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चीनी के बढ़ते दाम योगी सरकार के लिए बन सकते हैं दोहरी मुसीबत

चीनी 70 रुपए किलो पहुंचने से आम आदमी की रसोई और गन्ना किसान दोनों प्रभावित हैं. त्योहारों से पहले बढ़ी महंगाई 2027 में योगी सरकार के लिए नया सियासी मोर्चा खोल सकती है

CM Yogi Adityanath dismisses sugar shortage concerns in UP
यूपी सरकार ने चीनी की कालाबाजारी रोकने के लिए सख्त निर्देश दिए हैं
अपडेटेड 26 अगस्त , 2026

पिछले करीब 15 दिनों में खुदरा बाजार में चीनी के दाम 42-45 रुपए प्रति किलो से बढ़कर कई जगह 65-70 रुपए तक पहुंच गए हैं. यूपी में पिछले एक महीने में भी खुदरा कीमत करीब 48.18 रुपए से बढ़कर 65 रुपए प्रति किलो हुई है. यानी उपभोक्ता को एक किलो चीनी के लिए करीब 17 रुपए ज्यादा चुकाने पड़ रहे हैं. 

त्योहारों का मौसम सामने है और रक्षाबंधन, जन्माष्टमी से लेकर दीपावली तक चीनी की मांग बढ़ने वाली है. ऐसे में कीमतों की यह तेजी सिर्फ घरेलू बजट की चिंता नहीं है. उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से करीब एक साल पहले चीनी अब गन्ना किसान, चीनी मिल, उपभोक्ता और सरकार, चारों को जोड़ने वाला बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनती दिख रही है.

चीनी के दाम बढ़ने की वजह को लेकर बाजार और सरकार के दावों में अंतर है. व्यापारी कम उत्पादन, स्टॉक के गलत आकलन, अधिक निर्यात, एथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल और त्योहारों से पहले कम मासिक कोटे को इसकी वजह बता रहे हैं.

दूसरी ओर उत्तर प्रदेश शुगर मिल्स एसोसिएशन इन दावों को खारिज करते हुए कहता है कि मिलों के पास पर्याप्त कैरी-ओवर और रनिंग स्टॉक है और बाजार में. यानी चीनी की कमी नहीं है. केंद्र और राज्य सरकार भी जमाखोरी और कालाबाजारी पर सख्ती के साथ आयात और आपूर्ति बढ़ाने के उपाय कर रही हैं.

मिलों का कहना है कि उनके पास चीनी का पर्याप्त स्टॉक है
मिलों का कहना है कि उनके पास चीनी का पर्याप्त स्टॉक है

सवाल यही है कि अगर चीनी की कमी नहीं है तो कीमत इतनी तेजी से क्यों बढ़ी और अगर बाजार में पर्याप्त स्टॉक है तो आने वाले त्योहारों में आम आदमी को राहत कैसे मिलेगी?

गलत उत्पादन अनुमान से हुई गड़बड़

अमीनाबाद के व्यापारी मदनलाल अग्रवाल के मुताबिक इस बार चीनी उत्पादन का शुरुआती सरकारी अनुमान वास्तविक उत्पादन से मेल नहीं खाया. बाजार में अतिरिक्त स्टॉक मानकर चीनी का निर्यात किया गया, जबकि सीजन खत्म होने तक चीनी की घरेलू खपत के लिए अपेक्षित कैरी-फॉरवर्ड स्टॉक नहीं बचा.

अग्रवाल के मुताबिक आमतौर पर करीब 50 लाख टन कैरी-ओवर स्टॉक रहने की उम्मीद की जाती है, लेकिन इस बार यह 35-40 लाख टन तक रहने का अनुमान है. व्यापारियों के मुताबिक इससे बाजार पर 25-30 लाख टन की कमी जैसा दबाव बना है.

उत्तर प्रदेश के आंकड़े भी उत्पादन में गिरावट की तस्वीर दिखाते हैं. चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास विभाग के अनुसार 2023-24 में प्रदेश में गन्ने का रकबा 29.66 लाख हेक्टेयर था, जो 2025-26 में घटकर 28.61 लाख हेक्टेयर रह गया. यानी करीब 1.05 लाख हेक्टेयर, लगभग चार फीसद की कमी.

इसी अवधि में चीनी उत्पादन 104.13 लाख टन से घटकर 89.52 लाख टन रह गया. यानी उत्पादन में 14.61 लाख टन या करीब 14 फीसद की गिरावट आई. खास बात यह है कि गन्ने के रकबे में चार फीसदी की कमी के मुकाबले चीनी उत्पादन करीब साढ़े तीन गुना ज्यादा घटा.

लखनऊ में चंद्रभानु कृषि महाविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. सत्येंद्र कुमार सिंह बताते हैं, “गन्ने की फसल को मौसम के साथ-साथ कीट और रेड रॉट बीमारी से भी नुकसान हुआ. किसानों के सामने बढ़ती लागत और मौसम की अनिश्चितता ने भी गन्ने की खेती को चुनौती दी है. किसानों का रुझान अब गन्ने से हटकर मक्का और धान जैसी फसलों की ओर बढ़ रहा है. अगर यह रुझान जारी रहता है तो आने वाले वर्षों में चीनी उत्पादन और घरेलू उपलब्धता दोनों पर असर पड़ सकता है.”

उत्तर प्रदेश में इस बार गन्ने के रकबे में भी कमी आई है (सांकेतिक तस्वीर)
उत्तर प्रदेश में इस बार गन्ने के रकबे में भी कमी आई है (सांकेतिक तस्वीर)

यूपी डिस्टिलर्स एसोसिएशन के महासचिव रजनीश अग्रवाल के मुताबिक 2018 के बाद से कई डिस्टिलरी मक्का, चावल और अन्य अनाज आधारित हो चुकी हैं. दूसरी तरफ चीनी उत्पादन में खांडसारी की हिस्सेदारी भी 1.5 फीसद से घटकर करीब आधी रह गई है. यानी चीनी की आपूर्ति का संकट केवल मौजूदा बाजार की हलचल से नहीं जुड़ा है बल्कि उत्पादन ढांचे में हो रहे बदलाव भी इसके पीछे हैं.

एथेनॉल पर छिड़ी बहस

चीनी की कीमतों में तेजी के बीच एथेनॉल नीति सबसे विवादित मुद्दों में शामिल हो गई है. व्यापारियों का दावा है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति के तहत गन्ने के रस और शीरे का ऐसा इस्तेमाल हुआ जो चीनी के रूप में बाजार में आ सकता था. उनका अनुमान है कि करीब 20-30 लाख टन चीनी के बराबर गन्ने और उसके उत्पादों का इस्तेमाल एथेनॉल के लिए हुआ.

लखनऊ हजरतगंज के एक व्यापारी साहिल गुप्ता के मुताबिक जब इस साल उत्पादन पहले ही कमजोर था, तब करीब 20 फीसदी गन्ने के एथेनॉल की ओर जाने से चीनी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ा.

हालांकि सरकार इस तर्क को स्वीकार नहीं करती. यूपी में चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि कुल उत्पादित चीनी का करीब नौ फीसद हिस्सा ही एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल होता है और मौजूदा कीमत वृद्धि को केवल एथेनॉल नीति से जोड़ना सही नहीं है.

उत्तर प्रदेश शुगर मिल्स एसोसिएशन के महासचिव दीपक गुप्तारा ने भी एथेनॉल के लिए चीनी के डायवर्जन को कीमत बढ़ने की वजह बताए जाने को बेबुनियाद बताया है. उनका कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाली चीनी का हिस्सा कम हुआ है और उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा एथेनॉल सप्लायर है.

सरकार के मुताबिक चीनी की कीमत बढ़ने का इथेनॉल से कोई संबंध नहीं है (सांकेतिक तस्वीर)
सरकार के मुताबिक चीनी की कीमत बढ़ने का इथेनॉल से कोई संबंध नहीं है (सांकेतिक तस्वीर)

इस बहस का दूसरा पहलू भी है. मिलों का पेराई सत्र करीब 120 दिनों तक सीमित रह गया है, जबकि किसानों को गन्ने का भुगतान 15 दिनों के भीतर करने की कानूनी बाध्यता है. ऐसे में मिलों को लगातार नकदी की जरूरत रहती है. एथेनॉल उत्पादन मिलों के लिए नकदी प्रवाह का महत्वपूर्ण साधन बन गया है.

दूसरी तरफ चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य 2019 से 31 रुपए प्रति किलो पर स्थिर है जबकि गन्ने का एफआरपी और एसएपी बढ़ता रहा है. व्यापारियों का तर्क है कि अगर चीनी का बाजार भाव 47-48 रुपए प्रति किलो के आसपास स्थिर रहे और मिलों को पर्याप्त मार्जिन मिले तो वे एथेनॉल की तुलना में चीनी उत्पादन को प्राथमिकता देने के लिए अधिक प्रोत्साहित होंगी.

यानी एथेनॉल बनाम चीनी की बहस को केवल उत्पादन की कमी के सवाल से नहीं देखा जा सकता. यह मिलों की अर्थव्यवस्था, किसानों के भुगतान, चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य और सरकार की ऊर्जा नीति से भी जुड़ा हुआ है.

त्योहारों की मांग और कोटे में कमी

लखनऊ के रकाबगंज के थोक व्यापारी नंदन रस्तोगी के मुताबिक अगस्त में त्योहारों के बावजूद बाजार की अपेक्षा से कम मासिक कोटा जारी हुआ. व्यापारियों का कहना है कि पहले कीमतों में तेजी के दौरान साप्ताहिक कोटा व्यवस्था के जरिए बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति सुनिश्चित की जाती थी, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. इससे उपलब्ध स्टॉक पर दबाव बढ़ा.

सामान्य दिनों में देश में चीनी की मासिक खपत करीब 22 लाख टन रहती है, लेकिन सावन, रक्षाबंधन और दीपावली जैसे त्योहारों के दौरान यह बढ़कर 24-25 लाख टन तक पहुंच जाती है. मिठाई और बेकरी उद्योग की मांग बढ़ने के साथ घरेलू खपत भी बढ़ती है. ऐसे में उत्पादन घटने और उपलब्ध स्टॉक कम होने की स्थिति में मांग और आपूर्ति का अंतर कीमतों को और ऊपर धकेल सकता है.

इस बार गन्ने की रिकवरी में भी गिरावट बताई जा रही है. व्यापारियों के मुताबिक पहले 100 किलो गन्ने से करीब 10 किलो चीनी निकलती थी जबकि इस बार औसत रिकवरी करीब नौ किलो तक रह गई.

जून-जुलाई में अल-नीनो, सूखे और संभावित उत्पादन गिरावट की चर्चाओं ने भी बाजार में आशंका बढ़ाई. जब बाजार में भविष्य की कमी का अनुमान बनता है तो कारोबारी स्टॉक बढ़ाने लगते हैं और यही प्रक्रिया कीमतों में तेजी को और बढ़ा सकती है.

त्योहारी सीजन की वजह से चीनी की मांग में अतिरिक्त तेजी दिख रही है
त्योहारी सीजन की वजह से चीनी की मांग में अतिरिक्त तेजी दिख रही है

हालांकि उत्तर प्रदेश शुगर मिल्स एसोसिएशन का कहना है कि उसकी सदस्य मिलों के पास त्योहारों और रोजमर्रा की घरेलू खपत के लिए पर्याप्त स्टॉक है. एसोसिएशन के अनुसार राज्य में कुल 121 चीनी मिलें हैं, जिनमें 95 निजी क्षेत्र की हैं. केंद्र के खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग की ओर से जारी मासिक बिक्री कोटे के मुताबिक ये सभी मिलें बाजार में चीनी की आपूर्ति कर रही हैं.

एसोसिएशन ने चीनी की संभावित कमी की खबरों को अफवाह बताते हुए कहा है कि खुदरा कीमतों में हालिया उतार-चढ़ाव मुख्य रूप से अटकलों का परिणाम है. यानी एक तरफ व्यापारी कम स्टॉक और संभावित कमी की बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ मिल उद्योग पर्याप्त स्टॉक का दावा कर रहा है.

इस विरोधाभास ने सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही खड़ी की है कि बाजार में वास्तविक उपलब्धता कितनी है और कीमतों पर किसका प्रभाव ज्यादा है.

सरकार की सख्ती लेकिन राहत कब मिलेगी?

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चीनी की उपलब्धता और भंडारण की समीक्षा करते हुए अधिकारियों को निर्देश दिया है कि कोई कारोबारी 30 दिन से अधिक चीनी का भंडारण न करे. एक समय में 400 टन से अधिक स्टॉक रखने वाले डीलरों के खिलाफ कार्रवाई के साथ एस्मा के तहत भी सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए गए हैं.

सरकार के अनुसार प्रदेश में 179.38 लाख क्विंटल चीनी उपलब्ध है. कीमतों को नियंत्रित करने के लिए तीन स्तरों पर काम किया जा रहा है. बाजार में आपूर्ति बढ़ाने के लिए आयात का विकल्प अपनाया जा रहा है, जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक सीमा और निगरानी बढ़ाई जा रही है और नई फसल आने तक बाजार में पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने के लिए गन्ने की पेराई जल्द शुरू कराने की कोशिश की जा रही है.

सरकार के सामने चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि चीनी की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ चाय या घरेलू रसोई तक सीमित नहीं रहता. मिठाई, बिस्कुट, बेकरी, पेय पदार्थ और छोटे खाद्य कारोबारों की लागत बढ़ती है. त्योहारों के समय इसका असर और व्यापक हो सकता है. खासकर उस समय जब परिवारों का खर्च पहले ही बढ़ जाता है.

यही वजह है कि चीनी की कीमत अब सिर्फ बाजार का आंकड़ा नहीं रह गई है. यह सरकार की महंगाई प्रबंधन क्षमता की परीक्षा बन रही है. अगर कीमतें त्योहारों तक नियंत्रित नहीं हुईं तो विपक्ष को इसे घर-घर का मुद्दा बनाने का मौका मिलेगा.

2027 पर भी असर पड़ सकता है

अगले विधानसभा चुनाव के संदर्भ में चीनी का बाजार सीधे राजनीति से जुड़ जाता है. उत्तर प्रदेश में 46 लाख से अधिक गन्ना किसान हैं और करीब 121 चीनी मिलों से जुड़े किसान परिवार पश्चिमी यूपी से लेकर अवध और पूर्वांचल तक फैले हैं. पश्चिमी यूपी के मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, बिजनौर, सहारनपुर, हापुड़, अमरोहा और मुरादाबाद जैसे जिलों में गन्ना अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार है.

लेकिन इसका राजनीतिक प्रभाव केवल इन जिलों तक सीमित नहीं है. हरदोई, बहराइच, लखीमपुर, बस्ती और गोरखपुर तक गन्ना किसानों का प्रभाव दिखाई देता है. योगी सरकार पहले ही गन्ना किसानों को साधने के लिए राज्य परामर्शित मूल्य यानी SAP में लगातार बढ़ोतरी करती रही है.

2017 में पहली बार 10 रुपए प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई. 2021-22 में विधानसभा चुनाव से पहले 25 रुपए बढ़ाए गए. 2023-24 में लोकसभा चुनाव से पहले 20 रुपए की वृद्धि हुई और 2025-26 में सरकार ने फिर 30 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ाने का ऐलान किया. यह चौथी बड़ी वृद्धि थी. सरकार ने इसे किसानों के लिए बड़ा तोहफा बताया, लेकिन विपक्ष और किसान संगठनों का सवाल है कि बढ़ती लागत के मुकाबले यह राहत कितनी पर्याप्त है.

बुलंदशहर के किसान राकेश सिरोही का कहना है कि कुछ साल पहले जो खाद और केमिकल करीब 900 रुपए में मिलते थे, वे अब करीब 1800 रुपए के हो गए हैं. उनके मुताबिक लागत करीब 33 फीसद बढ़ चुकी है, ऐसे में SAP में 30 रुपए की वृद्धि किसानों के लिए पर्याप्त राहत नहीं है.

सिरोही का आरोप है कि सरकार का फैसला चुनाव को ध्यान में रखकर लिया गया, जबकि वास्तविक राहत अभी भी दूर है.

अब चीनी की कीमत ने इस समीकरण को उलट दिया है. भारतीय किसान यूनियन टिकैत गुट के जिलाध्यक्ष आलोक वर्मा का कहना है कि जब बाजार में चीनी 70 रुपए किलो तक बिक रही है तो किसानों को गन्ने का भाव भी बढ़ाकर 700 रुपए प्रति क्विंटल किया जाना चाहिए.

आलोक का तर्क है कि जब चीनी करीब 40 रुपए किलो थी तब गन्ने का भाव लगभग 400 रुपए प्रति क्विंटल था. ऐसे में चीनी महंगी होने का लाभ किसान को भी मिलना चाहिए. उनका कहना है कि चीनी, तेल, रिफाइंड, आटा और खाद जैसी रोजमर्रा की चीजों की बढ़ती कीमतों से जनता परेशान है और इसका असर 2027 के चुनाव में दिख सकता है.

लखनऊ के शिया कालेज में राजनीतिक शास्त्र विभाग के शि‍क्षक अमित राय बताते हैं, “यही दोहरी मार योगी सरकार के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकती है. एक तरफ गन्ना किसान कह सकता है कि चीनी महंगी होने के बावजूद उसे पर्याप्त लाभ नहीं मिला. दूसरी तरफ उपभोक्ता पूछ सकता है कि जब चीनी 65-70 रुपए किलो हो गई तो घर का बजट क्यों बिगड़ा.”

यानी सरकार के सामने एक ऐसा मुद्दा है जिसमें किसान और उपभोक्ता, दोनों की नाराजगी अलग-अलग कारणों से पैदा हो सकती है. चीनी का दाम बढ़ने से रसोई का बजट बिगड़ता है तो इसका असर महिला मतदाता पर खासतौर पर दिखाई देगा.

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