
23 अक्टूबर को बिहार के सिवान जिले में एक घर में हुए धमाके में बच्चों समेत पांच लोगों की मौत हो गई. इस घर का इस्तेमाल गैरकानूनी तरीके से पटाखे बनाने वाली फैक्ट्री के रूप में किया जा रहा था.
अलमापुर गांव में हुआ यह धमाका याद दिलाता है कि पटाखों का कारोबार कितना जानलेवा साबित हो सकता है. दिवाली के आसपास यह कारोबार तेजी पकड़ लेता है. इस दौरान कुछ परिवारों के लिए पटाखे बनाना कमाई का जरिया बन जाता है जबकि इसके खतरे आसपास रहने वाले लोगों के घरों और जिंदगियों तक पहुंच जाते हैं.
लेकिन धमाका इस कहानी की सिर्फ शुरुआत थी. जब पुलिस तलाशी लेने पहुंची तो गांव वालों ने पास के धान के खेतों में करीब दो टन पटाखे छिपा दिए. छिपाए गए पटाखों की तलाश में करीब 50 पुलिसकर्मी आठ घंटे तक जुटे रहे. इस दौरान घरों और आसपास के खेतों से विस्फोटक और पटाखे बनाने के सामान की करीब 130 बोरियां बरामद की गईं.
इतनी बड़ी मात्रा में सामान मिलने से एक परेशान करने वाला सवाल उठता है: अलमापुर में करीब दो दशक से चल रहा यह कारोबार इतने बड़े पैमाने पर कैसे जारी रहने दिया गया और पांच लोगों की मौत के बाद ही इसका पूरा दायरा सामने क्यों आया?
दिवाली आते ही बिहार में पटाखों का गैरकानूनी कारोबार जोर पकड़ लेता है. कुछ परिवारों के लिए पटाखे बनाना सिर्फ त्योहार के मौसम का कारोबार नहीं है बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा कमाई का जरिया है. त्योहारों के दौरान बढ़ती मांग और जल्दी कमाई की उम्मीद इस कारोबार को आगे बढ़ाती है.
इस खुलासे से एक ऐसा सवाल उठता है जो धमाके की तत्काल वजह से आगे जाता है: कुछ परिवारों को कमाई देने वाले इस कारोबार के कारण पूरे मोहल्ले के लोगों की जान खतरे में कैसे पड़ने दी गई? सूत्रों का कहना है कि अलमापुर में करीब दो दशक से कई घरों में पटाखे बनाए जा रहे थे. अगर इन बातों की पुष्टि होती है तो यह हादसा व्यवस्था की बड़ी नाकामी की ओर इशारा करता है. यह नाकामी सिर्फ गैरकानूनी तरीके से पटाखे बनाने वाली इकाइयों का पता लगाने में नहीं बल्कि पहले से मौजूद खतरे को जानलेवा हादसे में बदलने से रोकने में भी रही.

इस धमाके में जान गंवाने वाले पांच लोग 70 साल के अमरुद्दीन मियां, उनकी पोतियां 20 साल की इशरत सिद्दीकी और 10 साल की खुशबू सिद्दीकी, उनके आठ साल के पड़ोसी अरशद सिद्दीकी और पटाखे बनाने वाली यूनिट में काम करने वाला 35 साल का भोला शामिल हैं.
धमाका इतना तेज था कि इमारत का एक हिस्सा टूटकर सड़क पर गिर गया. करीब दो घंटे तक रुक-रुककर धमाके होते रहे, जिससे बचाव कार्य में मुश्किलें आईं. मरने वालों में घर का बुजुर्ग मालिक, बच्चे और एक मजदूर शामिल थे. इन मौतों से पता चलता है कि रिहायशी इलाके में चल रहे इस काम के खतरे की चपेट में बुजुर्ग, बच्चे और मजदूर सभी आ गए.
इस कारोबार के पीछे कमाई का हिसाब सीधा है. दिवाली और दूसरे त्योहारों के आसपास पटाखों की मांग तेजी से बढ़ जाती है. इससे उन लोगों के लिए बाजार तैयार होता है, जो कम कीमत पर पटाखे बनाकर या बेचकर उन्हें बाजार में उपलब्ध कराते हैं. कुछ इलाकों में पटाखे बनाना परिवारों का पारंपरिक काम बन गया है.
जहां नियमित रोजगार के मौके कम हैं वहां इससे परिवारों को कुछ अतिरिक्त कमाई होती है. लेकिन स्थानीय स्तर पर लंबे समय से चले आ रहे रोजगार का यह तरीका भी खतरनाक बन सकता है जब पटाखे बनाने और रखने का काम आम घरों में किया जाता है यानी कि जहां परिवार के लोग और पड़ोसी भी रहते हैं.
पटाखे बनाने या उन्हें संभालने वाले लोगों तक ही इसका खतरा सीमित नहीं रहता. अगर पटाखों को ठीक से नहीं रखा जाए तो रिहायशी इमारत भी खतरे की जगह बन सकती है. बच्चे उन्हीं कमरों में रह सकते हैं, जहां पटाखे बनाए या रखे जाते हैं. पड़ोसियों को शायद यह पता भी न हो कि बगल के घर में कितना सामान रखा गया है. धमाका होने पर इसका असर आसपास की इमारतों, सड़कों और उन लोगों पर भी पड़ सकता है, जिनका इस कारोबार से कोई लेना-देना नहीं है. अलमापुर में हुई मौतों से पता चला कि आसपास मौजूद इन खतरों पर स्थानीय लोगों का कितना कम नियंत्रण हो सकता है.
बिहार में सिवान ऐसा पहला जिला नहीं है जहां इस तरह का हादसा हुआ हो. जुलाई में 2022 के भागलपुर धमाके के मामले से जुड़े दो लोगों को 10 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी. इस मामले से पता चला कि बड़े धमाकों के बाद आपराधिक मुकदमा चल सकता है और सजा भी मिल सकती है लेकिन सिवान में इसी तरह का हादसा दोबारा होने से सवाल उठता है कि क्या ऐसे हादसों के बीच बचाव के लिए नियमों को लगातार लागू किया जाता रहा है.
विस्फोटकों और पटाखों को लेकर कानून पहले से मौजूद हैं. विस्फोटक अधिनियम, 1884 और विस्फोटक नियम, 2008 के तहत विस्फोटकों और पटाखों को बनाने, रखने, अपने पास रखने और बेचने के काम को नियंत्रित किया जाता है. इन्हें बनाने और रखने के लिए उचित लाइसेंस लेना और तय शर्तों का पालन करना जरूरी है.
इन शर्तों में जगह और रखे जाने वाले सामान की मात्रा पर पाबंदियां भी शामिल हैं. इन नियमों का मकसद यह पक्का करना है कि खतरनाक सामान को मंजूरी वाली और तय नियमों के मुताबिक सुरक्षित जगहों पर रखा जाए, न कि रिहायशी इमारतों में जमा किया जाए, जहां कोई हादसा भारी नुकसान पहुंचा सकता है.
असल में, नियमों को लागू करने की कार्रवाई अक्सर किसी हादसे के बाद या दिवाली से ठीक पहले ज्यादा दिखाई देती है. इस दौरान पटाखों की मांग बढ़ने से अधिकारियों का ध्यान इस कारोबार पर ज्यादा जाता है. बड़े धमाके के बाद छापे मारे जा सकते हैं, सामान जब्त किया जा सकता है और अधिकारियों को निलंबित किया जा सकता है लेकिन सबसे बड़ी चुनौती किसी की जान जाने से पहले ऐसी गैरकानूनी इकाइयों का पता लगाना है.
सिवान में धमाके के बाद जामो बाजार थाने के थानाध्यक्ष और एक पुलिस चौकीदार को निलंबित कर दिया गया. इस कार्रवाई से जवाबदेही को लेकर एक बड़ा सवाल उठता है. क्या अधिकारियों को अलमापुर में चल रही इस गतिविधि की जानकारी थी? क्या इससे पहले भी ऐसी घटनाओं की शिकायत की गई थी? क्या इन जगहों या वहां रखे सामान की कभी जांच हुई थी?
पुलिस के पहुंचने से पहले पटाखों को छिपाए जाने की बात जांच में एक और पहलू जोड़ती है. घरों और खेतों से बड़ी मात्रा में सामान मिलने के साथ-साथ आसपास के इलाकों में भी पटाखे जब्त किए गए हैं. ऐसे में यह पता लगाना जरूरी है कि यह सामान अलग-अलग घरों में काम करने वाले लोगों का था या किसी बड़े सप्लाई नेटवर्क का हिस्सा था.
जांच करने वालों को पटाखे बनाने वालों, सप्लायरों, उन्हें एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने वालों, कारोबारियों और खरीदारों का पता लगाना होगा. पटाखे बनाने के सामान की बड़ी मात्रा मिलने भर से यह साबित नहीं होता कि यह सामान अपराध या उग्रवादी गतिविधियों में इस्तेमाल के लिए रखा गया था. ऐसा कोई भी संबंध सबूतों के आधार पर ही साबित किया जा सकता है.
नियमों को लागू करने की चुनौती सिर्फ धमाके के बाद मिलने वाले सामान को जब्त करने तक सीमित नहीं है. जिला प्रशासन को लाइसेंस लेकर पटाखे बनाने वालों, सामान रखने की जगहों और कारोबारियों के बारे में ताजा जानकारी रखनी चाहिए. इसके लिए त्योहारों के मौसम के अलावा भी नियमित जांच होनी चाहिए. पहले हुए धमाकों या सामान को खतरनाक तरीके से रखने की खबरों पर समय रहते जांच शुरू होनी चाहिए.
जहां गैरकानूनी तरीके से पटाखे बनते पाए जाएं, वहां कार्रवाई सिर्फ उस दिन जब्त किए गए सामान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. बल्कि यह भी पता लगाना जरूरी है कि नया सामान किन रास्तों से पहुंचता है और किस बाजार की वजह से यह कारोबार मुनाफे वाला बना हुआ है.
रोजगार का सवाल भी मुश्किल है. अगर अलमापुर में पटाखे बनाना कुछ परिवारों की कमाई का जरिया बन गया है तो लंबे समय तक काम आने वाले समाधान में लाइसेंस लेकर सुरक्षा नियमों का पालन करने वाले लोगों और गैरकानूनी इकाइयों के बीच फर्क करना होगा. ऐसी गैरकानूनी इकाइयों को बंद करना जरूरी है.
नियम लागू करने के साथ प्रभावित परिवारों को रोजगार के कानूनी विकल्प तलाशने में मदद देने की जरूरत भी हो सकती है लेकिन परंपरा और आर्थिक तंगी के चलते बच्चों और पड़ोसियों की जान खतरे में डालना सही नहीं है. इस कारोबार को जारी रहने देने की कीमत अक्सर उन लोगों को चुकानी पड़ती है जिनका इस पर सबसे कम नियंत्रण होता है.
करीब 130 बोरियों की बरामदगी, दो टन पटाखे छिपाए जाने की खबर और पांच लोगों की मौत बिहार में नियम को लागू करने के तरीके में बदलाव के लिए अहम मोड़ बननी चाहिए. जांच में यह पता लगाना जरूरी है कि इस कारोबार के लिए कौन जिम्मेदार था और पटाखों का इतना सामान गांव तक कैसे पहुंचा. प्रशासन को धमाके वाली जगह से आगे बढ़कर दूसरे घरों, खेतों और सामान रखने की जगहों की भी जांच करनी चाहिए, जहां इसी तरह के खतरे बने हुए हो सकते हैं.
दिवाली आने पर पटाखों की मांग बढ़ना तय है लेकिन एक और धमाका होना, कुछ और परिवारों का अपनों को खोना और नुकसान होने के बाद फिर से तलाशी अभियान चलना तय नहीं होना चाहिए.

