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एक नए कानून के बाद सूरत का डायमंड कारोबार दुबई-एंटवर्प को छोड़ेगा पीछे?

रफ डायमंड की बिक्री पर 2041 तक जीरो इनकम टैक्स से भारत कारोबार को सूरत और मुंबई लाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन दुबई-एंटवर्प की मजबूत पकड़ के बीच सूरत को ग्लोबल ट्रेडिंग हब बनाने की राह में अभी कई चुनौतियां हैं

दुनिया के 90 फीसदी हीरों की कटिंग-पॉलिशिंग भारत में होती है
अपडेटेड 20 अगस्त , 2026

भारत की संसद में पारित हुआ एक नया टैक्स कानून एंटवर्प और दुबई के लिए हीरा कारोबार में अपनी पहचान बचाए रखने का संकट खड़ा कर सकता है. दुनिया का हीरा कारोबार एक अजीब बंटवारे पर चलता है.

दुनिया में बिकने वाले हर 10 में से करीब 9 हीरों की कटिंग और पॉलिशिंग भारत में होती है, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा सूरत का है. लेकिन इन हीरों के कच्चे रूप यानी रफ डायमंड की खरीद-बिक्री, किसी कारीगर के हाथ लगने से पहले, एंटवर्प और दुबई जैसे दूर के शहरों में होती है.
 
संसद ने अब इस व्यवस्था को बदलने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. टैक्सेशन एंड अदर लॉज अमेंडमेंट बिल, 2026 के तहत इस साल 1 अक्टूबर से मार्च 2041 तक मुंबई और सूरत के विशेष कस्टम एरिया में रफ डायमंड बेचने वाली विदेशी कंपनियों को कोई आयकर नहीं देना होगा.
 
फिलहाल बोत्सवाना या अंगोला की किसी खदान से निकला कच्चा हीरा एक साधारण भूरे पत्थर जैसा होता है. उसे छांटना, उसकी कीमत तय करना और सही खरीदार तक पहुंचाना जरूरी होता है. एंटवर्प यह काम पिछले 400 साल से कर रहा है. उसके पास इसके लिए बैंक, ब्रोकर और कारोबार में भरोसे का पूरा नेटवर्क है.

वहां होने वाली बिक्री पर 0.187 प्रतिशत टैक्स लगता है. दुबई में कोई टैक्स नहीं है. विदेशी कंपनियां वहां अपने कारोबार की पूरी मालिक हो सकती हैं और अपना पैसा आसानी से बाहर ले जा सकती हैं. 2025 में भारत दुनिया में रफ डायमंड का सबसे बड़ा आयातक बाजार था. उसने 106.09 मिलियन कैरेट के रफ डायमंड आयात किए, जिनकी कीमत 11.07 अरब डॉलर थी.
 
इस पूरी श्रृंखला के आखिर में सूरत आता है. यहां के हीरा कारीगर उन पत्थरों को खरीदते हैं जो पहले ही किसी और के हाथों से गुजर चुके होते हैं. उस पर किसी और का मुनाफा जुड़ चुका होता है और उसकी कीमत और उपलब्धता का समय भी किसी और ने तय किया होता है.

पिछले कुछ वर्षों में कारोबार का रुख एक ही दिशा में गया है. भारत के रफ डायमंड आयात में दुबई की हिस्सेदारी 2019-20 के 36 से बढ़कर 2023-24 में 60 प्रतिशत से ज्यादा हो गई, जबकि बेल्जियम की हिस्सेदारी करीब आधी रह गई.

हीरा कारोबार के लिए तैयार किया गया सूरत डायमंड बोर्स
हीरा कारोबार के लिए तैयार किया गया सूरत डायमंड बोर्स

तो फिर भारत खुद इन पत्थरों का कारोबार क्यों नहीं कर सकता था? इसकी वजह थी टैक्स. भारत ने विशेष अधिसूचित क्षेत्र बनाए थे. ये सुरक्षित कस्टम क्षेत्र हैं, जहां विदेशी खनन कंपनियां भारतीय खरीदारों को अपने हीरे दिखा सकती थीं लेकिन जैसे ही वहां बिक्री होती, मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा टैक्स में चला जाता. इसलिए खनन कंपनियां भारत में अपना माल दिखातीं, फिर उसे बेचने के लिए दुबई ले जातीं और उसके बाद दोबारा भारत भेजतीं.
 
अनुमान के मुताबिक करीब 60 प्रतिशत हीरों को इस बेकार के चक्कर से गुजरना पड़ता था. 2024 में सरकार ने इसमें बदलाव की कोशिश की. विदेशी खनन कंपनियों को अपनी पूरी आय और खर्च की जानकारी देने के बजाय ऐसी बिक्री पर 4 प्रतिशत का तय मुनाफा घोषित करके उसी पर टैक्स देने की अनुमति दी गई.

लेकिन टैक्स तब भी देना पड़ता था. साथ ही यह सुविधा सिर्फ खनन कंपनियों के लिए थी, ब्रोकर और नीलामी कंपनियों के लिए नहीं. जबकि रफ डायमंड का ज्यादातर कारोबार इन्हीं के जरिए होता है. इसलिए यह समाधान काम नहीं कर पाया.
 
अब नए कानून ने दोनों समस्याओं को दूर करने की कोशिश की है. जीरो टैक्स बेल्जियम के 0.187 प्रतिशत से भी कम है. साथ ही अब इसमें ब्रोकर, एग्रीगेटर और नीलामी कंपनियां भी शामिल हैं. यही वे बिचौलिए हैं जो रफ डायमंड के बाजार को असल में चलाते हैं और जिन्हें पिछली व्यवस्था में बाहर रखा गया था.

उद्योग जगत के दिग्गज कारोबारियों का मानना है कि इस कदम से रफ डायमंड खरीदने में लगने वाला समय कम होगा, कच्चे हीरों की उपलब्धता बेहतर होगी, कारोबार बढ़ेगा और पूरी डायमंड वैल्यू चेन में भारत की भूमिका मजबूत होगी.
 
कानून पास होने के एक हफ्ते बाद ही इसके असर की झलक देखने को मिली. नामीबिया का एक सरकारी प्रतिनिधिमंडल मुंबई आया और भारत के साथ सीधे रफ डायमंड कारोबार की संभावनाएं तलाशीं. किम्बर्ली प्रोसेस, जो संघर्ष वाले इलाकों से आने वाले हीरों को वैध कारोबार से बाहर रखने के लिए बना अंतरराष्ट्रीय सरकारी मंच है, के आंकड़ों के अनुसार नामीबिया ने 2025 में 2.09 मिलियन कैरेट हीरे पैदा किए.

इनकी कुल कीमत 72.14 करोड़ डॉलर थी. प्रति कैरेट औसत कीमत 343.88 डॉलर रही, जो दुनिया के किसी भी हीरा उत्पादक देश में सबसे ज्यादा थी. कीमत के लिहाज से नामीबिया दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा हीरा उत्पादक देश है और दुनिया के कुल रफ डायमंड उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी करीब 8 प्रतिशत है.
 
इस नीति से सूरत और मुंबई के दुनिया के प्रमुख रफ डायमंड ट्रेडिंग सेंटर के रूप में विकसित होने की उम्मीद भी है. इससे क्षेत्र में निर्यात, निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं.
 
लेकिन सिर्फ टैक्स कानून बदलने से कारोबार का बाजार नहीं बन जाता. जेम्स एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के अध्यक्ष किरीट भंसाली के मुताबिक भारत को अब तक पीछे रखने वाली चीज क्षमता या योग्यता नहीं बल्कि कारोबार को लेकर निश्चितता की कमी थी. उनके अनुसार 2041 तक यानी 15 साल की कानूनी टैक्स छूट से यह समस्या दूर हो गई है.
 
जेम्स एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ने सरकार से व्यापार और कस्टम नियमों में बदलाव की मांग की है ताकि ब्रोकरों और दूसरे बिचौलियों को वास्तव में इन विशेष क्षेत्रों में काम करने की अनुमति मिल सके. टैक्स विभाग को अभी इन नियमों से जुड़ी प्रक्रिया जारी करनी है.

इन विशेष क्षेत्रों की मौजूदा व्यवस्था भी इस सोच पर बनी है कि खरीदार भारतीय होगा. इसका मतलब है कि भारत अभी एक सस्ती जगह तो बन सकता है लेकिन ऐसा अंतरराष्ट्रीय बाजार नहीं बना है जहां विदेशी कंपनियां आपस में ही कारोबार कर सकें.
 
एंटवर्प और दुबई अपना कारोबार समेटने नहीं जा रहे. फिलहाल सूरत के हीरा कारोबारियों को इससे इतना फायदा जरूर मिलेगा कि कच्चे हीरे उनके करीब मिलेंगे, उन्हें कम दूरी तक भेजना होगा और बिचौलियों के बजाय सीधे खरीद का मौका बढ़ेगा.

मुंबई पहले से ही अंतरराष्ट्रीय संपर्क और बड़े शहर के रूप में दुनिया के नक्शे पर है. लेकिन सूरत के पास अभी मुंबई के लिए भी सीधी फ्लाइट नहीं है, तेल अवीव या ब्रुसेल्स जैसे शहरों की तो बात ही अलग है.

सूरत डायमंड बोर्स के 4,200 दफ्तरों को कारोबारियों और हीरा कारीगरों को आकर्षित करने में अब तक मुश्किल आ रही है. ऐसे में यह टैक्स छूट वहां के पूरे कारोबार को एक जरूरी बढ़ावा दे सकती है. इससे बैंक, ब्रोकर, प्रमाणन एजेंसियां और हीरा कारोबार से जुड़ी दूसरी कंपनियां भी सूरत में अपना काम शुरू करने के लिए आकर्षित हो सकती हैं.

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