बहुत कम सरकारें उच्च शिक्षा की पूरी व्यवस्था को नए सिरे से बदलने की कोशिश करती हैं. बिहार की सम्राट चौधरी सरकार ठीक ऐसा ही करने की तैयारी में है. उच्च शिक्षा विधेयक, मानसून सत्र के दौरान बिहार विधानसभा में पेश किए जाने की उम्मीद है.
यह विधेयक 1976 में बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम और पटना विश्वविद्यालय अधिनियम लागू होने के बाद राज्य की विश्वविद्यालय व्यवस्था में सबसे बड़ा ढांचागत सुधार माना जा रहा है.
अगर यह विधेयक पास हो जाता है, तो 500 से अधिक यूजी कॉलेज अब राज्य विश्वविद्यालयों के अधीन नहीं रहेंगे. इसके बजाय वे सीधे नए बनाए जाने वाले उच्च शिक्षा विभाग के अधीन आ जाएंगे. राज्य विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में राज्यपाल का अधिकार मुख्य रूप से पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षा और विश्वविद्यालयों तक सीमित रह जाएगा.
पहली नजर में यह केवल प्रशासनिक फेरबदल लगता है लेकिन वास्तव में यह बिहार में उच्च शिक्षा के संचालन की व्यवस्था में एक बुनियादी बदलाव है. सरकार का तर्क पूरी तरह खारिज करना आसान नहीं है. दशकों से बिहार के विश्वविद्यालय देरी से चलने वाले शैक्षणिक सत्र, टलती परीक्षाएं, परिणामों में देरी, लंबित नियुक्तियां और प्रशासनिक सुस्ती जैसी समस्याओं से जूझते रहे हैं.
इसका सबसे बड़ा नुकसान छात्रों को उठाना पड़ा है. उन्हें कई बार परीक्षाओं, परिणामों और डिग्रियों के लिए महीनों, बल्कि उससे भी अधिक समय तक इंतजार करना पड़ा. अनियमित शैक्षणिक गतिविधियों की शिकायतों के बाद राज्यपाल कार्यालय भी कई बार विश्वविद्यालयों को पढ़ाई और परीक्षा का कैलेंडर ऑनलाइन जारी करने का निर्देश दे चुका है.
प्रस्तावित कानून का आधार सीधा है. अगर विश्वविद्यालय बार-बार स्नातक शिक्षा का प्रभावी ढंग से संचालन करने में असफल रहे हैं, तो यह जिम्मेदारी सरकार खुद संभाले. यह सुधार बिहार में उच्च शिक्षा के विस्तार की महत्वाकांक्षी योजना के साथ भी जुड़ा हुआ है.
राज्य ने 'सात निश्चय-3' कार्यक्रम के तहत 211 नए डिग्री कॉलेजों में पढ़ाई शुरू कराई है और हर ब्लॉक में एक सरकारी डिग्री कॉलेज खोलने की योजना बनाई है. इतने बड़े नेटवर्क का संचालन मौजूदा विश्वविद्यालय व्यवस्था के जरिए करना लगातार कठिन होता जाएगा.
नई व्यवस्था के तहत कॉलेज शिक्षकों से जुड़े नीतिगत फैसले, तबादले, पदोन्नति और प्रशासनिक मामलों की जिम्मेदारी अलग-अलग विश्वविद्यालयों से हटकर उच्च शिक्षा विभाग के पास चली जाएगी. साथ ही, स्कूल शिक्षा की तरह हर जिले में कॉलेजों की निगरानी के लिए एक उच्च शिक्षा अधिकारी भी नियुक्त किया जाएगा.
सिद्धांत रूप से इसके कई फायदे हो सकते हैं. एक ही प्रशासनिक प्राधिकरण भर्ती प्रक्रिया को एक समान बना सकता है, अलग-अलग विश्वविद्यालयों के बीच प्रक्रियागत अंतर खत्म कर सकता है, आधारभूत ढांचे की परियोजनाओं की बेहतर निगरानी कर सकता है.
खाली पद जल्दी भर सकता है और एक समान शैक्षणिक कैलेंडर लागू कर सकता है. आम तौर पर नौकरशाही की जवाबदेही विश्वविद्यालय प्रशासन की तुलना में अधिक स्पष्ट होती है. अगर परीक्षाओं में देरी होती है या समय पर कक्षाएं शुरू नहीं होतीं तो इसकी जिम्मेदारी 21 स्वायत्त विश्वविद्यालयों में बंटी रहने के बजाय सचिवालय में तय करना आसान होगा.
छात्रों के लिए इस सुधार की सफलता का आकलन संवैधानिक सिद्धांतों से नहीं बल्कि उसके ठोस परिणामों से होगा. क्या समय पर दाखिले होंगे? क्या परीक्षाएं तय कार्यक्रम के अनुसार होंगी? क्या परिणाम महीनों की देरी के बिना घोषित होंगे? क्या डिग्रियां समय पर मिलेंगी? अगर इन सवालों का जवाब 'हां' है, तो यह कानून बिहार की उच्च शिक्षा में एक बड़े बदलाव के रूप में याद किया जा सकता है.
यह प्रस्ताव राज्य के सामने मौजूद एक और चुनौती से भी जुड़ा है. शिक्षा की गुणवत्ता अब भी बड़ी चिंता का विषय है. बिहार का उच्च शिक्षा क्षेत्र मान्यता के राष्ट्रीय मानकों से काफी पीछे है. इस साल की शुरुआत में उच्च शिक्षा विभाग ने बताया था कि राज्य के 892 कॉलेजों में से केवल 88 और विश्वविद्यालयों में से सिर्फ तीन के पास ही वैध राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (NAAC) की मान्यता है. इसके बाद सरकार ने गुणवत्ता सुधार का अभियान शुरू किया.
सरकार का मानना है कि विभाग के सीधे नियंत्रण में ऐसे सुधारों को लागू करना आसान होगा लेकिन सत्ता का हर केंद्रीकरण अपने साथ कुछ जोखिम भी लेकर आता है. विश्वविद्यालय सिर्फ प्रशासनिक दफ्तर नहीं होते. वे ऐसे शैक्षणिक संस्थान हैं, जिनका संचालन कुलपति, शैक्षणिक परिषद, सिंडिकेट और अध्ययन बोर्ड जैसे निकायों के माध्यम से होता है. पाठ्यक्रम, शोध, परीक्षाओं और शैक्षणिक मानकों से जुड़े फैसले परंपरागत रूप से विद्वानों की चर्चा से तय होते हैं, न कि सरकार के निर्देश से.
इसी वजह से आलोचकों का कहना है कि यह कानून विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता की जगह नौकरशाही नियंत्रण स्थापित कर सकता है. उनकी चिंताएं केवल सैद्धांतिक नहीं हैं. JDU और BJP के छह विधायकों ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र लिखकर चेतावनी दी है कि स्नातक कॉलेजों को विश्वविद्यालयों से अलग करने से शैक्षणिक स्वतंत्रता और संस्थागत स्वायत्तता कमजोर हो सकती है.
उनका कहना है कि यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) की उस सोच के भी खिलाफ है, जिसमें उच्च शिक्षा संस्थानों को अधिक अधिकार देने की बात कही गई है. उन्होंने सरकार से विधेयक को अंतिम रूप देने से पहले उसका मसौदा सार्वजनिक करने की भी मांग की है.
इस मामले पर गंभीरता से सोचे जाने की जरूरत है. प्रशासनिक दक्षता और शैक्षणिक उत्कृष्टता एक जैसी चीजें नहीं हैं. कोई प्रशासनिक अधिकारी बजट, खरीद, तबादले, आधारभूत ढांचे और वित्तीय प्रबंधन में कुशल हो सकता है लेकिन शैक्षणिक फैसले विद्वानों के विचार, सहकर्मी समीक्षा और संस्थागत स्वतंत्रता पर आधारित होते हैं. समस्या नौकरशाही की भागीदारी में नहीं, बल्कि तब पैदा होती है जब प्रशासनिक सुविधा शैक्षणिक निर्णयों पर हावी होने लगे.
इसलिए यह प्रस्ताव एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक सवाल भी उठाता है. क्या नौकरशाह स्नातक शिक्षा का संचालन विश्वविद्यालयों से बेहतर कर सकते हैं? इसका ईमानदार जवाब यही है कि वे प्रशासन चलाने में बेहतर हो सकते हैं लेकिन शिक्षा के मामलों में जरूरी नहीं.
दुनिया की सफल उच्च शिक्षा व्यवस्थाएं इन दोनों भूमिकाओं को अलग रखती हैं. सरकारें वित्तीय सहायता देती हैं, आधारभूत ढांचा तैयार करती हैं और जवाबदेही सुनिश्चित करती हैं. जबकि विश्वविद्यालय पढ़ाई, पाठ्यक्रम, शोध और शैक्षणिक मानकों पर अपना अधिकार बनाए रखते हैं. बिहार में भी यही अंतर महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.
अगर उच्च शिक्षा विभाग अपनी भूमिका केवल प्रशासन तक सीमित रखे और विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक स्वतंत्रता बनी रहे, तो यह सुधार बेहतर प्रशासन का एक आदर्श मॉडल बन सकता है. हालांकि, अगर नौकरशाही का नियंत्रण शैक्षणिक फैसलों, शिक्षकों की नियुक्तियों, शोध की दिशा या पाठ्यक्रम तक पहुंच गया तो ज्यादा केंद्रीकरण को लेकर उठ रही चिंताओं को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा.
इस विधेयक के संवैधानिक और राजनीतिक पहलू भी हैं. यूजी कॉलेजों को विश्वविद्यालयों से अलग करने पर कुलाधिपति के रूप में राज्यपाल की भूमिका स्वाभाविक रूप से कम होगी जबकि चुनी हुई सरकार की भूमिका बढ़ जाएगी. इसे प्रशासनिक सुधार माना जाए या राजनीतिक केंद्रीकरण, इतना तय है कि यह विधेयक बिहार की उच्च शिक्षा में शक्ति संतुलन को बदल देगा.
आखिरकार इस कानून का मूल्यांकन न तो वैचारिक समर्थन के आधार पर होना चाहिए और न ही संस्थागत आशंकाओं के आधार पर. इसका आकलन इसके परिणामों से होना चाहिए. अगर बिहार समय पर शैक्षणिक सत्र शुरू कराने, परीक्षा में देरी खत्म करने, मान्यता की स्थिति सुधारने, खाली पद भरने, जवाबदेही मजबूत करने और 500 से अधिक सरकारी कॉलेजों में बेहतर प्रशासन लागू करने में सफल होता है, तो यह राज्य की सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा पहलों में से एक साबित हो सकता है.
हालांकि, अगर इससे केवल विश्वविद्यालयों की अक्षमता की जगह नौकरशाही की अक्षमता आ गई, तो छात्रों को इस बदलाव से कोई खास फायदा नहीं मिलेगा. इसलिए इस कानून में मजबूत सुरक्षा प्रावधान जरूरी हैं.
सिलेबस और शैक्षणिक मानकों का फैसला शैक्षणिक परिषदें ही करें. शिक्षकों और छात्रों के लिए स्वतंत्र शिकायत निपटाने की व्यवस्था हो. प्रशासनिक फैसले पारदर्शी हों. प्रदर्शन के मानकों की सार्वजनिक निगरानी हो. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विश्वविद्यालयों की वह बौद्धिक स्वायत्तता बनी रहे, जो उन्हें सचिवालय का विस्तार बनने के बजाय उच्च शिक्षा का वास्तविक केंद्र बनाती है.
इस बात में कोई दोराय नहीं कि सम्राट चौधरी सरकार ने एक साहसिक कदम उठाया है. उसने बिहार के विश्वविद्यालयों की कई समस्याओं की सही पहचान की है लेकिन उसका समाधान सही है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि यह विधेयक प्रशासनिक दक्षता और शैक्षणिक स्वतंत्रता जैसे दो समान रूप से महत्वपूर्ण उद्देश्यों के बीच कितना संतुलन बना पाता है.
यही संतुलन इस कानून की महत्वाकांक्षा से भी अधिक, तय करेगा कि बिहार की विश्वविद्यालय व्यवस्था में यह बदलाव एक ऐतिहासिक सुधार साबित होगा या फिर एक ऐसी मिसाल, जिससे भविष्य में सबक लिया जाएगा.

