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कर्नाटक सरकार ने सांप के काटने को 'नोटिफाएबल डिजीज' क्यों बना दिया?

नोटिफाएबल डिजीज या अधिसूचित रोग कोई भी ऐसा रोग है जिसके बारे में सरकारी अथॉरिटीज को सूचित करना कानूनन जरूरी होता है

स्नेकबाईट को कर्नाटक सरकार ने बनाया 'नोटिफाएबल डिजीज'
स्नेकबाईट को कर्नाटक सरकार ने बनाया 'नोटिफाएबल डिजीज'
अपडेटेड 28 फ़रवरी , 2024

कर्नाटक सरकार ने 12 फरवरी को राज्य के सभी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों को इंटीग्रेटेड हेल्थ इन्फॉर्मेशन प्लेटफॉर्म (आईएचआईपी) में स्नेकबाइट या सांप के काटने के मामलों और इससे हुई मौतों को अनिवार्य रूप से दर्ज करने का निर्देश जारी किया है. बीमारियों की निगरानी के लिए आईएचआईपी एक  कॉमन पोर्टल है. यह निर्देश कर्नाटक महामारी रोग अधिनियम, 2020 की धारा 3 के तहत स्नेकबाइट को 'नोटिफाएबल डिजीज' के रूप में शामिल करके जारी किया गया. इस कानून से होगा क्या? यह समझने से पहले हमें स्नेकबाइट की गम्भीरता को समझ लेना चाहिए.

भारत में हर साल औसतन दस लाख स्नेकबाइट के केसेज होते हैं, जिसमें से लगभग 58,000 लोग अपनी जान गंवा बैठते हैं. अगर अब भी सुनने में भयावह नहीं लग रहा तो जान लीजिए कि मौतों की यह संख्या दुनिया में हर साल स्नेकबाईट से होने वाली मौतों का 50 प्रतिशत है. इसके अलावा स्नेकबाईट से विकलांग होने वाले लोगों की संख्या, मरने वालों से 4 गुना ज्यादा है.

स्नेकबाइट से होने वाली मौतों के आधिकारिक आंकड़ों और अलग-अलग सर्वे में दिए गए आंकड़ों में जमीन-आसमान का अंतर होता है और इस बात को अधिकारी भी मानते हैं. यह भी एक अहम वजह है कि समस्या की सटीक तस्वीर मिल पाना पहली चुनौती है. इसी चुनौती से पार पाने के लिए कर्नाटक सरकार ने स्नेकबाइट को 'नोटिफाएबल डिजीज' के रूप में शामिल करके एक पहल की है.

साल 2020 में इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में एक वाइट पेपर पब्लिश हुआ था और जहरीली स्नेकबाइट को एक नोटिफाएबल बीमारी के रूप में पहचानने का सुझाव इसी में सूचीबद्ध सिफारिशों में से एक था. इसी वाइट पेपर के को-ऑथर और कोच्चि स्थित कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. जयदीप सी. मेनन ने इंडिया टुडे से बात करते हुए इसे एक बड़ा पहला कदम बताया. जयदीप कहते हैं, "कर्नाटक सरकार के इस कदम के बाद अब हमें उम्मीद है कि अधिक से अधिक लोग स्नेकबाइट की रिपोर्ट करेंगे, और इस तरह इन घटनाओं की अनुमानित संख्या तक पहुंचने में हमें मदद मिलेगी.''

लेकिन क्या वजह है कि स्नेकबाइट से इतने सारे लोग पीड़ित हो रहे हैं मगर इसके लिए 2024 तक ज्यादा कदम नहीं उठाए गए. भारत में स्नेकबाइट या सर्पदंश के बोझ के बारे में समझाते हुए डॉ जयदीप मेनन कहते हैं, "एचआईवी के कारण होने वाली हर दो मौतों में से एक स्नेकबाइट से होती है. इसके लगभग 70 प्रतिशत पीड़ित 20 से 65 की उम्र के लोग होते हैं. इसके अलावा, 80 प्रतिशत मरीज़ आधुनिक चिकित्सा सुविधा तक पहुंचने से पहले अभी भी शॉर्टकट अपनाने के चक्कर में रहते हैं. इसका एक कारण यह भी है कि ज्यादातर स्नेकबाइट के मामले या तो आकस्मिक रूप से होते हैं या काम करते हुए. ये घटनाएं भी ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में होती हैं और कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में सर्पदंश के रोगियों को भर्ती करने और उनका इलाज करने के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधनों और सुविधाओं का अभाव होता है."

अब कर्नाटक सरकार के इस कदम के बाद कई तरह की दिक्कतों का निपटारा हो सकेगा क्योंकि मामलों के असल आंकड़े सरकार के सामने होंगे. कर्नाटक के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण आयुक्त डी.रणदीप ने इंडिया टुडे से बातचीत में बताया, "हमें लगा कि इसे एक नोटिफाएबल डिजीज घोषित करने से कई लाभ होंगे. जहां चिकित्सा अधिकारियों को संवेदनशील बनाकर प्रतिक्रिया प्रणालियों में सुधार किया जा सकता है, तो वहीं क्षेत्र में जाकर आशा कार्यकर्ता सावधानियों और आपातकालीन चिकित्सा देखभाल के बारे में जागरूकता पैदा करेंगी."

यह तो हो गई स्नेकबाइट की बात लेकिन आखिर किसी बीमारी को कब सरकार नोटिफाएबल डिजीज घोषित करती है और कैसे? इसे समझने से पहले ये समझिए कि ये है क्या. नोटिफाएबल डिजीज या अधिसूचित रोग कोई भी ऐसा रोग है जिसके बारे में सरकारी अथॉरिटीज को सूचित करना कानूनन आवश्यक है. बीमारी से जुड़ी जानकारियों का एक जगह इकठ्ठा होना, सरकारी चिकित्सा तंत्र को बीमारी की निगरानी करने में मदद करता है, और आगे किसी भी तरह की आशंकाओं के बारे में अलर्ट करता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य विनियम, 1969 के अनुसार इसकी वैश्विक निगरानी और एडवाइजरी रोल में मदद के लिए डब्ल्यूएचओ को भी रोग के बारे में रिपोर्ट करने की जरूरत होती है.

केंद्र सरकार ने हैजा, डिप्थीरिया, एन्सेफलाइटिस, कुष्ठ रोग, मेनिनजाइटिस, पर्टुसिस (काली खांसी), प्लेग, तपेदिक, एड्स, हेपेटाइटिस, खसरा, पीला बुखार, मलेरिया डेंगू आदि जैसी कई बीमारियों को अधिसूचित किया है. किसी भी बीमारी को नोटिफाएबल डिजीज बनाने और उसके कार्यान्वयन का जिम्मा राज्य सरकार पर होता है. किसी नोटिफाएबल डिजीज की रिपोर्ट ना कर पाना एक अपराध है और राज्य सरकार दोषियों के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई कर सकती है. 

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