कर रहे हैं, जिसमें बिहार की राजनीति को बदलने की क्षमता है.
ये ऐसे युवा मतदाता हैं, जिनका जुड़ाव पारंपरिक राजनीतिक दलों से कम हो सकता है. लोक भवन मार्च तेजस्वी को एक जानी-पहचानी राजनीतिक भूमिका में लौटने का मौका देता है. यानी सड़क पर विपक्ष के नेता के तौर पर सरकार का सामना करना और खुद को आम लोगों की आवाज के रूप में पेश करना.
लेकिन अगर युवा प्रदर्शनकारी RJD को सिर्फ अपने आंदोलन को हथियाने की कोशिश करने वाले एक और राजनीतिक संगठन के रूप में देखते हैं तो तेजस्वी को सुर्खियां तो मिल सकती हैं, लेकिन विश्वसनीयता नहीं. आंदोलन की शुरुआती लामबंदी स्वतंत्र छात्र और युवा संगठनों ने की थी. इसलिए यह अंतर खास तौर पर महत्वपूर्ण है.
RJD की अपनी विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में है. इसलिए तेजस्वी के सामने चुनौती प्रदर्शन को राजनीतिक प्रासंगिकता में बदलने की है.
फिलहाल छात्र आंदोलन तेजस्वी को वह चीज देता है, जिसकी उन्हें सख्त जरूरत है. ऐसा मुद्दा, जो जाति और पारंपरिक राजनीतिक निष्ठाओं से आगे जाकर लोगों को जोड़ता है. लेकिन क्या यह आगे चलकर युवाओं का स्थाई समर्थन हासिल करने में बदल पाएगा, यह अलग सवाल है.
तेजस्वी के लिए दांव पर बहुत कुछ लगा है. 2025 के चुनावी झटके, बांकीपुर की हार और किशोर के नए विपक्षी चेहरे के तौर पर उभरने के बाद सड़कों ने उनको उस पीढ़ी से फिर जुड़ने का मौका दिया है, जो स्थापित राजनीतिक दलों से लगातार निराश हो रही है.
सवाल यह है कि यह पीढ़ी तेजस्वी में एक राजनीतिक नेता देखती है या सिर्फ अपनी मांगों को उठाने वाला व्यक्ति. और शायद यही सबसे मुश्किल सवाल है, जिसका जवाब अब तेजस्वी यादव को देना होगा.

