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राम मंदिर चढ़ावा विवाद 2027 के चुनावी नैरेटिव को कैसे बदल रहा?

2027 के यूपी चुनाव से पहले BJP और समाजवादी पार्टी राम मंदिर चढ़ावा विवाद को अपने-अपने नैरेटिव में ढालने की कोशिश कर रही हैं

Akhilesh Yadav, Yogi Adityanath, Ram Mandir
चढ़ावा विवाद BJP के लिए दोहरी चुनौती बन गया है और सपा के लिए बड़ा मौका
अपडेटेड 10 जुलाई , 2026

22 जनवरी 2024 को अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं थी. यह तीन दशक लंबे राम मंदिर आंदोलन की राजनीतिक और वैचारिक पराकाष्ठा थी. BJP का विश्वास था कि राम मंदिर आने वाले वर्षों तक उसके सबसे मजबूत राजनीतिक नैरेटिव का केंद्र बना रहेगा. 

लेकिन प्राण-प्रतिष्ठा के ढाई वर्ष के भीतर ही राम मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे में कथित चोरी के आरोपों ने पूरे घटनाक्रम को एक अलग दिशा दे दी है. इस विवाद की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बार बहस मंदिर निर्माण को लेकर नहीं है. सवाल मंदिर के प्रबंधन, पारदर्शिता और जवाबदेही पर उठ रहे हैं. 

यही कारण है कि यह मामला 2021 के जमीन खरीद विवाद से अलग माना जा रहा है. उस समय विपक्ष के आरोपों को ट्रस्ट और BJP ने राजनीतिक हमला बताकर खारिज कर दिया था. लेकिन इस बार खुद उत्तर प्रदेश सरकार ने एसआईटी गठित की, ट्रस्ट ने एफआईआर दर्ज कराई, कर्मचारियों की गिरफ्तारी हुई और जांच का दायरा संस्थागत जिम्मेदारी तक पहुंच गया. 

7 जून को समाजवादी पार्टी के नेता तेज नारायण पांडे उर्फ पवन पांडे ने पहली बार चढ़ावे में गड़बड़ी का आरोप लगाया. शुरुआती दौर में इसे राजनीतिक आरोप माना गया लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, मामला केवल विपक्ष के आरोपों तक सीमित नहीं रहा. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 13 जून को तीन सदस्यीय एसआईटी गठित की और 19 जून को अयोध्या दौरे के दौरान सार्वजनिक रूप से कहा कि ‘कोई भी दोषी बख्शा नहीं जाएगा.’ यहीं से राजनीतिक विमर्श भी बदल गया. अब विपक्ष यह नहीं कह रहा कि मंदिर नहीं बनना चाहिए बल्कि यह पूछ रहा है कि श्रद्धालुओं के दान की सुरक्षा और उसका हिसाब-किताब कैसे रखा गया.

BJP की दोहरी चुनौती

राम मंदिर BJP की वैचारिक पहचान का सबसे मजबूत प्रतीक रहा है. मंदिर निर्माण को पार्टी अपनी सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती रही है. ऐसे में मंदिर प्रबंधन से जुड़ा कोई भी विवाद स्वाभाविक रूप से राजनीतिक असर पैदा करता है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए यह मामला और अधिक संवेदनशील है. गोरक्षपीठ राम मंदिर आंदोलन की प्रमुख शक्ति रही है. उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ इस आंदोलन के अग्रणी नेताओं में शामिल थे. 

मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी ने फैजाबाद का नाम बदलकर अयोध्या किया, दीपोत्सव को वैश्विक पहचान दिलाई और रामनगरी के व्यापक विकास को अपनी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल किया. इसलिए मंदिर प्रबंधन पर उठे सवाल सीधे सरकार की साख से जुड़ते दिखाई देते हैं. हालांकि BJP इस संकट को अवसर में बदलने की कोशिश कर रही है. 

पार्टी का दावा है कि सरकार ने आरोपों को दबाने के बजाय तत्काल कार्रवाई की. ट्रस्ट की शिकायत पर एसआईटी बनी, गिरफ्तारियां हुईं और जांच लगातार आगे बढ़ रही है. अयोध्या के BJP नेता विकास मिश्र कहते हैं, "मुख्यमंत्री ने बिना किसी दबाव के तुरंत एसआईटी बनाई. इससे यह संदेश गया कि योगी सरकार किसी को बचाने वाली नहीं है. यदि कहीं गड़बड़ी हुई है तो दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी." 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि BJP की रणनीति यह दिखाने की है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है. पार्टी इस पूरे विवाद को ‘सिस्टम की सफाई’ के रूप में पेश करना चाहती है ताकि मंदिर की पवित्रता और सरकार की विश्वसनीयता दोनों पर आंच कम से कम आए.

समाजवादी पार्टी की नई रणनीति

2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने PDA (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) सामाजिक समीकरण के सहारे बड़ी सफलता हासिल की थी. लेकिन पार्टी नेतृत्व समझता है कि विधानसभा चुनाव में केवल उसी रणनीति को दोहराना पर्याप्त नहीं होगा. इसलिए राम मंदिर के चढ़ावे का विवाद उसके लिए नया राजनीतिक अवसर बनकर सामने आया है. अखिलेश यादव लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं. 

उन्होंने इसे केवल भ्रष्टाचार नहीं बल्कि श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा मामला बताया है. प्रयागराज में युवाओं के बीच उन्होंने कहा था, "BJP के लिए नेशन फर्स्ट नहीं, डोनेशन फर्स्ट है." समाजवादी पार्टी ने तय किया है कि इस मुद्दे को केवल मीडिया तक सीमित नहीं रखा जाएगा. पार्टी की सहयोगी इकाई बाबा साहेब अंबेडकर वाहिनी प्रदेशभर में पीडीए पंचायतें, प्रशिक्षण शिविर और जनसंवाद कार्यक्रम चला रही है. वाराणसी, प्रयागराज, गोरखपुर, आगरा, गाजियाबाद और बलिया में कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं. वाहिनी के राष्ट्रीय महासचिव रामबाबू सुदर्शन कहते हैं, "जब मामला जनता की आस्था और जनता के पैसे का हो, तब निष्पक्ष और पारदर्शी जांच जरूरी है. हमारे कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर लोगों से चर्चा कर रहे हैं कि आस्था से जुड़े मामलों में जवाबदेही क्यों जरूरी है." 

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि अखिलेश यादव इस मुद्दे के जरिए अपने पारंपरिक वोट बैंक से आगे बढ़कर शहरी मध्यवर्ग और सवर्ण मतदाताओं तक भी पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं. हाल के महीनों में ब्राह्मण सम्मेलनों का आयोजन, सैफई में केदारनाथ की तर्ज पर केदारेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण और स्वयं राम मंदिर जाने की घोषणा इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है.
 
फैजाबाद की हार से 2027 की चुनौती तक

BJP के लिए इस विवाद की राजनीतिक संवेदनशीलता का एक बड़ा कारण 2024 का लोकसभा चुनाव भी है. राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के केवल चार महीने बाद फैजाबाद लोकसभा सीट पर BJP की हार ने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को चौंका दिया था. समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद ने BJP के लल्लू सिंह को पराजित कर दिया. यह परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि मंदिर निर्माण के बाद पहली बार जनता मतदान कर रही थी. 

2022 के विधानसभा चुनाव में फैजाबाद लोकसभा क्षेत्र की पांच विधानसभा सीटों में BJP तीन और समाजवादी पार्टी दो सीटें जीती थी. लेकिन 2024 में अयोध्या विधानसभा को छोड़कर बाकी चार विधानसभा क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी को उल्लेखनीय बढ़त मिली. अयोध्या स्थित डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर आर. एस. वर्मा कहते हैं, "2024 में स्थानीय लोगों में जमीन अधिग्रहण, विस्थापन और शहर में बदले प्रबंधन को लेकर असंतोष था. समाजवादी पार्टी ने इसे सामाजिक समीकरण के साथ जोड़ दिया. लेकिन इस बार मामला स्थानीय नहीं है. अब सवाल देशभर के श्रद्धालुओं के दान से जुड़ा है इसलिए इसका असर कहीं व्यापक हो सकता है." 

हालांकि फरवरी 2025 के मिल्कीपुर विधानसभा उपचुनाव में BJP ने जीत दर्ज कर राजनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश की लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यदि चढ़ावे के विवाद की जांच लंबी चलती है तो विपक्ष इसे लगातार चुनावी मुद्दा बनाए रखेगा. राजनीतिक विश्लेषक और चुनावी मामलों के जानकारों का मानना है कि BJP की सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह बहस को ‘भ्रष्टाचार’ से हटाकर फिर ‘राम मंदिर और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की ओर मोड़े जबकि विपक्ष चाहता है कि चर्चा केवल पारदर्शिता और जवाबदेही पर केंद्रित रहे.

2027 का नैरेटिव : दान बनाम धर्म या हिंदुत्व बनाम विपक्ष?

BJP इस विवाद को केवल सफाई देकर समाप्त नहीं करना चाहती. पार्टी इसे वैचारिक स्तर पर जवाब देने की रणनीति पर भी काम कर रही है. इसी क्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाथरस की रैली में अखिलेश यादव को श्रीकृष्ण जन्मभूमि आंदोलन का समर्थन करने की चुनौती दी. उनका संदेश स्पष्ट था कि विपक्ष यदि स्वयं को धार्मिक बताता है तो उसे मथुरा और काशी जैसे मुद्दों पर भी अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए. BJP के प्रदेश मुख्य प्रवक्ता दिनेश प्रताप सिंह कहते हैं, "जिन लोगों ने कारसेवकों पर गोलियां चलवाईं, उन्हें राम मंदिर पर बोलने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है. जनता समाजवादी पार्टी के शासनकाल का भ्रष्टाचार और अपराध भूली नहीं है." यानी BJP बहस को फिर ‘हिंदुत्व बनाम विरोधी’ की वैचारिक लड़ाई में ले जाना चाहती है, जबकि समाजवादी पार्टी इसे ‘दान, पारदर्शिता और जवाबदेही’ तक सीमित रखना चाहती है. 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यही 2027 के चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण नैरेटिव बन सकता है. यदि जांच शीघ्र पूरी होकर दोषियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई होती है, तो BJP इसे अपनी भ्रष्टाचार विरोधी नीति की सफलता के रूप में पेश करेगी. लेकिन यदि विवाद लंबा खिंचता है या जांच को लेकर सवाल उठते हैं, तो विपक्ष इसे आस्था और प्रशासनिक जवाबदेही के बड़े मुद्दे में बदलने का प्रयास करेगा. एक वरिष्ठ संघ पदाधिकारी, जिन्होंने नाम प्रकाशित न करने का आग्रह किया, कहते हैं, "राम मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था का विषय है. इसलिए प्रबंधन पर उठे किसी भी सवाल का जवाब पूरी पारदर्शिता से देना जरूरी है. जितनी जल्दी स्थिति स्पष्ट होगी, उतना ही अच्छा रहेगा."

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