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असम में हलचल मचाने वाली संविधान की धारा 6ए क्या है?

भारतीय संविधान की धारा 6ए के मुताबिक 1 जनवरी 1966 से पहले असम में रहने वाले विदेशियों के पास भारतीय नागरिकों के समान अधिकार और दायित्व होंगे. सुप्रीम कोर्ट में इसकी वैधता के खिलाफ सुनवाई चल रही है

सुप्रीम कोर्ट नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है
अपडेटेड 6 दिसंबर , 2023

भारत के चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ के नेतृत्व में पांच जजों वाली एक संविधान पीठ नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है. पांच न्यायाधीशों वाली इस पीठ में जस्टिस सूर्यकांत, एम.एम. सुंदरेश, जे.बी. पारदीवाला, और मनोज मिश्रा भी शामिल हैं.

संविधान की धारा 6ए, 1955 अधिनियम में जोड़ा गया एक अनूठा प्रावधान है जो कि 15 अगस्त 1985 को हस्ताक्षरित 'असम समझौते' के हिस्से के रूप में अधिनियमित किया गया था. इसके पीछे मकसद राजीव गांधी सरकार और असम आंदोलन के नेताओं की तरफ से दस्तखत किए गए इस समझौते के तहत असमिया संस्कृति, विरासत और सामाजिक पहचान को संरक्षित करना था.

भारतीय संविधान में यह प्रावधान खास तौर पर  पड़ोसी बांग्लादेश से आए अवैध अप्रवासियों की पहचान करने और उन्हें निर्वासित करने के लिए ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) के छह साल के आंदोलन के बाद आया है. ऐसे में अब यह समझना भी जरूरी हो जाता है कि आखिर संविधान की धारा 6ए है क्या? 

भारतीय संविधान की धारा 6ए के मुताबिक 1 जनवरी 1966 से पहले असम में रहने वाले विदेशियों के पास भारतीय नागरिकों के समान अधिकार और दायित्व होंगे. 1 जनवरी, 1966 और 25 मार्च, 1971 के बीच राज्य में प्रवेश करने वालों के पास 10 वर्षों तक वोट देने के अधिकार को छोड़कर, समान अधिकार और दायित्व होंगे. हालांकि केंद्र सरकार का कहना है कि धारा 6ए कानूनी तौर पर सही है और उसने अदालत से सभी याचिकाओं को खारिज करने की अपील की है. ये सभी याचिकाएं धारा 6 ए लागू होने के 40 साल बाद दायर की गईं थीं. वहीं इस मामले में असम पब्लिक वर्क्स सहित दूसरे याचिकाकर्ताओं का कहना है कि आप्रवासियों, विशेष रूप से अवैध लोगों को नागरिकता देने में धारा 6ए अपनी प्रकृति में ही भेदभाव से ग्रसित है और यह संविधान की धारा 6 का भी उल्लंघन है. धारा 6 , 19 जुलाई, 1948 तक आप्रवासियों को नागरिकता देने के लिए कटऑफ तिथि के बारे में बताती है. 

क्यों हो रहा है इसे लेकर विवाद 

गुवाहाटी के नागरिक समाज संगठन असम संमिलिता महासंघ ने मार्च 1971 की मतदाता सूची के बजाय 1951 एनआरसी के आधार पर असम के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को अपडेट करने की मांग की है. दिसंबर 2014 में, सुप्रीम कोर्ट ने धारा 6ए की संवैधानिकता से संबंधित अलग अलग मुद्दों को शामिल करते हुए 13 सवालों की लिस्ट तैयार की थी और 2015 में तीन जजों की बेंच ने मामले को संविधान पीठ के पास भेज दिया. इन सवालों में असम के नागरिकों के राजनीतिक अधिकारों पर इसका प्रभाव और क्या इसने असमिया लोगों की सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने के अधिकारों का उल्लंघन किया है जैसे मामले शामिल थे.

पिछले कई सालों से धारा 6ए का मामला अटका हुआ है. साल 2019 में अंतिम असम एनआरसी लिस्ट को सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में तैयार किया गया था. इस लिस्ट में 10 लाख से भी ज्यादा लोगों को बाहर रखा गया था. वहीं भारत में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम लागू किया जा चुका है जिसके मुताबिक अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों के अप्रवासियों को तुरंत ही नागरिकता मिल सकती है.

इसके बाद 20 नवंबर 2019 को, गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में ऐलान किया कि भारत सरकार नागरिकों का एक राष्ट्रव्यापी रजिस्ट्री बनाएगी. इसे पहले 1951 में केवल असम के लिए पेश किया गया था. 12 दिसंबर 2019 को तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को मंजूरी दे दी. सीएए ने भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन किया, ताकि 2014 से पहले अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से भारत में प्रवेश करने वाले व्यक्तियों के लिए भारतीय नागरिकता हासिल करना आसान हो सके. हालांकि इसका फायदा केवल केवल हिंदू, सिख, जैन, पारसी, बौद्ध और ईसाई धर्म से संबंधित लोगों को दिया जाना था. इस दौरान असम भारत का इकलौता ऐसा राज्य है जिसे NRC प्रैक्टिस के लिए चुना गया है. इस संदर्भ में बात करते हुए हमें असम समझौते के बारे में भी जान लेना जरूरी है. 

क्या है असम समझौता

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद साल 1979 में, ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (एएएसयू) ने इस डर से कि बांग्लादेशी आप्रवासी असम की मूल आबादी पर हावी हो जाएंगे, एक आंदोलन शुरू किया जो छह साल तक चला. उनकी मांग थी कि असम में सभी अवैध विदेशियों की पहचान की जाए और उन्हें निकाला जाए. 1985 में, आंदोलनकारियों और भारत सरकार के बीच असम समझौते नामक एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए. इस समझौते के तहत तीन कटेगरी बनाई गई जिनके आधार पर भारत की नागरिकता दी जानी थी. 

1- 1 जनवरी 1966 से पहले असम में प्रवेश करने वाले अप्रवासियों को भारतीय नागरिक माना जाएगा और उन्हें मतदान करने की मंजूरी दी जाए. 

2- 1 जनवरी 1966 के बाद लेकिन 24 मार्च 1971 से पहले असम में प्रवेश करने वाले अप्रवासियों को भारतीय नागरिक माना जाएगा, लेकिन भारतीय नागरिक के रूप में पहचाने जाने के बाद पहले 10 वर्षों तक उन्हें मतदान करने की अनुमति नहीं दी जाएगी.

3- 25 मार्च 1971 को या उसके बाद असम में प्रवेश करने वाले अप्रवासियों को अवैध अप्रवासी माना जाएगा और उन्हें भारत से निष्कासित कर दिया जाएगा.

नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6ए, जिसमें असम राज्य के लिए विशेष प्रावधान शामिल हैं, असम समझौते को प्रभावी बनाने के लिए पेश की गई थी.

यहां पर यह बात भी निकल आती है कि जो नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6ए में निर्धारित शर्तों पर आधारित है, नागरिकता अधिनियम की धारा 3 के बिल्कुल उलट है. धारा 3 कहती है कि 26 जनवरी 1950 को या उसके बाद लेकिन 1 जुलाई 1987 से पहले भारत में पैदा हुआ कोई भी व्यक्ति जन्म से नागरिक माना जाएगा. 1 जुलाई 1987 को या उसके बाद 2 दिसंबर 2004 तक जन्मे किसी भी व्यक्ति को भारतीय नागरिक माना जाएगा यदि उनके जन्म के समय उनके माता-पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक था.

3 दिसंबर 2004 को या उसके बाद जन्मे किसी भी व्यक्ति को भारतीय नागरिक माना जाएगा यदि उनके माता-पिता दोनों भारत में पैदा हुए थे या यदि माता-पिता में से एक भारतीय नागरिक है और दूसरा जन्म के समय अवैध अप्रवासी नहीं था. विशेष रूप से, असम एकमात्र भारतीय राज्य है जहां नागरिकता के लिए कट-ऑफ तारीख है.  नतीजतन, 40 लाख से अधिक लोग जो भारत में पैदा हुए थे या जो कई दशकों से भारत में रह रहे थे, उन्हें राज्यविहीन घोषित किए जाने का खतरा था. इन चिंताओं के बावजूद, और खुली अदालत में सुप्रीम कोर्ट के बयान में कहा गया है कि 30 जून 1987 से पहले पैदा हुए व्यक्तियों को एनआरसी से बाहर नहीं किया जाएगा, कोर्ट ने 2019 में 1950 और 1987 के बीच असम में पैदा हुए लाखों लोगों को बाहर करने की एनआरसी समन्वयक की सिफारिश को बरकरार रखा. 

अंतिम असम एनआरसी सूची 31 अगस्त 2019 को जारी की गई थी. जिसमें  उन बच्चों सहित 19 लाख लोगों को बाहर कर दिया गया, जिनके माता-पिता अंतिम सूची में शामिल थे. इसे लेकर चिंताएं आंशिक रूप से तब शांत हुईं जब पूर्व अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने 6 जनवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया कि सूची से बाहर किए गए बच्चों को उनके माता-पिता (जिनके नाम एनआरसी में शामिल थे) से अलग नहीं किया जाएगा और हिरासत शिविरों में नहीं भेजा जाएगा. नवंबर 2020 में, असम राज्य सरकार ने "दोषपूर्ण" एनआरसी सूची में संशोधन की मांग की, जिसमें उन्होंने दावा किया कि कई स्वदेशी व्यक्तियों को बाहर रखा गया है. 

इन सब में क्या है सुप्रीम कोर्ट का रोल 

अब यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है. साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद इसमें बदलाव भी शुरू कर दिया गया था. तब से ही कोर्ट इस प्रक्रिया की निगरानी कर रहा है. 2014 में, SC ने निर्देश दिया कि असम एनआरसी अभ्यास 31 जनवरी 2016 तक पूरा किया जाए. साथ ही, SC ने नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6A की संवैधानिकता पर 13 प्रश्नों को एक संविधान पीठ को भेजा. 10 जनवरी 2023 को, मुद्दे तय करते समय, बेंच ने 13 सवालों को कम करके एक बड़ा सवाल बना दिया. सवाल था कि "क्या नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 6ए किसी संवैधानिक कमजोरी से ग्रस्त है.अब आखिरकार, 17 अक्टूबर 2023 को, मामला भेजे जाने के बाद, नागरिकता के उस मामले पर फैसला करने के लिए एक संविधान पीठ नियुक्त की जाएगी.

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