घर में रखी देवी-देवताओं की पुरानी तस्वीरों के फ्रेम, सालों से पूजी जा रही टूटी मूर्तियों या दूसरी धार्मिक सामग्री का क्या करें, इसे लेकर दुविधा में हैं? हैदराबाद में नगर निकाय के अधिकारियों ने इसका समाधान निकाला है- प्रोजेक्ट उद्वासना.
तेलंगाना की राजधानी में हजारों परिवार आमतौर पर देवी-देवताओं की पुरानी तस्वीरें, खराब हो चुके पूजा के फ्रेम, टूटी मूर्तियां, कैलेंडर और दूसरी धार्मिक सामग्री वर्षों तक संभालकर रखते हैं, क्योंकि इनके सम्मानजनक निपटान की कोई व्यवस्था नहीं है.
अक्सर ऐसी सामग्री आखिरकार पेड़ों के नीचे, मंदिरों या जलाशयों में छोड़ दी जाती है या नगर निगम के कचरे में मिल जाती है.
इस लंबे समय से चली आ रही समस्या को देखते हुए ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (GHMC) ने इस साल प्रोजेक्ट उद्वासना शुरू किया. इसका उद्देश्य लोगों को धार्मिक और पर्यावरण की दृष्टि से जिम्मेदार विकल्प देना है.
इस पहल में पारंपरिक उद्वासना पूजा (देवी-देवता को विदाई देने की पूजा), अलग-अलग सामग्री को छांटकर निकालना और जिम्मेदारी के साथ रीसाइक्लिंग करना शामिल है. इसमें समुदाय की भी बड़ी भागीदारी है. इसका मकसद आस्था को सम्मान के साथ संभालते हुए हैदराबाद को साफ और ज्यादा टिकाऊ बनाना है.
GHMC के कमिश्नर आर.वी. कर्णन ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा, "प्रोजेक्ट उद्वासना GHMC की एक अनूठी सस्टेनेबिलिटी पहल है, जिसका उद्देश्य पूजा की जाने वाली धार्मिक वस्तुओं के सम्मानजनक संग्रह, रखरखाव और रीसाइक्लिंग के लिए एक औपचारिक व्यवस्था बनाकर आस्था और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच तालमेल कायम करना है."
6 जून को एक मंदिर में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू हुई यह योजना अब शहर के कई मंदिरों तक पहुंच गई है. कर्णन के मुताबिक, लोगों, मंदिर समितियों और स्वयंसेवकों की ओर से इसे अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है.
अब तक 4,372 किलो पूजित धार्मिक सामग्री एकत्र की जा चुकी है. इसमें 4,000 से ज्यादा पूजा के फ्रेम और देवी-देवताओं की तस्वीरें, 600 से अधिक मूर्तियां और सैकड़ों कैलेंडर, किताबें और दूसरी धार्मिक सामग्री शामिल हैं. यह सामग्री वरना झाड़ियों, सार्वजनिक जगहों, झीलों या नगर निगम के कचरे में पहुंच सकती थी.
अच्छी हालत वाले कुछ फ्रेम जरूरतमंद लोगों को दोबारा इस्तेमाल के लिए स्वेच्छा से दिए जाते हैं. इससे इन धार्मिक वस्तुओं को एक नया उपयोग मिल जाता है.
मंदिर में पुजारी द्वारा उद्वासना पूजा किए जाने के बाद एकत्र की गई हर वस्तु की सावधानी से जांच की जाती है और स्वयंसेवकों की टीमें उसे हाथ से अलग करती हैं.
कांच, कागज, लकड़ी, धातु, प्लास्टिक, कपड़े और प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) जैसी सामग्री को अलग-अलग किया जाता है ताकि ज्यादा से ज्यादा सामग्री का दोबारा इस्तेमाल हो सके. इसके बाद इन अलग की गई सामग्रियों को पर्यावरण की दृष्टि से जिम्मेदार रीसाइक्लिंग के लिए अधिकृत रीसाइक्लरों और प्रोसेसिंग एजेंसियों को सौंप दिया जाता है.
पड़ोसी साइबराबाद म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (CMC), जिसके दायरे में आईटी हब और बड़ी आवासीय सोसायटियां आती हैं, ने भी प्रोजेक्ट उद्वासना को अपना लिया है. उसने इसे ‘डिवाइन वेस्ट- डिवोशनल कलेक्शन ड्राइव’ नाम दिया है. 18 जुलाई को हुए पहले चरण में CMC ने अपने क्षेत्र के पांच मंदिरों से 783 किलो धार्मिक सामग्री एकत्र की.
CMC के अतिरिक्त कमिश्नर (स्वास्थ्य और स्वच्छता) वेणुगोपाल रेड्डी कहते हैं, "पहले चरण की सफलता के बाद हमने इसे बड़े स्तर पर आयोजित करने की योजना बनाई है. अगला अभियान 22 अगस्त को होगा और इस बार साइबराबाद के सभी 16 सर्किल को इसमें शामिल किया जाएगा."
CMC इस परियोजना के तहत स्वयंसेवकों, मंदिरों और लोगों से मिलने वाले अनुरोधों का ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कर रहा है.
GHMC के अधिकारियों का कहना है कि प्रोजेक्ट उद्वासना की सफलता से दूसरे शहरों में भी ऐसी पहल शुरू करने की प्रेरणा मिली है. उनके मुताबिक, इससे "हैदराबाद मॉडल को देशभर में धार्मिक सामग्री के टिकाऊ प्रबंधन के लिए एक ऐसे मॉडल के रूप में मजबूत किया जा रहा है, जिसे बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है और दूसरे शहर भी अपना सकते हैं."

