
विश्व हिंदू परिषद (VHP) की ओर से पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा को लेकर दिए नए सुझावों से आयोजकों के बीच सवाल उठने लगे हैं. संगठन ने कहा है कि अगर पूजा समितियां उसके सुझाव नहीं मानती हैं तो वह 'दखल' दे सकता है. अब आयोजक जानना चाहते हैं कि इस 'दखल' का मतलब क्या है. यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब अक्टूबर में होने वाली दुर्गा पूजा की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं.
26 अगस्त को VHP की ओर से आयोजित एक बैठक में दुर्गा पूजा की 'परंपरा, पवित्रता और धार्मिक गरिमा' पर चर्चा हुई. इस दौरान संगठन ने कई सुझाव दिए. इनमें पूजा की शुरुआत कैसे हो, मूर्तियों को किस तरह रखा जाए, पूजा की थीम कैसी हो, पंडालों के पास किस तरह का खाना बेचा जाए और मूर्तियों का विसर्जन कब हो, जैसे मुद्दे शामिल थे.
सबसे अहम बात तब सामने आई जब VHP के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल के सदस्य स्वामी निगूर्हानन्द से पूछा गया कि उन पूजा समितियों का क्या होगा, जिनकी तैयारियां काफी आगे बढ़ चुकी हैं और जो VHP के सुझावों के मुताबिक नहीं हैं.
दुर्गा पूजा में अब करीब 50 दिन बाकी हैं और कई पूजा समितियां अपने काम का करीब 40 फीसदी हिस्सा पूरा कर चुकी हैं. निगूर्हानन्द ने कहा कि बदलाव करने के लिए अभी भी समय है. उन्होंने कहा, "अभी भी पर्याप्त समय है कि जो भी सुधार जरूरी हों, उसे किया जा सके लेकिन अगर किसी सुधार की जरूरत है और समिति उसे नहीं करती है तो हम दखल देंगे." हालांकि, इस 'दखल' का मतलब क्या होगा, यह साफ नहीं किया गया.

इस साल दुर्गा पूजा अक्टूबर के बीच में होगी और यह बंगाल का सबसे बड़ा सांस्कृतिक और धार्मिक त्योहार है. अकेले कोलकाता में करीब 4,000 सामुदायिक पूजा होती हैं. बड़े स्तर की पूजा का बजट 1 करोड़ रुपए या उससे ज्यादा होता है जबकि मध्यम स्तर की पूजा पर 20 लाख से 50 लाख रुपए तक खर्च होते हैं.
VHP के पास सामुदायिक दुर्गा पूजा के आयोजन को लेकर कोई कानूनी अधिकार नहीं है. संगठन ने यह भी साफ नहीं किया कि वह इस मामले को लेकर किस प्रकार की कार्रवाई करेगा. मसलन समझाने की कोशिश करेगा या सार्वजनिक तौर पर विरोध करेगा, अथवा प्रशासन से संपर्क करेगा या किसी और तरीके से दखल देगा. यह साफ न होना इसलिए अहम है क्योंकि कई पूजा समितियां मूर्तियों, थीम, पंडाल के डिजाइन और दूसरी तैयारियों पर पहले ही काफी पैसा खर्च कर चुकी हैं.
ऐसे में सांस्कृतिक और धार्मिक संगठनों और पूजा समितियों के बीच टकराव की स्थिति बन सकती है. खासकर तब, जब किसी समिति से मूर्ति बदलने, पंडाल का कोई हिस्सा हटाने या निर्माण शुरू होने के बाद थीम में बदलाव करने को कहा जाए.
VHP के सुझाव पूजा स्थलों के आसपास परोसे या बेचे जाने वाले खाने तक भी हैं. संगठन ने साफ किया कि वह यह नहीं कह रहा कि बंगाल की दुर्गा पूजा पूरी तरह शाकाहारी होनी चाहिए. इसके बजाय उसने सुझाव दिया कि पंडालों के बाहर मांसाहारी खाना बेचने के लिए अलग जगह तय की जा सकती है.
निगूर्हानन्द ने बताया कि उनका जोर इस बात पर है कि देवी की मूर्ति के आसपास की जगह साफ रहे और वहां मांसाहारी खाने का बचा हुआ हिस्सा न हो. उन्होंने कहा, "हम बंगाल की संस्कृति या खान-पान की आदतों से अनजान नहीं हैं. बंगाल में दुर्गा पूजा का मतलब कभी भी पूरी तरह शाकाहारी जीवनशैली नहीं रहा है. हमारी चिंता अलग है. देवी की मूर्ति के आसपास की जगह की पवित्रता और सफाई का सम्मान होना चाहिए. मांसाहारी खाना तय जगहों पर बेचा जा सकता है लेकिन उसका बचा हुआ हिस्सा पंडाल में नहीं आना चाहिए और न ही देवी की मूर्ति के आसपास की जगह को गंदा करना चाहिए."
VHP ने दशमी के बाद भी मूर्तियों को लोगों के दर्शन के लिए रखने की परंपरा का भी विरोध किया है. कई पूजा समितियां दशमी के दिन ही विसर्जन करती हैं, लेकिन कोलकाता की कई पुरानी और मशहूर पूजा में देवी की मूर्ति एक दिन और रखी जाती है, ताकि ज्यादा श्रद्धालु और लोग दर्शन कर सकें.

VHP चाहती है कि विसर्जन दशमी के दिन ही हो. उसका कहना है कि इस दिन के धार्मिक महत्व को कम नहीं किया जाना चाहिए. ममता बनर्जी की पिछली सरकार के दौरान कोलकाता में एक पूजा कार्निवल आयोजित किया जाता था. इसमें विसर्जन से पहले देवी की मूर्तियों को कोलकाता की रेड लाइट इलाके में लोगों के दर्शन के लिए ले जाया जाता था. जिलों में भी ऐसे कार्यक्रम होते थे.
VHP ने 'धर्मो जार जार, उत्सव सोबार' यानी 'धर्म निजी है, त्योहार सबका है' की सोच पर भी सवाल उठाया. यह सोच ममता सरकार के साथ काफी जुड़ी रही है. VHP का दावा है कि यह नारा बांग्लादेश से लिया गया था. संगठन ने इसके बजाय 'धर्मो जार, उत्सव तार' की बात कही, जिसका मोटे तौर पर मतलब है, 'धर्म व्यक्ति का है और त्योहार भी उसी का है.'
निगूर्हानन्द ने कहा, "हम दूसरे समुदायों के त्योहारों का सम्मान करते हैं और अपने त्योहारों के लिए भी यही उम्मीद रखते हैं. हम इस्लाम के धार्मिक त्योहारों में हिस्सा नहीं लेते, जैसे वे हमारे त्योहारों में हिस्सा नहीं लेते. सिर्फ त्योहारों को सबका बनाने के नाम पर धार्मिक संस्कृतियों को मिलाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए."
जब उनसे पूछा गया कि क्या इसका मतलब यह है कि मुसलमानों को दुर्गा पूजा के पंडालों में आने की अनुमति नहीं होनी चाहिए तो उन्होंने साफ किया कि VHP ऐसी किसी पाबंदी की बात नहीं कर रही है. उन्होंने कहा, "वे पंडाल में आ सकते हैं, मूर्ति देख सकते हैं और वहां के माहौल को महसूस कर सकते हैं. हमारी आपत्ति किसी व्यक्ति के दुर्गा की मूर्ति देखने आने से नहीं है. हमारी आपत्ति जानबूझकर अलग-अलग धार्मिक परंपराओं को मिलाने या अलग-अलग धर्मों की परंपराओं को एक-दूसरे की जगह इस्तेमाल करने की सोच से है."
इन बयानों के बाद पूजा समितियों के कुछ लोगों में चिंता है. चर्चा में शामिल कई आयोजकों ने निजी तौर पर इन सुझावों को लेकर अपनी आपत्ति जताई और कहा कि इस समय इन्हें लागू करना काफी मुश्किल होगा.
एक आयोजक ने कहा, "इन लोगों को पता ही नहीं है कि दुर्गा पूजा वास्तव में कैसे आयोजित होती है." उन्होंने बताया, "पूजा की तैयारी कई महीने पहले शुरू हो जाती है. ठेके किए जाते हैं, कारीगरों को काम दिया जाता है, सामान खरीदा जाता है और भुगतान किया जाता है. बैठक में ये बदलाव आसान लग सकते हैं लेकिन काम शुरू होने के बाद इनमें बड़े स्तर का बदलाव करना संभव ही नहीं है."
एक अन्य आयोजक ने आखिरी समय में बदलाव करने के आर्थिक असर की ओर ध्यान दिलाया. उन्होंने कहा, "अगर अचानक हमें मूर्ति बदलने, पंडाल में बदलाव करने या किसी सजावट को बदलने के लिए कहा जाता है तो इसका अतिरिक्त खर्च कौन उठाएगा? छोटे और मध्यम स्तर की पूजा समितियों के पास असीमित बजट नहीं होता. इस समय किया गया छोटा सा बदलाव भी काफी अतिरिक्त खर्च का कारण बन सकता है."
VHP ने पूजा की थीम को लेकर भी ज्यादा पारंपरिक तरीका अपनाने की बात कही है. संगठन का कहना है कि थीम जरूर रखी जा सकती है लेकिन उसका संबंध सनातन परंपराओं से होना चाहिए. उसने उन 'विकृत' थीम के खिलाफ भी चेतावनी दी जिनमें जूते, फटे कपड़े या ऐसी दूसरी चीजें इस्तेमाल की जाती हैं जिन्हें संगठन सनातन संस्कृति के मुताबिक सही नहीं मानता.
संगठन ने कुम्हारटोली में मूर्ति बनाने के दौरान फोटो शूट किए जाने पर भी आपत्ति जताई. उसका कहना है कि मूर्ति बनाने की प्रक्रिया को अश्लील या गलत तरीके से पेश नहीं किया जाना चाहिए और मूर्तियों को खुले में नहीं छोड़ा जाना चाहिए. संगठन के लोगों ने संकेत दिया कि ऐसी गतिविधियों पर भी वे 'दखल' दे सकते हैं.
कई दशकों से कोलकाता की सामुदायिक दुर्गा पूजा एक ऐसे आयोजन में बदल गई है जिसमें धार्मिक रस्मों के साथ कला, वास्तुकला, खाना, मनोरंजन, लोगों का मिलना-जुलना और अब बड़े स्तर की थीम वाली सजावट भी शामिल है. इसलिए कई आयोजक VHP के कुछ सुझावों को सिर्फ धार्मिक सलाह नहीं बल्कि सार्वजनिक त्योहार के आयोजन के तरीके को प्रभावित करने की कोशिश के तौर पर देख सकते हैं.
अब सवाल यह है कि अगर कोई पूजा समिति इन सुझावों को मानने से इनकार करती है तो क्या होगा. फोरम फॉर दुर्गोत्सव कोलकाता और हावड़ा की करीब 600 पूजा समितियों का प्रमुख संगठन है. यह संगठन 7 सितंबर को दुर्गा पूजा से पहले होने वाली सालाना तैयारी बैठक के लिए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मिलने वाला है. माना जा रहा है कि फोरम के सदस्य इन चिंताओं को भी सामने रखेंगे.
फोरम के सचिव अंजन उकिल ने कहा, "हम VHP की ओर से सामने रखी गई भावनाओं और चिंताओं को अपनी सदस्य समितियों तक जरूर पहुंचाएंगे."
फिलहाल VHP का 'दखल' क्या होगा, यह साफ नहीं है लेकिन तैयारियां शुरू हो चुकी हैं और इस बयान ने इस साल की दुर्गा पूजा की तैयारियों के बीच एक नया सवाल खड़ा कर दिया है : क्या संगठन के दिशा-निर्देश सिर्फ आयोजकों से अपील तक सीमित रहेंगे या फिर दुर्गा पूजा किस तरह होनी चाहिए, इसे लेकर किसी खास सोच को लागू करने की कोशिश भी की जाएगी.

