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पंजाब चुनाव के लिए BJP ने सतीश पूनिया पर क्यों लगाया दांव?

चुनाव हारने से लेकर राज्यसभा सांसद बनने, BJP के राष्ट्रीय महासचिव और अब पंजाब प्रभारी बनने तक, सतीश पूनिया का सफर दिखाता है कि पार्टी में उनकी संगठन संभालने की क्षमता कितनी मजबूत है

सतीश पूनिया (फाइल फोटो)
अपडेटेड 3 सितंबर , 2026

सतीश पूनिया के राजनीतिक करियर की एक दिलचस्प बात यह है कि उन्हें चुनावों में ज्यादा सफलता नहीं मिली लेकिन BJP ने धीरे-धीरे संगठन के एक भरोसेमंद और अहम नेता के तौर पर उन पर अपना भरोसा बढ़ाया है.

पिछले कुछ महीनों में पार्टी ने पूनिया को लगातार बड़ी जिम्मेदारियां दी हैं. 17 अगस्त को BJP ने उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाया. इसके एक दिन बाद उन्हें पंजाब का प्रभारी बना दिया गया. पंजाब में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं.

जून में पूनिया राजस्थान से निर्विरोध राज्यसभा के लिए चुने गए थे. इन तीनों फैसलों को देखें तो लगता है कि BJP पूनिया को आगे बढ़ाना चाहती है, उन्हें बड़ी जिम्मेदारियां देकर उनका भरोसा बढ़ा रही है और यह भी देखना चाहती है कि वह इन जिम्मेदारियों को कितनी अच्छी तरह संभाल सकते हैं.

यह बात इसलिए खास है क्योंकि पूनिया का चुनावी रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं रहा है. उनके चुनावी नतीजों से ऐसा नहीं लगता था कि पार्टी उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारियां देगी. 2013 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में वे आमेर सीट से सिर्फ 329 वोट से हार गए थे. 2018 में उन्होंने यही सीट जीती लेकिन 2023 में फिर हार गए. इसके बावजूद BJP ने पूनिया को लेकर अपना भरोसा बनाए रखा.

BJP ने पूनिया को राजस्थान से बाहर भी जिम्मेदारी देनी शुरू कर दी थी. 2024 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी ने उन्हें हरियाणा का प्रभारी बनाए रखा. यह फैसला उस समय लिया गया, जब वहां लोकसभा चुनाव में BJP का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा था. 2024 के लोकसभा चुनाव में BJP ने हरियाणा की 10 में से 5 सीटें जीती थीं लेकिन पूनिया का ध्यान कुछ महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव पर भी था. विधानसभा चुनाव में BJP 90 विधानसभा क्षेत्रों में से 44 में आगे रही थी.

पूनिया बताते हैं कि उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को बताया था कि उन्हें हरियाणा में 35 विधानसभा सीटें जीतने की उम्मीद है. उनका मानना था कि इतनी सीटें जीतकर BJP सत्ता के करीब पहुंच सकती है. उनकी यह उम्मीद सही साबित हुई. आखिरकार BJP ने 48 विधानसभा सीटें जीतीं और लगातार तीसरी बार सरकार बनाई.

राजस्थान BJP के अध्यक्ष के तौर पर सतीश पूनिया का कार्यकाल उलझन भरा रहा (फाइल फोटो)
राजस्थान BJP के अध्यक्ष के तौर पर सतीश पूनिया का कार्यकाल मुश्किल भरा रहा (फाइल फोटो)

हरियाणा की इस जीत में पूनिया की भूमिका से BJP का उन पर भरोसा और बढ़ गया. पूनिया ने पार्टी में कहा था कि लोकसभा चुनाव में कम सीटें मिलने का मतलब यह नहीं है कि हरियाणा के लोगों ने BJP को पूरी तरह नकार दिया है. उन्होंने विधानसभा चुनाव के लिए अपनी रणनीति पर काम करने का एक और मौका मांगा और पार्टी ने उन्हें यह मौका दे दिया.

पूनिया का पूरा जोर पार्टी के संगठन को मजबूत करने पर था. उनके चुनाव अभियान में पार्टी ने वॉट्सएप के जरिए ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने की कोशिश की. इसका मकसद बूथ स्तर पर पार्टी के कार्यकर्ताओं से लगातार संपर्क बनाए रखना और चुनाव का काम बेहतर तरीके से करना था.

हरियाणा में पूनिया ने जाति की राजनीति को जिस तरह संभाला, उससे भी उनकी रणनीति का पता चलता है. पूनिया जाट समुदाय से आते हैं. राजस्थान की राजनीति में कुछ लोगों ने उन्हें BJP की ओर से राज्य का पहला जाट मुख्यमंत्री बनाने के संभावित चेहरे के तौर पर देखा था लेकिन उन्होंने अपनी राजनीति को सिर्फ जाट समुदाय तक सीमित नहीं रखा.

हरियाणा में पूनिया जानते थे कि जाट मतदाता स्वाभाविक रूप से BJP के साथ नहीं हैं. फिर भी जहां उन्हें कोई जाट उम्मीदवार योग्य लगा, वहां उन्होंने उसे टिकट देने से परहेज नहीं किया. इसके बाद उनकी कोशिश गैर-जाट मतदाताओं को भी इन उम्मीदवारों के पक्ष में लाने की रही. यानी जाति के समीकरण को ध्यान में रखना लेकिन खुद को सिर्फ जाति की राजनीति तक सीमित न कर लेना. शायद यही वजह रही कि BJP का उन पर भरोसा बना रहा.

राजस्थान में 2019 से 2023 तक राज्य BJP अध्यक्ष के तौर पर पूनिया का दौर काफी अलग और उलझा हुआ रहा. उन्हें ऐसे समय राज्य अध्यक्ष बनाया गया था जब पार्टी पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रभाव से आगे निकलकर संगठन को मजबूत करना चाहती थी. पूनिया BJP में ताकत के एक बड़े वैकल्पिक केंद्र के तौर पर उभरे.

हालांकि, राजे की बार-बार बात करने और उनकी नीतियों पर सवाल उठाने से पूनिया और उनके बीच तनाव बढ़ता गया. 2023 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले पूनिया को राज्य BJP अध्यक्ष के पद से हटा दिया गया. राजस्थान की राजनीति में माना गया कि इसके पीछे पूनिया के नेतृत्व को लेकर बढ़ता तनाव और कुछ ऐसे नेताओं पर उनका भरोसा था, जिनकी छवि बहुत अच्छी नहीं थी. इसके बाद वे विधानसभा चुनाव में आमेर सीट से हार गए

पूनिया के लिए यह BJP में आगे बढ़ने का आखिरी मौका भी हो सकता था. लेकिन BJP ने उन पर भरोसा बनाए रखा. हरियाणा की जिम्मेदारी उनके राजनीतिक सफर में बड़ा मोड़ साबित हुई. इस साल जून में उन्हें राज्यसभा भेजकर BJP ने एक बार फिर उन पर भरोसा जताया. अब पंजाब में उनका सबसे बड़ा इम्तिहान है.

पंजाब में BJP को अभी काफी लंबा सफर तय करना है. 2022 में पार्टी ने करीब 6.6 फीसदी वोट के साथ सिर्फ दो विधानसभा सीटें जीती थीं. 2024 के लोकसभा चुनाव में BJP एक भी सीट नहीं जीत सकी लेकिन उसका वोट शेयर बढ़कर 18.56 फीसदी हो गया और वह 23 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही. पूनिया इसे एक मौके के तौर पर देखते हैं.

पूनिया का मानना है कि कांग्रेस की हालत ठीक नहीं है. आम आदमी पार्टी (AAP) के मजबूत होने से शिरोमणि अकाली दल (SAD) कमजोर हुआ है. वहीं, सत्ता में मौजूद AAP का भरोसा भी लोगों के बीच कुछ कम हुआ है. पूनिया को खास तौर पर शहरी मतदाताओं के बीच BJP के लिए अच्छी संभावना दिखती है लेकिन वे यह भी जानते हैं कि शहरी मतदाता अक्सर उसी पार्टी को चुनते हैं, जिसके जीतने की उन्हें उम्मीद होती है.

क्या ऐसे में SAD के साथ गठबंधन का सवाल टालना मुश्किल है? फिलहाल, पूनिया का कहना है कि पंजाब BJP इकाई ऐसे गठबंधन के पक्ष में नहीं है.

इस बीच, BJP ने पंजाब में अपनी एक बड़ी कमजोरी दूर करने की कोशिश शुरू कर दी है. राज्य में पार्टी का सामाजिक आधार बहुत मजबूत नहीं है. जाट सिख नेता केवल सिंह ढिल्लों को प्रदेश BJP अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने संगठन में जाट सिखों को प्रतिनिधित्व दिया है. पूनिया के जाट होने से भी इस समुदाय तक पहुंच बनाने में पार्टी को मदद मिल सकती है.

पंजाब की भौगोलिक स्थिति से भी BJP को फायदा हो सकता है. पंजाब के बॉर्डर वाले जिले राजस्थान के श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और हरियाणा से जुड़े हैं. पूनिया को राजस्थान और हरियाणा, दोनों में काम करने का अनुभव है. इसलिए BJP ने पंजाब की जिम्मेदारी ऐसे नेता को दी है जो पहले ही इन दोनों राज्यों में काम कर चुके हैं और जिनका पंजाब से सामाजिक और भौगोलिक जुड़ाव भी है.

फिर भी, पंजाब की जिम्मेदारी हरियाणा से ज्यादा मुश्किल होगी. इसकी वजह यह है कि पंजाब में BJP को कई अलग-अलग समुदायों और राजनीतिक दलों को साथ लाना होगा. अगर पूनिया पंजाब में हरियाणा जैसी कामयाबी का कुछ हिस्सा भी दोहरा पाते हैं तो उन्हें इसका बड़ा फायदा मिल सकता है. पंजाब में अच्छा चुनावी प्रदर्शन उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी दिलाने में मदद कर सकता है और केंद्र सरकार में मंत्री बनने का मौका भी बन सकता है.

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