
2026 के राजस्थान नगर निकाय चुनावों ने BJP के सामने एक राजनीतिक पहेली खड़ी कर दी है. पार्टी ने कांग्रेस के मुकाबले ज्यादा वार्ड और शहरी निकाय जीत, लेकिन पूरे राज्य में दोनों पार्टियों के वोट शेयर का अंतर एक प्रतिशत से भी कम रहा. वहीं, निर्दलीय उम्मीदवारों को 27.38 प्रतिशत वोट मिले यानी 29.07 लाख वोट. इस तरह राज्य के नगर निकाय चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवार तीसरी सबसे बड़ी चुनावी ताकत बनकर सामने आए.
पहली नजर में इसे सामान्य वर्ग के कुछ लोगों में BJP के खिलाफ नाराजगी के तौर पर देखा जा सकता है खासकर यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने) के 2026 के नियमों को लेकर. इन नियमों के खिलाफ राजस्थान में प्रभावशाली जातियों के संगठनों ने लगातार विरोध किया था. इनमें राजपूत करणी सेना भी शामिल थी.
सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में इन नियमों पर रोक लगा दी थी लेकिन इसके बाद भी विवाद जारी रहा. नियमों को पूरी तरह वापस लेने की मांग को लेकर प्रदर्शन भी हुए. प्रदर्शनकारियों ने निर्दलीय उम्मीदवारों को वोट देने या NOTA दबाने की अपील की थी.
हालांकि, NOTA को शहरी इलाकों में केवल करीब एक प्रतिशत वोट मिले. पिछले दो चुनावों के मुकाबले इसमें कोई खास बदलाव नहीं हुआ. वहीं, निर्दलीय उम्मीदवारों को बड़ी संख्या में वोट मिलना राजस्थान के नगर निकाय चुनावों में पुरानी बात है. यह BJP के खिलाफ कोई नया रुझान नहीं है. इससे यह साबित नहीं होता कि इस मुद्दे की वजह से नगर निकाय चुनावों में BJP के खिलाफ वोट करने वाला कोई नया समूह बना है.
सबसे अहम आंकड़ा 27.38 प्रतिशत नहीं बल्कि पिछले चुनावों का रुझान है. 2015 के शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवारों को करीब 27 प्रतिशत वोट मिले थे, 2019 में 27.72 प्रतिशत और 2026 में 27.38 प्रतिशत. यानी UGC के नियमों को लेकर बड़े राजनीतिक विवाद के बावजूद निर्दलीय उम्मीदवारों का वोट शेयर लगभग उतना ही रहा, जितना विवाद शुरू होने से पहले था.

इसलिए 2026 में निर्दलीयों को मिले वोटों को सिर्फ सामान्य वर्ग की UGC के मुद्दे पर नाराजगी से जोड़ना आसान नहीं है. आंकड़ों से पता चलता है कि राजस्थान के नगर निकाय चुनावों में निर्दलीयों को लंबे समय से अच्छा समर्थन मिलता रहा है. स्थानीय नेताओं की पकड़, पार्टी का टिकट नहीं मिलने से नाराज नेता, जातीय समीकरण, गुटबाजी और BJP-कांग्रेस दोनों से नाराज मतदाताओं की वजह से निर्दलीयों को शहरी चुनावों में लंबे समय से समर्थन मिलता रहा है.
यही बात सामान्य वर्ग से जुड़े एक और संवेदनशील मुद्दे EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) के आरक्षण पर भी लागू होती है. शिव विधानसभा से विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने हाल में EWS की पात्रता में बदलाव की मांग की है. उनका कहना है कि पांच एकड़ जमीन के नियम से यह पता नहीं चलता कि जमीन कितनी उपजाऊ है और उसके मालिक की आर्थिक स्थिति कैसी है.
उन्होंने केंद्र की नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में राज्य सरकार की ओर से जारी EWS प्रमाणपत्रों को मान्यता देने, प्रमाणपत्र की वैधता की अवधि बढ़ाने और EWS उम्मीदवारों को दूसरी सुविधाएं देने की भी मांग की है. भाटी का कहना है कि 75 से ज्यादा विधायकों ने इन मांगों का लिखित समर्थन किया है.
यह ऐसा मुद्दा है, जिससे एक बड़ा राजनीतिक समूह बन सकता है. उदाहरण के लिए, पश्चिमी राजस्थान के सूखे इलाकों में पांच एकड़ जमीन की कीमत और उससे होने वाली कमाई की तुलना किसी दूसरे इलाके की ज्यादा उपजाऊ या महंगी कृषि जमीन के पांच एकड़ से नहीं की जा सकती लेकिन यहां भी पूरे राज्य के नगर निकाय चुनावों के आंकड़े यह साबित नहीं करते कि EWS के मुद्दे की वजह से निर्दलीय उम्मीदवारों के समर्थन में कोई नया उछाल आया है.
एक और बात है, जिससे यह कहना आसान नहीं है कि सामान्य वर्ग BJP से नाराज है. UGC के नियमों से नाराज लोगों को इसका सीधा फायदा कांग्रेस को नहीं मिल सकता क्योंकि कांग्रेस लंबे समय से आरक्षण और प्रतिनिधित्व के पक्ष में राजनीति करती रही है. वहीं, UGC का विवाद उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए नियमों को लेकर है. इसलिए जिन मतदाताओं की मुख्य नाराजगी आरक्षण से जुड़े फैसलों को लेकर है, उनके लिए कांग्रेस कोई साफ राजनीतिक विकल्प नहीं बनती.
फिर भी, अजमेर में कांग्रेस का EWS से एक खास जुड़ाव रहा है. राजस्थान पर्यटन विकास निगम (RTDC) के पूर्व चेयरमैन और कांग्रेस नेता धर्मेंद्र राठौड़ EWS की पात्रता में बदलाव के लिए लगातार अभियान चलाते रहे हैं. इसमें उन शर्तों में ढील देने की मांग भी शामिल है जिनके बारे में उनका कहना है कि वे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए नुकसानदेह हैं. 2024 में राठौड़ ने अशोक गहलोत सरकार की ओर से EWS की शर्तों में दी गई ढील का खास तौर पर जिक्र किया था और केंद्र से भी इसी तरह के बदलाव की मांग की थी.
2026 में भी वे EWS के मुद्दे पर अभियान चलाते रहे हैं. उनकी भूमिका इसलिए भी अहम है क्योंकि अजमेर में कांग्रेस ने शहरी चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया. यहां कांग्रेस ने 80 निगम सीटों में से 37 सीटें जीतीं जबकि BJP को 32 और निर्दलीयों को 11 सीटें मिलीं. अजमेर में कांग्रेस के चुनाव अभियान की अगुवाई राठौड़ ने की थी.
इसलिए 2026 के आंकड़ों से जो बड़ी तस्वीर सामने आती है, वह थोड़ी अलग है. UGC के नियमों, EWS के नियमों और आरक्षण से जुड़े दूसरे मुद्दों को लेकर सामान्य वर्ग के कुछ लोगों में BJP के खिलाफ नाराजगी हो सकती है लेकिन पूरे राज्य में निर्दलीय उम्मीदवारों को मिले वोट से यह साबित नहीं होता कि कोई नई चुनावी लहर बनी है.
दरअसल 2026 में BJP का वोट शेयर 35.18 प्रतिशत था जो कांग्रेस के 34.24 प्रतिशत से सिर्फ थोड़ा ज्यादा था. वहीं निर्दलीय उम्मीदवारों का वोट शेयर करीब 27 प्रतिशत रहा, जो करीब एक दशक से लगभग इसी स्तर पर है लेकिन वार्डों के नतीजों में बड़ा अंतर दिखा. BJP ने कांग्रेस के 3,613 वार्डों के मुकाबले 4,179 वार्ड जीते. यानी दोनों पार्टियों के वोट शेयर में मामूली अंतर के बावजूद BJP ने 566 वार्ड ज्यादा जीते. इसकी वजह वार्डों के परिसीमन को बताया जा रहा है. नए वार्ड BJP के मजबूत इलाकों को ध्यान में रखकर बनाए गए ताकि पार्टी की जीत सुनिश्चित हो सके.
कांग्रेस के लिए भी यह एक मुश्किल स्थिति है क्योंकि BJP से नाराज मतदाता जरूरी नहीं कि अपना वोट कांग्रेस को ही दें. पार्टी के सामने चुनौती है कि UGC के नियमों, EWS की शर्तों, स्थानीय प्रशासन या उम्मीदवारों के चयन को लेकर लोगों की अलग-अलग नाराजगी को एक साफ राजनीतिक विकल्प में बदला जाए.
2026 के नगर निकाय चुनावों से पता चलता है कि BJP से नाराज मतदाताओं के पास कई विकल्प हैं और निर्दलीय उम्मीदवारों को मिलने वाला समर्थन राजस्थान की राजनीति में लंबे समय से बना हुआ है.

