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राम मंदिर ट्रस्ट ने निर्मला यादव पर क्यों जताया भरोसा?

शिक्षा जगत में 25 साल का प्रशासनिक अनुभव, संघ से लंबा जुड़ाव और राम मंदिर आंदोलन की पृष्ठभूमि निर्मला यादव को ट्रस्ट की पहली महिला सदस्य बनने तक ले आई

Dr Nirmala Yadav Joins Ram Mandir Trust
डॉ. निर्मला यादव राम मंदिर ट्रस्ट की पहली महिला सदस्य हैं
अपडेटेड 7 सितंबर , 2026

अयोध्या के राम मंदिर के प्रबंधन और संचालन की सर्वोच्च संस्था श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में पहली बार किसी महिला को सदस्य बनाया गया है. 66 वर्षीय डॉ. निर्मला यादव अब ट्रस्ट के 15 सदस्यीय ढांचे में पहली महिला प्रतिनिधि बन गई हैं. 

ट्रस्ट ने इस फैसले के जरिए पश्चिमी यूपी के एक ऐसे सामाजिक और राजनीतिक परिवार को भी प्रतिनिधित्व दिया है, जिसकी कई पीढ़ियों का रिश्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राम मंदिर आंदोलन से रहा है. 

फिरोजाबाद के शिकोहाबाद की रहने वाली निर्मला यादव की पहचान हालांकि सिर्फ संघ परिवार से जुड़े परिवार की बहू के रूप में नहीं है. करीब 25 वर्षों तक कॉलेज की प्राचार्या रहीं निर्मला यादव शिक्षा और प्रशासन के क्षेत्र में लंबा अनुभव रखती हैं. फिलहाल वे राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ में अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख की जिम्मेदारी संभाल रही हैं. 

2 सितंबर को ट्रस्ट की ओर से उन्हें वॉट्सएप संदेश भेजकर पूछा गया कि क्या वे ट्रस्ट में सदस्य की जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिए तैयार हैं. संदेश मिलने के बाद वे खुद भी हैरान रह गईं. उन्हें इस बात के संकेत जरूर मिले थे कि राम मंदिर ट्रस्ट में कोई भूमिका मिल सकती है, लेकिन ट्रस्टी बनाए जाने की उम्मीद नहीं थी. 

उनके हामी भरने के कुछ ही समय बाद हुई ट्रस्ट की बैठक में उनकी नियुक्ति पर मुहर लगा दी गई. इसी बैठक में रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र को ट्रस्ट का पहला पूर्णकालिक मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया गया. उनके साथ निर्मला यादव, वकील मदन मोहन पांडे और व्यवसायी-सामाजिक कार्यकर्ता महेश भागचंदका को ट्रस्टी बनाया गया.

चंपत राय और अनिल मिश्रा ने चढ़ावा चोरी विवाद के बाद ट्रस्ट से इस्तीफा दे दिया था
चंपत राय और अनिल मिश्रा ने चढ़ावा चोरी विवाद के बाद ट्रस्ट से इस्तीफा दे दिया था

इन नियुक्तियों के साथ ट्रस्ट में लंबे समय से खाली पड़े पदों को भी भरा गया. पिछले वर्ष ट्रस्टी बिमलेंद्र मोहन मिश्र के निधन और बाद में चंदा चोरी से जुड़े विवाद के बीच चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा के इस्तीफे के बाद ट्रस्ट में रिक्तियां बनी थीं. 

ऐसे समय में निर्मला यादव की नियुक्ति का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि वे पहली महिला सदस्य हैं. उनकी उम्र, शैक्षिक पृष्ठभूमि, प्रशासनिक अनुभव, सामाजिक सक्रियता और परिवार की पृष्ठभूमि, चारों मिलकर उन्हें ट्रस्ट के लिए एक अलग तरह का चेहरा बनाते हैं.

ढाई दशक तक कॉलेज संभाला

निर्मला यादव की पेशेवर पहचान शिक्षा जगत से बनी. हिंदी और संस्कृत में उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने हिंदी में पीएचडी की. वर्ष 1999 में उन्होंने शिकोहाबाद के बीडीएम डिग्री कॉलेज में लेक्चरर के रूप में करियर शुरू किया. बाद में वे इसी संस्थान की प्राचार्या बनीं. 

करीब सात वर्षों तक उन्होंने कॉलेज का प्रशासन संभाला. इसके बाद वे फिरोजाबाद के महात्मा गांधी बालिका पीजी कॉलेज की प्राचार्या बनीं और 2022 में सेवानिवृत्त हुईं. करीब ढाई दशक के इस प्रशासनिक अनुभव को वे अब राम मंदिर ट्रस्ट में अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती हैं. 

कॉलेज प्रशासन में रहते हुए उनका जोर अनुशासन, शैक्षणिक सुधार और संस्थागत व्यवस्था को मजबूत करने पर रहा. उनके कार्यकाल में कॉलेजों में कई विकास और प्रशासनिक बदलाव हुए. यही वजह है कि उनके बारे में उनके परिचितों की पहली पहचान एक अनुशासनप्रिय और स्पष्ट निर्णय लेने वाली प्रशासक की है. 

कॉलेज की प्राचार्या के तौर पर काम करना और राम मंदिर ट्रस्ट जैसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थान की सदस्य बनना अलग-अलग तरह की जिम्मेदारियां हैं, लेकिन निर्मला यादव के मुताबिक दोनों जगह प्रशासनिक अनुभव काम आता है. उनका कहना है कि उन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में पारदर्शिता को प्राथमिकता दी और मुश्किल परिस्थितियों में भी निष्पक्ष रहने की कोशिश की. अब वे इसी अनुभव को ट्रस्ट की जिम्मेदारी में इस्तेमाल करना चाहती हैं.

सेवानिवृत्ति के बाद भी शिक्षा क्षेत्र से उनका रिश्ता खत्म नहीं हुआ. उन्हें राज्यपाल के नामित सदस्य के तौर पर डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा की कार्य परिषद में भी जिम्मेदारी मिली. यानी औपचारिक रूप से कॉलेज प्रशासन से विदा होने के बाद भी उच्च शिक्षा और संस्थागत प्रशासन से उनका जुड़ाव बना रहा.

निर्मला यादव राम मंदिर आंदोलन से भी जुड़ी रही हैं
निर्मला यादव राम मंदिर आंदोलन से भी जुड़ी रही हैं

उनका राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ से संबंध भी लंबा है. यह संघ से जुड़े शिक्षकों का संगठन है. निर्मला यादव 1999 से ही इसके साथ सक्रिय रही हैं. उन्होंने उत्तर प्रदेश इकाई में उपाध्यक्ष और कोषाध्यक्ष जैसी जिम्मेदारियां संभालीं. इसके बाद संगठन के राष्ट्रीय महिला प्रकोष्ठ और उच्च शिक्षा से जुड़े दायित्वों में भी रहीं. 

पिछले कुछ वर्षों से वे संगठन में अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख के तौर पर काम कर रही हैं. इस पृष्ठभूमि ने उन्हें शिक्षा, संगठन और प्रशासन, तीनों क्षेत्रों का अनुभव दिया. राम मंदिर ट्रस्ट में पहली महिला सदस्य के रूप में उनका चयन इसी व्यापक प्रोफाइल के साथ हुआ है.

राम मंदिर आंदोलन से पुराना रिश्ता

निर्मला यादव की ट्रस्ट तक पहुंच को समझने के लिए उनके पारिवारिक इतिहास को देखना जरूरी है. उनका मायका एटा जिले के अवागढ़ क्षेत्र में है जबकि उनकी शादी शिकोहाबाद के प्रतिष्ठित उरावर परिवार में हुई. 

उनके ससुर सूर्य कुमार यादव भारतीय वायुसेना में स्क्वाड्रन लीडर रहे थे. सेना से सेवानिवृत्ति के बाद वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और संगठन में जिम्मेदारी संभाली. उनके पति हरेंद्र यादव भी संघ और BJP से जुड़े रहे. उन्होंने कानून की पढ़ाई की थी, लेकिन वकालत को पेशा बनाने के बजाय संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय रहे. 

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक हरेंद्र यादव लंबे समय तक संघ से जुड़े रहे और राम मंदिर आंदोलन के दौरान भी सक्रिय रहे. 1992 के आंदोलन के समय उनके जेल जाने का भी उल्लेख मिलता है. परिवार का संघ से रिश्ता केवल एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहा. 

निर्मला यादव के जेठ योगेंद्र सिंह यादव भी संघ से जुड़े रहे और जिला स्तर पर संगठन में जिम्मेदारी संभाली. आपातकाल और राम मंदिर आंदोलन के दौर में उनके जेल जाने का उल्लेख परिवार से जुड़े लोगों ने किया है. 

शिकोहाबाद स्थित उरावर हाउस भी इस परिवार की सार्वजनिक और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र रहा है. परिवार के मुताबिक यहां संघ और जनसंघ से जुड़े लोगों की बैठकें होती रही हैं. उरावर परिवार का स्थानीय शिक्षा जगत में भी पुराना योगदान रहा है. 

परिवार से जुड़े लोगों के मुताबिक 1916 में शिकोहाबाद में एक शिक्षण संस्थान की स्थापना उनके पूर्वजों ने की थी. बाद में यही संस्थान आदर्श कृष्ण पीजी कॉलेज के नाम से जाना गया. इस कॉलेज का नाम शिकोहाबाद के सामाजिक इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है. यही वे सामाजिक परिवेश है जिसमें निर्मला यादव की शिक्षा, पेशेवर जिंदगी और सार्वजनिक सक्रियता आगे बढ़ी. 

हालांकि उनकी अपनी पहचान धीरे-धीरे शिक्षा और संगठन के क्षेत्र में बनी लेकिन परिवार की वैचारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि ने भी उनकी सार्वजनिक भूमिका को प्रभावित किया. राम मंदिर आंदोलन से उनका व्यक्तिगत जुड़ाव भी रहा है. वे

राम मंदिर निर्माण के लिए चलाए गए निधि समर्पण अभियान से जुड़ी थीं. परिवार के सदस्य भी लंबे समय से मंदिर आंदोलन और संघ से जुड़े रहे हैं. इस लिहाज से ट्रस्ट में उनकी नियुक्ति उनके लिए किसी बिल्कुल नए क्षेत्र में प्रवेश नहीं है, बल्कि लंबे सामाजिक-संगठनात्मक जुड़ाव का विस्तार है.

पहली महिला सदस्य के चयन का संदेश

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में निर्मला यादव की नियुक्ति का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक पहलू उनका महिला होना है. मंदिर ट्रस्ट के गठन के बाद पहली बार किसी महिला को इसमें जगह मिली है. उनकी नियुक्ति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू उनकी सामाजिक पहचान है. वे यादव समुदाय से आती हैं और शिकोहाबाद जैसे इलाके से हैं, जहां यादव राजनीति का मजबूत प्रभाव रहा है. 

फिरोजाबाद और आसपास का क्षेत्र लंबे समय से समाजवादी राजनीति का महत्वपूर्ण आधार रहा है. ऐसे में राम मंदिर ट्रस्ट जैसे BJP और संघ की वैचारिक राजनीति के प्रमुख केंद्र में एक यादव महिला का शामिल होना राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर संदेश देता है. 

हालांकि उनकी नियुक्ति को केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व के चश्मे से देखना उनके पूरे प्रोफाइल को सीमित कर देगा. उनका चयन उस प्रशासनिक अनुभव को भी सामने लाता है जो उन्होंने कॉलेजों के संचालन और शिक्षा क्षेत्र में करीब 25 वर्षों के दौरान हासिल किया. 

निर्मला यादव की निजी जिंदगी में भी कई कठिन दौर आए. प्राचार्या के पद पर रहते हुए उनके पति हरेंद्र यादव का निधन हो गया. परिवार के अनुसार उनकी मृत्यु असामयिक और परिस्थितियों को लेकर रहस्य से घिरी रही. इसके बावजूद निर्मला यादव ने अपनी पेशेवर और सामाजिक सक्रियता जारी रखी. 

पति के निधन के बाद संघ परिवार से जुड़े सामाजिक कार्यों में उनकी सक्रियता और बढ़ी. उनकी एक बेटी है, जिसकी शादी सीमा सुरक्षा बल में तैनात अधिकारी से हुई है.

निर्मला यादव के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती उनके पुराने अनुभव को राम मंदिर जैसी विशाल और संवेदनशील संस्था की जरूरतों के अनुरूप ढालने की होगी. कॉलेज की चारदीवारी के भीतर अनुशासन और प्रशासन संभालने से लेकर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े संस्थान की नीतिगत जिम्मेदारी तक का सफर आसान नहीं है.

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