
अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों को लेकर राजस्थान सरकार सर्वे सिर्फ स्थानीय निकायों में आरक्षण तय करने की कवायद से कहीं ज्यादा साबित हो सकता है. इसने ऐसा जातिगत गणित सामने रखा है, जो विश्लेषकों के मुताबिक सत्तारूढ़ BJP को राज्य में वही करने का मौका दे सकता है, जो उसने हरियाणा में किया था.
पार्टी ने हरियाणा में राजनीतिक रूप से प्रभावशाली जाट समुदाय को साधने की मजबूरी कम कर ली थी और गैर-जाट मतदाताओं के कहीं बड़े समूह को एकजुट किया था. अभी ऐसा कोई संकेत नहीं है कि यह BJP की स्पष्ट रणनीति है. फिर भी इसकी राजनीतिक संभावनाएं नजरअंदाज करना मुश्किल है.
19 अगस्त को राज्य निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह ने 309 शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव 9 और 11 सितंबर को कराने की घोषणा की. मतगणना 14 सितंबर को होगी. ये चुनाव भजनलाल शर्मा सरकार की लोकप्रियता और उसके कामकाज की जमीनी परीक्षा होंगे.
हालांकि सरकार ने शहरी चुनावों को पंचायती राज चुनावों से अलग कर दिया है. पंचायत संस्थाओं के लिए आरक्षण की लॉटरी पहले 17-18 अगस्त को होनी थी लेकिन अब इसे 17-18 सितंबर तक टाल दिया गया है. यह शहरी निकाय चुनावों के नतीजे आने के बाद होगी.
चुनावों का यह क्रम महत्वपूर्ण है. शहरी स्थानीय निकाय चुनाव पार्टी के आधार पर लड़े जाते हैं, जबकि पंचायत चुनावों में ऐसा नहीं होता. लेकिन शहरी चुनावों के नतीजे यह संकेत दे सकते हैं कि राज्य के ज्यादा महत्वपूर्ण ग्रामीण चुनावों से पहले BJP और कांग्रेस की तुलनात्मक स्थिति क्या है.

इसका यह भी मतलब है कि सरकार की पहले दोनों चुनाव लगभग एक साथ कराने की योजना अब चरणबद्ध तरीके में बदल गई है.
सरकार को इस बात की आलोचना झेलनी पड़ी थी कि वह सत्ता विरोधी लहर के डर से चुनाव टाल रही है. सरकार का कहना था कि वह OBC आयोग की रिपोर्ट का इंतजार कर रही थी, जो आरक्षण का स्वरूप तय करने के लिए जरूरी थी.
अब यह रिपोर्ट आ चुकी है और इसके निष्कर्ष राजस्थान के चुनावी समीकरणों को ही बदल सकते हैं.
सर्वे के मुताबिक राजस्थान में OBC आबादी 3.63 करोड़ से अधिक है. इसमें 92 समुदाय शामिल हैं, जिनमें पांच अति पिछड़ा वर्ग (MBC) समुदाय हैं. इसकी सबसे अहम बात OBC श्रेणी के भीतर आबादी का असमान वितरण है.
ताजा सर्वे में OBC आबादी कुल आबादी का 43 प्रतिशत बताई गई है. यह 1931 की जनगणना के अनुमानों के आधार पर किए गए पुराने आकलनों से कम है.
जाट और जाट सिख सबसे बड़ा समूह हैं. वे OBC आबादी का 20.14 प्रतिशत हैं, जो राज्य की कुल आबादी का करीब 9.2 प्रतिशत है. इनके बाद गुर्जर OBC आबादी के 9.11 प्रतिशत यानी राज्य की आबादी के करीब 4.2 प्रतिशत, कुम्हार-कुमावत 8.36 प्रतिशत यानी 3.8 प्रतिशत, माली-सैनी-बागवान 7.80 प्रतिशत यानी 3.6 प्रतिशत, जांगिड़-सुथार 3.49 प्रतिशत यानी 1.6 प्रतिशत, यादव-अहीर 3.22 प्रतिशत यानी 1.5 प्रतिशत और मेव 3.02 प्रतिशत यानी 1.4 प्रतिशत हैं.
ये सात समुदाय मिलकर राजस्थान की OBC आबादी का 55.14 प्रतिशत हैं लेकिन राज्य की कुल आबादी में इनकी हिस्सेदारी करीब 25.3 प्रतिशत है.
जाटों के लिए यह आंकड़ा राजनीतिक रूप से संवेदनशील है. समुदाय के कुछ हिस्से लंबे समय से राजस्थान की आबादी में अपनी हिस्सेदारी काफी ज्यादा बताते रहे हैं. कई बार यह दावा 12 प्रतिशत या उससे अधिक का रहा है. ऐसे में सर्वे में करीब 9.2 प्रतिशत का अनुमान विवादित होने की संभावना है.

लेकिन जब तक जातिगत जनगणना के जरिए ज्यादा विश्वसनीय आंकड़ा सामने नहीं आता यह सर्वे BJP और उसके विरोधियों के लिए एक नया संदर्भ बिंदु जरूर उपलब्ध कराता है. यहां तक कि गुर्जरों की 4.2 प्रतिशत हिस्सेदारी भी उस दावे से काफी कम है जो वे नौकरियों में ज्यादा प्रतिनिधित्व की मांग करते समय लंबे समय से करते रहे हैं.
रोजगार के आंकड़े इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं. सर्वे के मुताबिक OBC समुदायों के करीब 3.92 लाख सरकारी कर्मचारी हैं. इनमें चार समुदायों- जाट, गुर्जर, सैनी और यादव की हिस्सेदारी करीब 78 प्रतिशत है.
बाकी सभी OBC समुदायों के कुल मिलाकर करीब 86,000 कर्मचारी हैं. 18 OBC समुदायों के सरकारी सेवा में 100 से भी कम सदस्य हैं.
सिर्फ जाटों के करीब 1.82 लाख लोग सरकारी कर्मचारी हैं. यह सभी OBC सरकारी कर्मचारियों का करीब 46 प्रतिशत है. गुर्जरों के 44,475, सैनी समुदाय के 42,912 और यादवों के 39,907 सरकारी कर्मचारी हैं.
इन आंकड़ों से आबादी और सरकारी रोजगार के बीच एक असामान्य अंतर सामने आता है. उदाहरण के लिए, यादव OBC आबादी का सिर्फ 3.22 प्रतिशत हैं लेकिन वे उन चार समुदायों में शामिल हैं जिनके पास OBC सरकारी कर्मचारियों का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा है.
गुर्जर OBC आबादी के 9.11 प्रतिशत हैं, लेकिन उनके 44,475 सरकारी कर्मचारी हैं. वहीं जाट OBC आबादी के 20.14 प्रतिशत हैं, लेकिन OBC सरकारी कर्मचारियों में उनकी हिस्सेदारी करीब आधी है.
इन आंकड़ों से अपने आप यह साबित नहीं होता कि किसी समुदाय को नौकरियों में अनुचित हिस्सेदारी मिली है. लेकिन राजनीतिक तौर पर किसे कितना फायदा मिला, इसे लेकर बनी धारणा आंकड़ों से जुड़े इन स्पष्टीकरणों से ज्यादा प्रभावशाली हो सकती है.
यहीं हरियाणा से तुलना महत्वपूर्ण हो जाती है. हरियाणा में BJP ने 2014 में साबित किया कि वह राज्य की पारंपरिक जाट-केंद्रित राजनीतिक व्यवस्था पर निर्भर हुए बिना चुनाव जीत सकती है.
पार्टी ने OBC और दलितों समेत गैर-जाट मतदाताओं को एकजुट किया और गैर-जाट मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाया. इस रणनीति ने बिखरे हुए सामाजिक बहुमत को जाटों के मुकाबले चुनावी ताकत में बदल दिया और बाद के चुनावों में भी BJP को जीत दिलाने में मदद की.
राजस्थान हरियाणा नहीं है. यहां जाट संख्या के लिहाज से कम प्रभावशाली हैं और उन्होंने कभी एकजुट होकर मतदान नहीं किया है. लेकिन OBC सर्वे ने गैर-जाट गठबंधन बनाने की कोशिश करने वाले किसी भी दल के लिए एक राजनीतिक रूप से उपयोगी चीज जरूर की है.
इसने OBC श्रेणी को 92 प्रतिस्पर्धी समुदायों में बांटकर दिखाया है कि इसके लाभों का वितरण बेहद असमान है.
इससे OBC के भीतर उप-वर्गीकरण की मांग फिर जोर पकड़ सकती है. छोटे समुदाय अब सवाल उठा सकते हैं कि सरकारी नौकरियों में कुछ ही समूहों का दबदबा क्यों है जबकि 18 समुदायों के 100 से भी कम कर्मचारी हैं.
इस तर्क का ऐतिहासिक आधार भी है. जब जाटों को OBC श्रेणी में शामिल किया गया था, तब सवर्ण नेतृत्व के कुछ हिस्सों ने तर्क दिया था कि उनकी अपेक्षाकृत मजबूत सामाजिक-आर्थिक स्थिति उन्हें कम सुविधासंपन्न OBC समुदायों के लिए निर्धारित लाभों पर कब्जा करने में सक्षम बना सकती है.
इसके बाद छोटे समुदायों को उप-वर्गीकरण के जरिए संरक्षण देने की मांग ने राजनीतिक गति खो दी. नया सर्वे इसे फिर से उठाने के लिए कहीं मजबूत तथ्यात्मक आधार देता है.
शहरी निकायों में आरक्षण की लॉटरी ने इसमें एक और परत जोड़ दी है. राजस्थान के 10 नगर निगमों में छह मेयर पद महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, जबकि सिर्फ कोटा में OBC महिला के लिए मेयर पद आरक्षित किया गया है.
जयपुर, जोधपुर, उदयपुर और बीकानेर में मेयर पद सामान्य वर्ग के लिए हैं. लॉटरी के नतीजों को स्थाई तौर पर OBC प्रतिनिधित्व में कमी के रूप में नहीं देखा जा सकता क्योंकि आरक्षण तय नियमों के अनुसार बदलता रहता है. लेकिन सर्वे के साथ मिलकर इसके नतीजे राजनीतिक रूप से दिलचस्प जरूर हैं.
इसलिए BJP का अवसर सीधे जाटों से मुकाबला करने में नहीं, बल्कि उन्हें कम अनिवार्य बनाने में हो सकता है. शहरी चुनाव इस बात का पहला संकेत देंगे कि यह गणित चुनावी असर पैदा कर सकता है या नहीं. पंचायत चुनाव, जिनमें ग्रामीण और जातिगत नेटवर्क की भूमिका ज्यादा गहरी है, ज्यादा निर्णायक परीक्षा होंगे.
भविष्य में होने वाली जातिगत जनगणना ज्यादा विश्वसनीय आंकड़ा उपलब्ध कराएगी. तब तक OBC सर्वे राजस्थान के राजनीतिक वर्ग के पास उपलब्ध जातिवार सबसे विस्तृत आंकड़ा है.
इसका सबसे बड़ा राजनीतिक असर यह हो सकता है कि यह OBC राजनीति को एकल चुनावी समूह के बजाय अलग-अलग समुदायों के बीच प्रतिस्पर्धा में बदल दे.
अगर BJP छोटे OBC समूहों को यह समझाने में सफल होती है कि पुरानी आरक्षण व्यवस्था का फायदा कुछ प्रभावशाली समूहों को आबादी के अनुपात में ज्यादा मिला है तो राजस्थान हरियाणा के प्रयोग का अपना संस्करण देख सकता है.
इसमें जाटों को हराना जरूरी नहीं होगा बल्कि यह सुनिश्चित करना होगा कि जाट अकेले चुनावी नतीजे तय न कर सकें. लेकिन कांग्रेस की कमान एक जाट के हाथ में है. प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा अपनी पार्टी के पक्ष में जाटों को लामबंद करेंगे,ताकि BJP की संभावित रणनीति को रोका जा सके.

