
शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में BJP के मिले-जुले लेकिन आखिरकार सफल प्रदर्शन के ठीक तुरंत बाद राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के लिए अगली चुनावी जंग शुरू हो रही है. 23 अक्टूबर से शुरू होकर 16 नवंबर को समाप्त होने वाले चार चरणों के पंचायती राज चुनाव में परखा जाएगा कि शहरों में जिस राजनीतिक मशीनरी और चुनावी रणनीति को प्रभावी ढंग से शर्मा ने इस्तेमाल किया, क्या वह ग्रामीण राजस्थान में भी उतनी ही कारगर साबित होगी?
चुनाव का दायरा काफी बड़ा है. इन चुनावों में 41 जिला परिषदों, 457 पंचायत समितियों और 14,403 ग्राम पंचायतों को शामिल किया गया है. इनमें 4.03 करोड़ से अधिक मतदाता वोट डालने के लिए पात्र हैं. जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के लिए मतदान 14 नवंबर तक चार चरणों में होगा जबकि पंच और सरपंच पदों के लिए चुनाव 16 नवंबर तक चलेंगे. 41 जिला प्रमुखों और 457 प्रधानों के चुनाव क्रमशः 25 और 27 नवंबर को होने तय हुए हैं.
इसलिए यह ग्रामीण मुकाबला शहरी चुनावों की तुलना में बहुत बड़ी राजनीतिक परीक्षा है. इसमें पात्र मतदाताओं की संख्या सितंबर के शहरी चुनावों के 1.44 करोड़ मतदाताओं की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक है.
शहरी चुनावों के परिणामों से शर्मा को प्रोत्साहन और चेतावनी दोनों मिलती हैं. BJP 309 शहरी स्थानीय निकायों में से 148 में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी जबकि कांग्रेस 104 निकायों में सबसे बड़ी पार्टी रही. लेकिन वोट शेयर के मामले में दोनों के बीच मुकाबला काफी करीबी रहा. BJP को 35.18 प्रतिशत वोट मिले जबकि कांग्रेस को 34.24 प्रतिशत वोट मिले. दोनों के बीच सिर्फ 0.94 प्रतिशत अंक यानी 99,615 वोटों का अंतर रहा. वहीं, निर्दलीय उम्मीदवारों ने सामूहिक रूप से 27.38 प्रतिशत वोट हासिल किए.
सबसे महत्वपूर्ण पहलू वार्ड परिणामों के बाद सामने आया. BJP ने आखिरकार 200 से अधिक शहरी स्थानीय निकायों में अपने बोर्ड बनाए जो कि कांग्रेस के बनाए गए बोर्डों की संख्या से दोगुने से भी अधिक थे. यह अंतर शुरुआत में पार्टीवार मिली बढ़त की तुलना में काफी बड़ा था जो परोक्ष चुनावों में चुनाव बाद की बातचीत, क्रॉस-वोटिंग और राजनीतिक प्रबंधन का महत्व बताता है.

कांग्रेस अपनी चुनावी ताकत के बावजूद स्थानीय निकायों पर पकड़ बनाने में नाकाम रही है. अब पार्टी के भीतर इस पर मंथन शुरू हो गया है. पार्टी ने क्रॉस-वोटिंग और अन्य शिकायतों की जांच के लिए पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सी.पी.जोशी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया है. खबरों के मुताबिक, कांग्रेस के 400 से अधिक पार्षद जांच के दायरे में हैं. कांग्रेस जिला पर्यवेक्षकों और पंचायत समिति समन्वयकों के अलावा, अपने पक्ष में मतदाताओं को एकजुट करने के लिए अपने स्टार प्रचारकों को मैदान में उतारने की कोशिश कर रही है.
दूसरी ओर, BJP सरकार की उपलब्धियों को उजागर करने के लिए 90 प्रचार वाहन भेज रही है. मुख्यमंत्री शर्मा का चुनाव प्रचार इस बात पर टिका है कि कैसे उनके दो साल के कार्यकाल की उपलब्धियां कांग्रेस के शासन पर भारी पड़ती हैं. इस बीच, उन्होंने शहरी परिणामों को शासन व्यवस्था (गवर्नेस) के अभ्यास में बदलने के लिए तेजी से कदम उठाए हैं.
5 अक्टूबर को उन्होंने नवनिर्वाचित मेयरों, डिप्टी-मेयरों और शहरी निकायों के प्रमुखों से मुलाकात की और उनसे 100 दिनों की कार्य योजना के साथ काम करने को कहा. इसमें खास तौर पर साफ-सफाई, सड़कें, जल निकासी, सीवरेज, पेयजल, स्ट्रीट लाइट और अन्य बुनियादी सेवाओं पर जोर दिया गया. उन्होंने उनसे स्थानीय शिकायतों का निवारण करने और विकास का रोडमैप तैयार करने का भी आग्रह किया.
यह पहल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि शर्मा सरकार की आलोचना का एक कारण यह रहा है कि 2023 के विधानसभा चुनावों में BJP की जीत के बाद जो राजनीतिक उम्मीदें पैदा हुई थीं, सरकार का कामकाज उन उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहा. इसके लिए मुख्यमंत्री तेजी से पूरे राज्य का दौरा कर रहे हैं, परियोजनाओं का उद्घाटन कर रहे हैं और योजनाओं की घोषणा कर रहे हैं. अब ग्रामीण चुनाव प्रचार शुरू होने के साथ, BJP के प्रचार में कामकाज के नजर आने वाले नतीजों पर यही जोर बना रहने की संभावना है.
BJP ने संगठन स्तर पर भी तैयारी शुरू कर दी है. सितंबर में पार्टी ने संगठन में फेरबदल करते हुए संजय भाटिया को राजस्थान का प्रभारी बनाया जबकि कविता पाटीदार और कुलजीत चहल को सह-प्रभारी नियुक्त किया. यह बदलाव खास तौर पर पंचायती राज चुनावों की तैयारियों के बीच किया गया.
वहीं कांग्रेस शहरी चुनावों में उजागर हुई संगठनात्मक कमजोरियों को दूर करने की कोशिश कर रही है. उसकी रणनीति में समय पर टिकट वितरण, जमीनी स्तर पर पहले से सक्रिय कार्यकर्ताओं पर ज्यादा भरोसा करना और क्रॉस-वोटिंग रोकने के प्रयास शामिल हैं.
हालांकि शर्मा के लिए ग्रामीण क्षेत्रों का चुनाव एक अलग चुनौती पेश करता है. BJP शहरी निकायों में बोर्ड बनाने की अपनी रणनीति को यहां सीधे नहीं दोहरा सकती. गांव के स्तर की राजनीति बेहद स्थानीय, उम्मीदवारों पर केंद्रित और गुटबाजी से भरी होती है जबकि इसके बाद होने वाले प्रधानों और जिला प्रमुखों के चुनाव एक बार फिर परोक्ष मुकाबलों से जुड़े होंगे.
आंकड़े भी इस मुकाबले की गंभीरता और चुनौती को बढ़ाते हैं. पंचायती राज संस्थाओं के पुनर्गठन के बाद जिला परिषदों की संख्या 33 से बढ़कर 41, पंचायत समितियों की संख्या 352 से बढ़कर 457 और ग्राम पंचायतों की संख्या 11,320 से बढ़कर 14,403 हो गई है. राज्य निर्वाचन आयोग के अनुसार, निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या बढ़कर 1,55,138 हो जाएगी.
इसलिए शर्मा के लिए पंचायत चुनाव महज एक और दौर का स्थानीय चुनाव नहीं हैं. ये चुनाव इस बात की परीक्षा लेंगे कि जिस राजनीतिक प्रबंधन ने BJP को शहरी स्थानीय निकायों पर अपना नियंत्रण बढ़ाने में मदद की, क्या वह राज्य के विशाल ग्रामीण तंत्र में भी अपनी पैठ बना सकता है, और क्या उनकी सरकार के विकास कार्यों का संदेश राजस्थान के शहरों से निकलकर ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचना शुरू हुआ है या नहीं.

