
राजस्थान के निकाय चुनावों के नतीजों ने कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरियों को जरूर उजागर किया है. लेकिन BJP के मुकाबले मामूली वोट अंतर, बीकानेर और सीकर में जीत, जोधपुर में बराबरी और पाली, जालौर व अलवर में कड़े मुकाबले बताते हैं कि पार्टी के पास अभी भी ऐसा जनाधार है, जिसके सहारे वह 2028 के विधानसभा चुनावों की तैयारी कर सकती है.
कांग्रेस के लिए शहरी स्थानीय निकाय चुनावों का यह फैसला ऐसा नहीं है जिससे निराश होने की जरूरत हो. इसके बजाय यह उसे याद दिलाता है कि वह अभी भी मुकाबले में है. उसकी मुख्य चुनौती एक ऐसी अनुशासित चुनावी मशीनरी तैयार करने की है जो जनता के समर्थन को वोटों में बदल सके.
राजस्थान के 309 शहरी स्थानीय निकायों में BJP स्पष्ट रूप से आगे रही. लेकिन इन नतीजों के पीछे मुकाबला काफी करीबी रहा. 10,000 से ज्यादा वार्डों के नतीजे घोषित होने के बाद BJP को 35.18 फीसदी वोट मिले, जबकि कांग्रेस का वोट शेयर 34.24 फीसदी रहा.
यानी दोनों के बीच सिर्फ 0.94 फीसदी का अंतर रहा. BJP ने 4,171 वार्ड जीते जबकि कांग्रेस को 3,597 वार्डों में जीत मिली.
जानकारों का कहना है कि जयपुर में लंबे समय से सत्ता से बाहर रहने और 2023 के विधानसभा चुनाव हारने वाली कांग्रेस का शहरी चुनाव में BJP से एक फीसदी से भी कम अंतर पर रहना महत्वपूर्ण है. इससे संकेत मिलता है कि राजस्थान की स्थिति गुजरात या मध्य प्रदेश जैसी नहीं हुई है जहां कांग्रेस के लिए सत्तारूढ़ BJP को गंभीर चुनौती देना लगातार मुश्किल होता गया है.

निकाय चुनावों के नतीजे बताते हैं कि राजस्थान अब भी दो प्रमुख राजनीतिक दलों वाला राज्य है. निर्दलीय उम्मीदवार एक मजबूत तीसरी ताकत के रूप में उभरे हैं लेकिन वे BJP के खिलाफ मुख्य ताकत के रूप में कांग्रेस की जगह नहीं ले पाए हैं.
309 शहरी निकायों में BJP ने 148 में बहुमत हासिल किया जबकि कांग्रेस को 104 में बहुमत मिला. 10 अन्य शहरी निकायों में दोनों पार्टियां सबसे बड़ी पार्टी के रूप में बराबरी पर रहीं.
कई उदाहरण हैं जो बताते हैं कि पूरे नतीजे को सिर्फ BJP की जीत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. BJP के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के गृह जिले सीकर में कांग्रेस ने नगर परिषद पर जीत हासिल की और शेखावाटी के ज्यादातर इलाके में भी अच्छा प्रदर्शन किया.
कांग्रेस ने सचिन पायलट के विधानसभा क्षेत्र टोंक में भी जीत दर्ज की. इससे भी अहम बात यह रही कि उसने केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के गृह शहर बीकानेर के नगर निगम में जीत हासिल की.
फिर जोधपुर का मामला है. यहां BJP और कांग्रेस के बीच 44-44 की असाधारण बराबरी रही और निर्दलीय उम्मीदवार निर्णायक स्थिति में आ गए. यह मुकाबला केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के प्रभाव की परीक्षा भी बन गया.
गहलोत ने अपने गृह क्षेत्र को पूरी तरह स्थानीय संगठन के भरोसे नहीं छोड़ा. उन्होंने सक्रिय रूप से प्रचार किया और BJP के लिए संभावित रूप से आसान नतीजे को रोकने में मदद की.

जानकारों का कहना है कि कांग्रेस को इससे एक सबक लेना चाहिए. उसके बड़े नेताओं के पास अब भी राजनीतिक प्रभाव है. सवाल यह है कि पार्टी इसका इस्तेमाल कितने रणनीतिक तरीके से कर पाती है.
अलवर इसका एक और उदाहरण है. कांग्रेस ने BJP को 65 सदस्यीय नगर निगम में स्पष्ट बहुमत हासिल करने से रोक दिया. विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस के टीकाराम जूली ने खुद पार्टी के उम्मीदवारों को संभाला.
उन्होंने उनसे अलग-अलग बैठकें कीं और पार्टी के उम्मीदवारों को एकजुट रखने की कोशिश की. जालौर में कांग्रेस बहुमत से सिर्फ दो सीट दूर है.
ये सिर्फ अलग-अलग जगहों की सफलताएं नहीं हैं. इनसे संकेत मिलता है कि राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों में कांग्रेस के पास अभी भी संगठनात्मक और सामाजिक समर्थन के कुछ मजबूत क्षेत्र हैं जिन्हें 2028 के चुनाव से पहले सक्रिय किया जा सकता है.
पार्टी को 2023 के चुनावों में अपने प्रदर्शन को भी याद रखना चाहिए. कांग्रेस ने 200 में से 70 विधानसभा सीटें जीती थीं और उसे 39.96 फीसदी वोट मिले थे. सत्ता गंवाने के बावजूद सीटों के लिहाज से यह 1998 के बाद उसका सबसे मजबूत प्रदर्शन था.

चुनौती यह है कि कांग्रेस इस आधार पर क्या खड़ा कर सकती है. उसके सामने BJP है, जिसके पास राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के रूप में वैचारिक आधार तो है ही, साथ ही ऐसा कैडर भी है जो चुनावों के बीच लगातार सक्रिय रहता है, बूथ स्तर पर मतदाताओं को जुटाता है और एक बड़े राजनीतिक उद्देश्य के साथ काम करता है.
कांग्रेस के पास जमीनी स्तर पर इसके समान कोई भावनात्मक या वैचारिक आधार नजर नहीं आता. अक्सर उसकी राजनीति सत्ता हासिल करने और पार्टी के भीतर खेमेबाजी तक सिमटी हुई दिखती है. जानकारों का कहना है कि राजस्थान में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को अपने राजनीतिक नैरेटिव को लेकर यहीं ज्यादा गंभीरता से सोचने की जरूरत है.
राजस्थान के सामाजिक और सांस्कृतिक मिजाज को भी समझना होगा. जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता 'मनुस्मृति' जैसे मुद्दों पर टकराव मोल लेते हैं या खान-पान और मांसाहार जैसे विषयों पर रुख अपनाते हैं तो इससे कांग्रेस को राजस्थान के सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल से कटी हुई पार्टी के तौर पर पेश करने की कोशिशों को बल मिल सकता है.
इसलिए निकाय चुनाव का फैसला कांग्रेस के लिए एक विरोधाभासी स्थिति दिखाता है. यह हार है लेकिन ऐसी हार नहीं जो पार्टी के अस्तित्व के लिए खतरा बन जाए. BJP आगे है लेकिन उसने कांग्रेस को हाशिये पर नहीं धकेला है.
आगामी पंचायती राज चुनावों से पहले यही कांग्रेस के लिए सबसे अहम संदेश है. राजस्थान में 2028 में नई विधानसभा के लिए मतदान से पहले ये चुनाव शायद कांग्रेस के पास आखिरी बड़ा मौका होंगे.

