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महाराष्ट्र में गणेश उत्सव के लिए मूर्तियों की मांग पूरी करना क्यों हुआ मुश्किल?

महाराष्ट्र के प्रमुख गणेश प्रतिमा निर्माण केंद्र पेन में बाढ़ ने मूर्तिकारों की महीनों की मेहनत पर पानी फेर दिया है. कई वर्कशॉप जलमग्न होने से प्रतिमाओं का नुकसान हुआ है, जिससे गणेश उत्सव से पहले बाजार में सप्लाई प्रभावित होने की आशंका है

भारी बारिश के कारण गणेश उत्सव में मूर्तियों की हो सकती है भारी कमी
भारी बारिश के कारण गणेश उत्सव में मूर्तियों की हो सकती है भारी कमी
अपडेटेड 21 जुलाई , 2026

महाराष्ट्र में मूसलाधार बारिश ने रायगढ़ जिले के मूर्तिकारों को बड़ा झटका दिया है. रायगढ़ का पेन तालुका गणेश प्रतिमा निर्माण उद्योग का प्रमुख केंद्र है, जहां हजारों कारीगर काम करते हैं. पातालगंगा नदी और आसपास की खाड़ियों का पानी वर्कशॉप में भर जाने से कई प्रतिमाएं क्षतिग्रस्त हो गई हैं या बह गई हैं.

वर्कशॉप संचालकों का कहना है कि सितंबर में होने वाले गणेश उत्सव के लिए मिले ऑर्डर समय पर पूरे करना अब उनके लिए बड़ी चुनौती होगी. करीब तीन दशकों से मुंबई से 60 किलोमीटर से अधिक दूर स्थित पेन, हमरापुर और आसपास के गांवों के लोग गणेश प्रतिमा बनाकर अपनी आजीविका चलाते हैं.

यहां प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) और शाडू मिट्टी दोनों तरह की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं, जिन्हें भारत और विदेशों में बेचा जाता है. साल 2023 में पेन की गणेश प्रतिमाओं को प्रतिष्ठित भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिला था. पेन और हमरापुर में लगभग 600 वर्कशॉपएं हैं, जहां हर साल करीब 10 लाख प्रतिमाएं बनाई जाती हैं. इस उद्योग से पेन तालुका में लगभग 2.5 लाख लोगों को रोजगार मिलता है और इसका सालाना कारोबार लगभग 200 करोड़ रुपए का है.

इस उद्योग पर कई अन्य लोगों की भी रोजी-रोटी निर्भर है. प्रतिमाएं ढोने वाले 'गणपतिची गाड़ी' ट्रक, कच्चा माल उपलब्ध कराने वाले सप्लायर, थोक और खुदरा व्यापारी, तथा वर्कशॉपों में काम करने वाले कारीगरों को चाय-नाश्ता उपलब्ध कराने वाले स्थानीय दुकानदार भी इसी उद्योग पर निर्भर हैं.

प्रतिमा निर्माण से जुड़े कारोबारी कुणाल पाटिल ने बताया कि पातालगंगा नदी में आई बाढ़ से तांबडशेत, दादर, कलावे और जोहे की वर्कशॉपएं प्रभावित हुई हैं. उन्होंने कहा, "कुछ वर्कशॉप बह गईं और कई प्रतिमाएं बाढ़ के तेज बहाव में बह गईं." पाटिल के अनुसार, निर्माण के अलग-अलग चरणों में मौजूद 500 से 1,000 प्रतिमाओं का नुकसान हुआ है.

पेन के बोरगांव के प्रतिमा निर्माता अविनाश भोईर ने कहा कि यह बाढ़ ऐसे समय आई है, जब उद्योग पहले से ही पश्चिम एशिया में तनाव के कारण शिपिंग मार्गों पर पड़े असर से जूझ रहा है. इससे विदेशों में रहने वाले भारतीय परिवारों तक प्रतिमाएं भेजना प्रभावित हुआ है.

इसके अलावा पेंट, प्लास्टिक बैग और ईंधन की कीमतें भी बढ़ गई हैं. उन्होंने कहा, "पेन शहर में कई वर्कशॉप मिट्टी की प्रतिमाएं बनाती हैं. पानी भरने से मिट्टी की प्रतिमाएं खराब हो गई हैं क्योंकि वे बहुत नाजुक होती हैं और पानी में घुल जाती हैं."

इस बीच दो फीट ऊंची PoP प्रतिमा की थोक कीमत 1,800 रुपए से बढ़कर 2,000 रुपए हो गई है. वहीं, डेढ़ फीट ऊंची मिट्टी की प्रतिमा की कीमत पिछले साल के 1,300 की तुलना में करीब 300 रुपए बढ़ गई है. मुंबई और पुणे जैसे शहरों के खुदरा व्यापारी बड़ी संख्या में यहां से प्रतिमाएं खरीदते हैं. मुंबई में लगभग 12,000 सार्वजनिक गणेश मंडल हैं और घरेलू पूजा के लिए 2 लाख से अधिक प्रतिमाओं की जरूरत होती है.

भोईर बताते हैं कि ट्रांसपोर्ट की लागत भी बढ़ गई है. मुंबई से लगभग 40 किलोमीटर दूर पनवेल तक ट्रक से प्रतिमाएं भेजने का खर्च पिछले साल के 3,000 रुपए से बढ़कर 5,000 रुपए हो गया है. एक अन्य प्रतिमा निर्माता ने बताया कि बाढ़ का सबसे ज्यादा असर मिट्टी की प्रतिमाएं बनाने वालों पर पड़ा है. हालांकि, कई वर्कशॉप मालिकों को बीमा होने के कारण नुकसान से कुछ राहत मिली है.

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1894 से सार्वजनिक गणेश उत्सव की शुरुआत को लोकप्रिय बनाया था. इससे पहले यह उत्सव केवल घरों तक सीमित था. उस समय प्रतिमाएं स्थानीय रूप से उपलब्ध मिट्टी से बनाई जाती थीं.

1950 के दशक में पेन गणेश प्रतिमा निर्माण का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा क्योंकि यह मुंबई और पुणे जैसे बड़े बाजारों के करीब था. पेन के आसपास की पहाड़ियों की मिट्टी अच्छी गुणवत्ता की नहीं थी लेकिन मुंबई की नजदीकी उसके लिए फायदेमंद साबित हुई. उस समय मैंगलोर टाइल्स और अन्य सामान लाने वाले मालवाहक जहाज मुंबई बंदरगाह पर आते थे.

समुद्र में जहाज का संतुलन बनाए रखने के लिए गुजरात की महीन सफेद मिट्टी से भरे बोरे इन जहाजों में लादे जाते थे. मुंबई पहुंचने के बाद व्यापारी इन बोरों को बहुत कम कीमत पर बेच देते थे. वहां से इन्हें नाव के जरिए पेन से करीब एक मील दूर अंतोरा बंदरगाह तक पहुंचाया जाता था. इससे मूर्तिकारों को प्रतिमा बनाने के लिए कच्चा माल मिलने लगा.

भारत की 1961 की जनगणना में प्रकाशित 'हैंडिक्राफ्ट्स ऑफ महाराष्ट्र: क्ले इमेजेज ऑफ पेन' के अनुसार, पेन के एन. जी. 'राजाभाऊ' देवधर पहले कलाकार थे, जिन्होंने सजावटी प्रतिमाएं बनाने के लिए प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) का इस्तेमाल शुरू किया. बाद में गणेश प्रतिमाएं भी PoP से बनने लगीं, लेकिन उस समय उनका उपयोग केवल सजावट के लिए होता था.

धीरे-धीरे प्रतिमाएं बनाने में PoP का इस्तेमाल बढ़ता गया क्योंकि इससे काम करना आसान था. आज मुंबई का 'लालबागचा राजा' जैसे गणेश मंडल भगवान गणेश की विशाल प्रतिमाओं के लिए प्रसिद्ध हैं. ऐसी बड़ी PoP प्रतिमाओं की परंपरा की शुरुआत फिल्म उद्योग से मानी जाती है.

प्रसिद्ध फिल्मकार वी. शांताराम की 1959 में आई फिल्म 'नवरंग' में 11 फीट ऊंची गणपति प्रतिमा दिखाई गई थी. उनके बेटे किरण शांताराम के अनुसार, यह प्रतिमा परेल स्थित राजकमल स्टूडियो में ही बनाई गई थी और बाद में पूरे विधि-विधान से उसका विसर्जन किया गया. इसके बाद धीरे-धीरे PoP की प्रतिमाओं का चलन बढ़ता गया.

प्रतिमा निर्माता और चौथी पीढ़ी के मूर्तिकार श्रीकांत देवधर, जो एन. जी. देवधर के भतीजे हैं, बताते हैं कि 1980 के दशक तक पेन में मिट्टी और PoP की प्रतिमाएं बनाने वाली लगभग 500 वर्कशॉप थीं. 1990 के दशक में हमरापुर और आसपास के इलाके भी प्रतिमा निर्माण के केंद्र बन गए. पेन की वर्कशॉप वहां काम ठेके पर देने लगीं. मुंबई और अन्य शहरों के खुदरा व्यापारियों के लिए भी वहां काम कराना अपनी खुद की वर्कशॉप चलाने और ऊंचा किराया देने की तुलना में अधिक सस्ता पड़ता था.

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