
राष्ट्रीय लोक दल (RLD) के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति में अगले कुछ महीने सिर्फ संगठनात्मक बदलाव के साथ अपनी राजनीतिक पहचान बदलने की कोशिश के भी हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट-किसान आधार वाली पार्टी अब पूर्वांचल की ओर कदम बढ़ा रही है.
इसी रणनीति के बीच पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रामाशीष राय का इस्तीफा और कुछ ही घंटों बाद बस्ती के 43 वर्षीय नेता ऐश्वर्य राज सिंह को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाना महज नेतृत्व परिवर्तन नहीं माना जा सकता.
इसके पीछे जयंत चौधरी की उस व्यापक रणनीति की झलक दिखाई देती है जिसमें RLD को पश्चिमी यूपी की सीमित क्षेत्रीय पार्टी से निकालकर पूरे प्रदेश में प्रभाव रखने वाली ताकत बनाने की कोशिश हो रही है.
रामाशीष राय का इस्तीफा पार्टी के लिए असहज करने वाला घटनाक्रम जरूर है. राय ने BJP नेतृत्व वाले NDA की 'बांटने वाली राजनीति' पर सवाल उठाते हुए पार्टी और प्रदेश अध्यक्ष पद दोनों से इस्तीफा दिया.
उन्होंने लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों, युवाओं, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक न्याय से जुड़े सवाल उठाए. जंतर-मंतर पर छात्रों के पेपर लीक विरोधी आंदोलन के समर्थन में उनकी मौजूदगी ने भी उनके राजनीतिक रुख को स्पष्ट किया था.

RLD ने हालांकि इस घटनाक्रम को ज्यादा तूल नहीं दिया और कुछ ही घंटों में नए प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा कर संगठन में पैदा हुई अनिश्चितता को खत्म करने का संदेश दिया. दिलचस्प यह है कि RLD ने राय की जगह पश्चिमी यूपी के किसी नेता को नहीं चुना.
पार्टी ने बस्ती के ऐश्वर्य राज सिंह को प्रदेश संगठन की कमान सौंपी. यानी पार्टी का जवाब पूर्व की ओर और तेज कदम बढ़ाने के रूप में सामने आया है.
पश्चिमी गढ़ से बाहर निकलने की मजबूरी
चौधरी अजित सिंह से लेकर जयंत चौधरी तक पार्टी की पहचान जाट, किसान और पश्चिमी यूपी की राजनीति से जुड़ी रही. लेकिन 2027 की लड़ाई में सिर्फ पश्चिमी यूपी तक सीमित रहकर RLD अपने प्रभाव और सीटों की संख्या को बहुत ज्यादा नहीं बढ़ा सकती.
BJP के साथ गठबंधन में रहते हुए पार्टी के सामने एक और चुनौती है. उसे NDA में अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए यह दिखाना होगा कि उसका संगठन पश्चिमी यूपी के कुछ इलाकों से आगे भी चुनावी असर पैदा कर सकता है. यही वजह है कि RLD ने 2026 की शुरुआत से ही पूर्वांचल पर विशेष ध्यान देना शुरू किया.
मार्च में जयंत चौधरी ने देवरिया में बड़ी रैली की थी. पार्टी ने आजमगढ़, गाजीपुर और मऊ जैसे जिलों में भी कार्यक्रमों की योजना बनाई थी. RLD नेताओं ने इसे अपनी 'लुक ईस्ट' रणनीति का हिस्सा बताया था.
पार्टी का लक्ष्य पूर्वी यूपी में बूथ स्तर तक संगठन खड़ा करना और ऐसे सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाना है जिनके बीच उसका पारंपरिक प्रभाव बेहद सीमित रहा है. पूर्वांचल में RLD के लिए सबसे बड़ी चुनौती उसका पुराना राजनीतिक टैग है.
पश्चिमी यूपी में पार्टी को जाट-मुस्लिम-किसान समीकरणों के संदर्भ में देखा जाता रहा है जबकि पूर्वांचल की राजनीति कहीं ज्यादा बहुस्तरीय है. यहां गैर-यादव पिछड़ी जातियों, दलितों, सवर्णों, यादवों और मुस्लिम मतदाताओं के बीच चुनावी समीकरण बनते-बिगड़ते हैं. BJP, SP और BSP जैसी पार्टियों ने यहां लंबे समय में मजबूत संगठन और सामाजिक समीकरण तैयार किए हैं.
लखनऊ के बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक सुशील पांडेय कहते हैं, “RLD के सामने असली चुनौती सिर्फ पूर्वांचल में कार्यक्रम करने की नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक पहचान बदलने की है. जब तक मतदाता RLD को पश्चिमी यूपी की जाट-केंद्रित पार्टी के बजाय व्यापक सामाजिक आधार वाली पार्टी के रूप में नहीं देखने लगेंगे तब तक 'लुक ईस्ट' रणनीति का चुनावी लाभ सीमित रहेगा.”
यह चुनौती आसान नहीं है. पूर्वांचल में सिर्फ नेता उतारने से संगठन नहीं बनता. वहां स्थानीय नेताओं, जातीय समूहों और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं का नेटवर्क तैयार करना होगा. यही वजह है कि ऐश्वर्य राज सिंह की नियुक्ति को सिर्फ चेहरे के बदलाव के बजाय संगठनात्मक प्रयोग के तौर पर देखा जा रहा है.
ऐश्वर्य राज सिंह की अहमियत
बस्ती से आने वाले ऐश्वर्य राज सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर RLD ने एक राजनीतिक संदेश दिया है. पार्टी अब पूर्वांचल को केवल चुनावी दौरे और रैलियों तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि संगठन की कमान ही पूर्वांचल के नेता को देकर वहां अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करना चाहती है.
सिंह का पारिवारिक राजनीतिक आधार भी है. उनके पिता लक्ष्मेश्वर सिंह 1991 में जनता दल के टिकट पर बस्ती सदर सीट से विधायक बने थे. ऐश्वर्य राज सिंह खुद 2017 में बस्ती से RLD के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं.
वे पार्टी के राष्ट्रीय सचिव रहे हैं और 'टीम RLD' से भी जुड़े रहे हैं. यानी उन्हें संगठन और क्षेत्रीय राजनीति, दोनों का अनुभव है. यह नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब RLD पहले ही अपने संगठन को चुनावी मोड में ला चुकी है.
जून में पार्टी ने उत्तर प्रदेश की राज्य कार्यकारिणी भंग कर नए सिरे से संगठन खड़ा करने की प्रक्रिया शुरू की थी. उस समय भी संकेत था कि पार्टी पश्चिमी यूपी के पारंपरिक आधार से आगे निकलकर गैर-जाट समुदायों, युवाओं, महिलाओं और दूसरे क्षेत्रों को संगठन में ज्यादा जगह देना चाहती है.
RLD सिर्फ भौगोलिक विस्तार नहीं चाहती, बल्कि सामाजिक विस्तार भी चाहती है. जून में पार्टी ने 'सामाजिक न्याय मंच' के जरिए गैर-जाट OBC, दलित और मुस्लिम मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कवायद शुरू की थी.
इन समूहों के बीच सम्मेलन और संगठनात्मक कार्यक्रमों की योजना बनाई गई. यानी पार्टी का फोकस सिर्फ 'जाट से बाहर' निकलने पर नहीं, बल्कि अलग-अलग सामाजिक समूहों को जोड़ने पर भी है. सुशील पांडेय के मुताबिक यह जयंत चौधरी के सामने मौजूद दोहरी चुनौती का जवाब है. पहली चुनौती BJP के साथ गठबंधन में रहते हुए अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बचाए रखने की है. दूसरी चुनौती अपने पारंपरिक मतदाता आधार के बाहर नए सामाजिक समूहों को जोड़ने की है.
पांडेय कहते हैं कि अगर RLD सिर्फ BJP के सहारे चुनाव लड़ती दिखाई देती है तो उसकी स्वतंत्र राजनीतिक उपयोगिता घट सकती है. लेकिन अगर वह अपने दम पर कुछ नए क्षेत्रों में प्रभाव पैदा करती है, तो NDA में सीट बंटवारे के दौरान उसकी मोल-भाव की ताकत भी बढ़ सकती है.
यही वजह है कि ऐश्वर्य राज सिंह की नियुक्ति को पूर्वांचल में एक प्रयोग के तौर पर देखा जा रहा है. अगर वे बस्ती, गोंडा, संतकबीरनगर, गोरखपुर, देवरिया, बलिया और आसपास के क्षेत्रों में संगठन को सक्रिय करने में सफल होते हैं तो RLD पहली बार पश्चिमी यूपी से बाहर अपने लिए स्थाई राजनीतिक आधार की संभावना तलाश सकती है.
BJP के गढ़ में जगह बनाने की चुनौती
RLD की पूरी रणनीति का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि पार्टी विस्तार BJP के साथ गठबंधन में रहते हुए करना चाहती है. 2022 में RLD ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था. बाद में 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी NDA में चली गई.
अब 2027 में वह BJP के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है. RLD के राष्ट्रीय महासचिव संगठन त्रिलोक त्यागी भी साफ कह चुके हैं कि NDA मिलकर 2027 का चुनाव लड़ेगा और सत्ता में वापसी का लक्ष्य रखेगा. लेकिन यहीं RLD की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा भी है.
अगर पार्टी का विस्तार BJP के प्रभाव वाले क्षेत्रों में होता है तो सवाल उठेगा कि वह अपने लिए अलग राजनीतिक स्पेस कितना बना पाएगी. पूर्वांचल में BJP पहले से मजबूत संगठन वाली पार्टी है. ऐसे में RLD के लिए अपने झंडे और संगठन के साथ खड़ा होना आसान नहीं होगा.
दूसरी तरफ RLD के लिए पूर्वांचल में विस्तार का एक फायदा यह है कि BJP के साथ गठबंधन उसे राजनीतिक और संगठनात्मक पहुंच का अवसर देता है. जयंत चौधरी केंद्र में मंत्री हैं और NDA में RLD की भूमिका पहले के मुकाबले ज्यादा महत्वपूर्ण है. पार्टी इसी राजनीतिक पूंजी को उत्तर प्रदेश में संगठन विस्तार के लिए इस्तेमाल करना चाहती है.
अब सवाल यह है कि क्या RLD पूर्वांचल की राजनीति में टिक पाएगी? क्या जाट-किसान राजनीति की अपनी पुरानी पहचान से बाहर निकलकर गैर-जाट OBC, दलित, मुस्लिम, युवा और दूसरे सामाजिक समूहों के बीच जगह बना पाएगी? और सबसे बड़ा सवाल, BJP के साथ रहते हुए क्या वह अपनी अलग राजनीतिक पहचान कायम रख पाएगी?
2027 के चुनाव में इन सवालों के जवाब RLD की सीटों की संख्या से ज्यादा उसकी राजनीतिक दिशा तय करेंगे. अगर ऐश्वर्य राज सिंह के नेतृत्व में पूर्वांचल में संगठन खड़ा होता है और सामाजिक न्याय की राजनीति को पार्टी के पारंपरिक किसान एजेंडे से जोड़ा जाता है, तो RLD के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया अध्याय खुल सकता है.
लेकिन अगर यह कवायद कुछ रैलियों, नियुक्तियों और संगठनात्मक फेरबदल तक सीमित रह गई, तो पार्टी फिर उसी पश्चिमी यूपी की सीमित राजनीतिक चौहद्दी में लौट सकती है, जिससे बाहर निकलने की कोशिश जयंत चौधरी अब कर रहे हैं.

