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कर्नाटक : क्या सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच फिर उभर रही है दरार?

कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने और ज्यादा उपमुख्यमंत्री बनाने की मांगों के बीच ऐसा लग रहा है कि सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच गुटबाजी बढ़ गई है

सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार
सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार
अपडेटेड 5 जुलाई , 2024

कर्नाटक में 2023 में जब विधानसभा चुनाव के नतीजे आए, जिसमें कांग्रेस को भारी बहुमत मिला था तो सीएम पद के लिए मीडिया समेत तमाम जगह डीके शिवकुमार के नाम की चर्चा थी. लेकिन जब कांग्रेस आलाकमान ने सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री चुना तब कयास लगने लगे कि जल्दी ही राज्य के दो सबसे बड़े नेताओं में फूट पड़ सकती है. लेकिन ऐसा होते नहीं दिखा या कम से कम प्रदेश की कांग्रेस पार्टी ने जाहिर नहीं होने दिया.

हालांकि पार्टी ने डीके शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री बनाया दिया था. 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान भी सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार ने मिलकर बीजेपी के नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोले रखा और 2019 में राज्य में एक सीट जीतने वाली पार्टी 28 में से 9 सीटें जीतकर आई. अब खबर आ रही है कि कर्नाटक कांग्रेस के दोनों बड़े नेताओं के पार्टी में अपने-अपने गुट बन चुके हैं.

इनमें से एक मुख्यमंत्री को बदलने की मांग कर रहा है और दूसरा अधिक उपमुख्यमंत्रियों की मांग कर रहा है. यानी लोकसभा चुनाव का मिलाजुला नतीजा सामने आने के बाद, राज्य कांग्रेस की दरारें फिर से उभरती दिख रही हैं.

लोकसभा चुनावों में कर्नाटक की नौ सीटों के साथ पार्टी का वोट शेयर 31.88 प्रतिशत से बढ़कर 45.34 प्रतिशत हो गया. इस हवाले से इंडिया टुडे के पत्रकार अजय सुकुमारन अपनी रिपोर्ट में लिखते हैं, "वोट प्रतिशत और 2019 के मुकाबले सीटों में बढ़ोतरी के बावजूद अपेक्षित 14 सीटों से कम आना कांग्रेस को अखरा. विधानसभा के क्षेत्रवार प्रदर्शन के संदर्भ में परिणामों की जांच से पता चलता है कि कई मंत्री अपनी घरेलू सीटों पर भी कांग्रेस उम्मीदवारों के लिए बढ़त हासिल करने में कामयाब नहीं हो सके. शिवकुमार की बेचैनी तब बढ़ गई जब उनके भाई और कांग्रेस उम्मीदवार डीके सुरेश को बेंगलूरु ग्रामीण लोकसभा सीट पर हार मिली."

इसके साथ ही कई विधायकों ने पांच मेगा कल्याण वादों या 'पांच गारंटी' की समीक्षा की भी मांग की, जिनपर कांग्रेस ने अपना विधानसभा चुनाव अभियान आधारित किया था. इसी को लेकर एक से ज्यादा उपमुख्यमंत्रियों की मांग फिर से उठ खड़ी हुई है. इस सुझाव के पक्ष में सहकारिता मंत्री केएन राजन्ना ने लिंगायत, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले कम से कम तीन उपमुख्यमंत्रियों की मांग की, ताकि पार्टी के प्रति उनका समर्थन मजबूत हो सके. राजन्ना को सिद्धारमैया का करीबी माना जाता है, इसलिए उनकी मांग को शिवकुमार को मात देने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

एक से ज्यादा उपमुख्यमंत्रियों का यह मामला 27 जून को चरम पर पहुंच गया जब विश्व वोक्कालिगा महासमन्थन के एक संत चंद्रशेखरनाथ स्वामीजी ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में शिवकुमार के पक्ष में अपील की जिसमें सिद्धारमैया भी मौजूद थे. बेंगलूरु शहर के संस्थापक और वोक्कालिगा समुदाय (जिससे शिवकुमार ताल्लुक रखते हैं) के प्रतीक केम्पेगौड़ा की 515वीं जयंती पर बोलते हुए, संत ने कहा, "शिवकुमार को छोड़कर हर कोई मुख्यमंत्री बन चुका है और सत्ता का स्वाद चख चुका है. इसलिए, सिद्धारमैया, जो पहले से ही मुख्यमंत्री हैं, को भविष्य में शिवकुमार को सत्ता सौंपनी चाहिए और उन्हें आशीर्वाद देना चाहिए. यह तभी हो सकता है जब सिद्धारमैया अपना मन बना लें."

चंद्रशेखरनाथ स्वामीजी की टिप्पणियों ने एक पेचीदा मुद्दा उठाया, जिससे राज्य कांग्रेस में गुटबाजी जगजाहिर हो गई. फिर, एक दिन बाद, वीरशैव-लिंगायत समुदाय के एक दूसरे संत, श्रीशैल जगद्गुरु चन्ना सिद्धराम पंडितराध्या स्वामी ने भी पार्टी से आग्रह किया कि सत्ता परिवर्तन की स्थिति में मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री पद के लिए उनके समुदाय के नेताओं पर विचार किया जाए.

अजय सुकुमारन की रिपोर्ट के मुताबिक, सिद्धारमैया के करीबी विधायकों ने तर्क दिया कि मुख्यमंत्री का पद खाली नहीं है वहीं AHINDA समूह ('अल्पसंख्यतरु-हिंदुलिदावरु-दलितरु', जिसका अर्थ है 'अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग और दलित') के जुड़े एक नेता ने सिद्धारमैया को हटाने के किसी भी कदम के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है.

यह समूह एक राजनीतिक मंच रहा है, जिसे कुरुबा ओबीसी समुदाय से आने वाले सिद्धारमैया ने करीब दो दशकों तक बढ़ावा दिया है. AHINDA के राज्य अध्यक्ष प्रभुलिंगा डोड्डामनी ने 30 जून को कहा, "अगर सिद्धारमैया को बदला जाता है, तो कांग्रेस अपना अस्तित्व खो देगी." इधर कांग्रेस पदाधिकारी मानते हैं कि इन बातों ने सत्तारूढ़ पार्टी को शर्मनाक स्थिति में डाल दिया है और विपक्षी भाजपा के लिए उसे निशाना बनाना आसान हो गया है.

इन सभी घटनाक्रमों के फैलने के बाद डीके शिवकुमार को 29 जून को चेतावनी देनी पड़ी कि मुख्यमंत्री के बदलाव या उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति के बारे में सार्वजनिक रूप से विचार व्यक्त करने वाले नेताओं के खिलाफ नोटिस जारी किए जाएंगे और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने कहा, "अनुशासन पार्टी के लिए सर्वोपरि है. हमने कर्नाटक में कांग्रेस को सत्ता में लाने के लिए कड़ी मेहनत की है. इस मुद्दे पर किसी को भी कुछ नहीं बोलना चाहिए. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सिद्धारमैया और मैंने दिल्ली में एक बैठक की और फैसला किया कि सभी को पार्टी के लिए काम करना होगा. मंत्रियों, विधायकों और स्वामीजी को पार्टी के मामलों के बारे में नहीं बोलना चाहिए."

हालांकि एक से ज्यादा उपमुख्यमंत्री का सुझाव नया नहीं है. उपमुख्यमंत्रियों की संख्या बढ़ाने का सुझाव सरकार के कार्यकाल के छह महीने बाद ही आ गया था, जिसमें मंत्री सतीश जरकीहोली, बी.जेड. ज़मीर अहमद खान और राजन्ना ने इस विचार का समर्थन किया. इसी समय, डीके शिवकुमार के साथ जुड़े विधायकों ने मध्यावधि बदलाव के बारे में अटकलें लगानी शुरू कर दीं. जनवरी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे अटकलबाजी बताते हुए कहा कि उनके पास ऐसी कोई सिफारिश नहीं आई थी. इसके बाद कहीं जाकर एक से ज्यादा उपमुख्यमंत्रियों की मांग अस्थायी रूप से शांत हो सकी थी.

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