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भीड़ संभालने से संदिग्धों की पहचान तक, नासिक कुंभ में AI से बदलेगी पुलिसिंग?

पंढरपुर की आषाढ़ी वारी में सोलापुर ग्रामीण पुलिस ने पहली बार AI बेस्ड काउंटिंग, फेशियल रिकग्निशन और सर्विलांस सिस्टम का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया. अब दूसरे बड़े धार्मिक आयोजनों में भी इस्तेमाल करने की हो रही तैयारी

पंढरपुर का मेला (फाइल फोटो)
अपडेटेड 6 अक्टूबर , 2026

महाराष्ट्र में धार्मिक आयोजनों को संभालने के लिए पहली बार सोलापुर ग्रामीण पुलिस ने पंढरपुर में आषाढ़ी वारी के दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) बेस्ड काउंटिंग, फेशियल रिकग्निशन और सर्विलांस सिस्टम का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया. अब इसी सिस्टम को अगले साल नासिक और त्र्यंबकेश्वर में होने वाले कुंभ मेले में भी इस्तेमाल किए जाने की संभावना है.

CCTV आधारित इस सिस्टम से भीड़ को बेहतर तरीके से संभालने, सुरक्षा बढ़ाने और इमरजेंसी के समय तुरंत कार्रवाई करने में मदद मिलेगी. आषाढ़ी वारी के दौरान इस सिस्टम की मदद से सोलापुर ग्रामीण पुलिस ने 187 संदिग्ध लोगों को पकड़ा जिनमें से 16 को गिरफ्तार किया गया. साथ ही 600 से ज्यादा लापता लोगों का पता लगाने में भी मदद मिली.

वारी का मतलब पंढरपुर की पैदल तीर्थयात्रा है. मुंबई से 350 किलोमीटर से ज्यादा दूर पंढरपुर में भगवान विठोबा के दर्शन के लिए हर साल लाखों श्रद्धालु पैदल पहुंचते हैं. यह वारी आषाढ़ (जून-जुलाई) और कार्तिक (नवंबर) के महीनों में होती है. इस दौरान वारकरी भक्त भक्ति परंपरा के संतों जैसे निवृत्तिनाथ, ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम की पालकियों के साथ पंढरपुर जाते हैं.

पंढरपुर शहर में लगभग 450 सीसीटीवी कैमरे चालू थे, इनमें वे कैमरे भी शामिल थे जो सड़कों, व्यस्त चौराहों और मंदिर ट्रस्ट द्वारा उसके परिसर के अंदर लगाए गए थे. इन प्रणालियों और AI की मदद से प्रशासन ने 24 से 26 जुलाई तक चली आषाढ़ी वारी के दौरान 31 लाख से अधिक श्रद्धालुओं की उपस्थिति की वैज्ञानिक तरीके से गिनती की. इससे पहले 2025 में, पुलिस और जिला प्रशासन ने लोगों की गिनती और सर्वे के लिए AI आधारित ड्रोन तैनात किए थे, जिससे करीब 27 लाख श्रद्धालुओं की मौजूदगी दर्ज की गई थी.

नासिक कुंभ अगले साल आयोजित होना है (फाइल फोटो)
नासिक कुंभ अगले साल आयोजित होना है (फाइल फोटो)

पंढरपुर के सब-डिविजनल पुलिस ऑफिसर (SDPO) प्रशांत डागले ने बताया कि AI और फेशियल रिकग्निशन सिस्टम की मदद से पुराने आपराधिक मामलों वाले लोगों और आदतन अपराध करने वालों की पहचान करने में मदद मिली. इसके लिए इन लोगों के चेहरों का मिलान क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम्स (CCTNS) के रिकॉर्ड से किया गया. CCTNS में अपराधियों से जुड़ा डेटा और बायोमेट्रिक जानकारी मौजूद है.

IPS अधिकारी डागले ने कहा, “फेशियल रिकग्निशन के लिए AI का इस्तेमाल किया गया. ऐसे लोगों की गतिविधियों पर नजर रखी गई और उन्हें रोकने के लिए जरूरी कार्रवाई की गई.”

डागले ने बताया कि जुलाई में आषाढ़ी वारी के दो दिनों के दौरान 187 संदिग्ध लोगों की पहचान कर उन्हें हिरासत में लिया गया था, इनमें से 16 लोगों को गिरफ्तार किया गया, वारी के दौरान मोबाइल फोन गुम होने के 160 मामले और चोरी व जेब काटने के 6 मामले दर्ज किए गए, गिरफ्तार आरोपियों को इन मामलों से जोड़ने और चोरी का सामान बरामद करने की कोशिश की जा रही है, इस दौरान 631 श्रद्धालु लापता हुए थे, जिनमें से 624 को उनके परिवार वालों से मिला दिया गया.

नासिक की एक टीम अब यह देख रही है कि अगस्त 2027 में होने वाले नासिक और त्र्यंबकेश्वर कुंभ मेले में इस सिस्टम का इस्तेमाल किया जा सकता है या नहीं, कुंभ मेला दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक है.

डागले ने बताया कि आषाढ़ी वारी के दौरान पहली बार 5G तकनीक वाले वॉकी-टॉकी का इस्तेमाल किया गया. इससे पुराने हैंडहेल्ड रेडियो की कमियों को दूर करने में मदद मिली. सोलापुर जिला कलेक्टर कार्यालय और सोलापुर ग्रामीण पुलिस ने पुलिसकर्मियों और सरकारी अधिकारियों के इस्तेमाल के लिए करीब 500 ऐसे सेट खरीदे थे. इस नेटवर्क के लिए अलग बैंडविड्थ दी गई थी.

भगवान विठोबा को विठ्ठल और पांडुरंग भी कहा जाता है और उनकी पत्नी रुक्मिणी के मंदिर में दर्शन के लिए आने वाले वारकरी और श्रद्धालु चंद्रभागा नदी में स्नान करते हैं. माना जाता है कि इससे पुण्य मिलता है. आषाढ़ी और कार्तिकी वारी के अलावा पंढरपुर में हर महीने दो बार एकादशी के दिन भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं.

विठोबा को भगवान कृष्ण का एक रूप माना जाता है. ऐसा माना जाता है कि वे पहले एक लोक देवता थे, जिन्हें बाद में हिंदू या ब्राह्मण परंपरा में शामिल किया गया. लेखक और शोधकर्ता आर.सी. ढेरे के मुताबिक अलग-अलग संप्रदायों और मान्यताओं ने भी विठोबा को अपने से जोड़ा है. इनमें धनगर चरवाहा समुदाय, बौद्ध और जैन भी शामिल हैं. अपनी चर्चित किताब ‘श्री विठ्ठल: एक महासमन्वय’ में ढेरे ने विवादित दावा किया था कि विठ्ठल की असली मूर्ति पंढरपुर में नहीं, बल्कि पंढरपुर के पास माढा में है.

वारी की परंपरा की शुरुआत कब हुई, इसे लेकर साफ जानकारी नहीं है. कुछ लोगों का मानना है कि 13वीं सदी के भक्ति संत ज्ञानेश्वर ने इस परंपरा की शुरुआत की थी. हालांकि इतिहासकार ऐसे संदर्भों की ओर इशारा करते हैं जो इससे भी पुराने हैं. मंदिर का ज्यादातर मौजूदा ढांचा मराठा काल का है. शिलालेखों से मिले सबूत बताते हैं कि होयसल और सेउना यादव राजा महादेव ने भी मंदिर को संरक्षण दिया था.

वारकरी संप्रदाय में अलग-अलग जातियों के संत रहे हैं. इनमें नामदेव, ज्ञानेश्वर, गोरोबा कुंभार, सावता माली, चोखामेला, एकनाथ और तुकाराम जैसे संत शामिल हैं. लेखक पी.जी. सहस्रबुद्धे ने लिखा है कि वारकरी या भक्ति संप्रदाय की शुरुआत नाथ संप्रदाय से हुई थी.

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