
नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) की कमान अब उस व्यक्ति के हाथ में है जिसने कभी भारतीय जनता पार्टी के लिए काम किया था. इसी NCPI ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों को अपने साथ मिलाया है.
NCPI के संस्थापक और अब महासचिव बने नेता भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठनों के साथ काम कर चुके हैं. खुद बागी सांसदों का आरोप है कि BJP नेताओं ने उन्हें इस अनजानी पार्टी में जाने में मदद की. NCPI से जुड़ी ये जानकारियों से अब यह सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या जून में हुआ यह दल-बदल पहले से ही तय था.
जून में जब लोकसभा के 20 सांसदों ने पार्टी छोड़कर NCPI में विलय का ऐलान किया तो उनकी नई राजनीतिक पनाहगाह का चुनाव लगभग समझ से परे लगा. NCPI ने कभी कोई चुनाव नहीं जीता. उसने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भी केवल कुछ सीटों पर चुनाव लड़ा था. उसका चुनावी प्रभाव इतना सीमित था कि 2022-23 में उसे मिले चंदे की राशि करीब 1.13 लाख रुपए ही थी. इसके बावजूद रातोरात वह 20 मौजूदा सांसदों का संसदीय घर बन गई.
तीन महीने बाद हुए नए घटनाक्रम से इस कहानी में नया मोड़ आ गया है. NCPI ने अब 27 सदस्यीय राष्ट्रीय समिति की घोषणा की है. इसकी कमान ज्योतिप्रकाश चटर्जी को दी गई है.

चटर्जी BJP के पूर्व पदाधिकारी रहे हैं और पार्टी में युवा नेता तथा मीडिया पैनलिस्ट के तौर पर काम कर चुके हैं. 2024 के चुनाव में वे बशीरहाट सीट से TMC के खिलाफ BJP उम्मीदवार रेखा पात्रा के चुनाव प्रचार से जुड़े थे.
TMC के सात पूर्व सांसदों को अब औपचारिक रूप से NCPI के राष्ट्रीय संगठन में जगह दी गई है. अबू ताहेर खान, दीपक अधिकारी देव, यूसुफ पठान, जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया और रचना बनर्जी को उपाध्यक्ष बनाया गया है. वहीं मिताली बाग और बापी हलदर को महासचिव बनाया गया है.
चटर्जी ही इस नए समीकरण में BJP/RSS से जुड़े अतीत वाले अकेले व्यक्ति नहीं हैं. NCPI की नींव रखने वाले प्रमुख लोगों में से एक उत्तिया कुंडू अब महासचिव हैं.
पार्टी के एक अन्य संस्थापक सदस्य शांतनु डे के मुताबिक, 2022 में हावड़ा के संकराइल में कुंडू के घर पर पार्टी बनाने को लेकर चर्चा हुई थी. उस समय कुंडू को उपाध्यक्ष और उनकी पत्नी शेवली को अध्यक्ष बनाया गया था. कुंडू की पृष्ठभूमि पर गौर करना जरूरी है. वे भारतीय मजदूर संघ (BMS) से जुड़े रहे हैं. यह RSS से संबद्ध ट्रेड यूनियन संगठन है. यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि NCPI के BJP से संबंध सिर्फ TMC सांसदों को अचानक पार्टी में शामिल करने के बाद नहीं बने.
असामान्य राजनीतिक इतिहास वाली पार्टी
2022 में बनी NCPI को जनवरी 2023 में चुनाव आयोग के पास 'पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल' के तौर पर पंजीकृत किया गया था. मुख्यालय बंगाल में होने के बावजूद उसका पहला चुनावी प्रयोग त्रिपुरा में हुआ.
पार्टी ने 2023 का विधानसभा चुनाव लड़ा लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी. उस समय उसके प्रचार में एक दिलचस्प लाइन थी जो बाद में दल-बदल करने वाले नेताओं की इस पार्टी का घर बनने के संदर्भ में अजीब लगती है: “दलबदलुओं को खारिज करें.”
हालांकि पार्टी का वैचारिक और संगठनात्मक इतिहास इससे कहीं ज्यादा जटिल रहा है. डे ने RSS से अपने पुराने जुड़ाव की बात स्वीकार की है. संगठन के भीतर से सामने आए दूसरे ब्योरे में दावा किया गया है कि उसके कुछ सदस्यों ने 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव में BJP के लिए प्रचार किया था.

शेवली ने कहा है कि पार्टी ने 2023 के पंचायत चुनाव के बाद BJP का समर्थन करने का फैसला किया था और उसके कई सदस्य BJP-RSS की पृष्ठभूमि वाले हैं. इस बीच उत्तिया ने शुभेंदु अधिकारी के साथ अपनी तस्वीरें पोस्ट की हैं. इनमें एक तस्वीर अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद की भी है.
इनमें से कोई भी तथ्य अपने आप में यह साबित नहीं करता कि NCPI को BJP के राजनीतिक मंच के तौर पर बनाया गया था. लेकिन इन सभी को एक साथ देखने पर TMC में विभाजन के बीच NCPI की अचानक बनी भूमिका को महज संयोग मानना मुश्किल हो जाता है.
फिर आए 20 सांसद
जून में TMC के 20 लोकसभा सांसदों ने NCPI में विलय का ऐलान किया और इसके साथ ही पार्टी अचानक राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गई. इसका समय और पूरी प्रक्रिया असामान्य थी.
बागी सांसदों ने दिल्ली में कई वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं से मुलाकात की थी. इनमें केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर हुई बैठक भी शामिल थी. इसके बाद उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की. बाद में उन्होंने BJP के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को अपना समर्थन देने का ऐलान किया.
NCPI को चुनने का एक खास राजनीतिक मकसद नजर आता है. इससे बागी सांसद यह दावा कर सकते थे कि उन्होंने सीधे BJP में दल-बदल करने के बजाय किसी दूसरे राजनीतिक दल में विलय किया है. इस दावे की संवैधानिक और संसदीय वैधता पर विवाद है और इसका फैसला लोकसभा अध्यक्ष को करना है.
सितंबर में बागी सांसद बसुनिया के एक दावे के बाद BJP से जुड़ी कड़ी और स्पष्ट हो गई. बसुनिया ने कहा कि मूल योजना सभी 20 सांसदों के सीधे BJP में शामिल होने की थी. उनके मुताबिक, तीन अल्पसंख्यक सांसद इसके लिए तैयार नहीं थे.
इसके बाद BJP नेताओं ने उन्हें NCPI में जाने में मदद की. बसुनिया ने खास तौर पर केंद्रीय मंत्री यादव, मुख्यमंत्री अधिकारी और अमित शाह के नाम लिए. उन्होंने कहा कि भूपेंद्र यादव के आवास पर बैठकें हुई थीं.
इस दावे को चुनौती दी गई है. इस समूह के मुस्लिम सांसदों में से एक खान ने कहा है कि उनका BJP में शामिल होने या NDA का समर्थन करने का कोई इरादा नहीं है. बंगाल BJP के नेताओं ने भी बसुनिया के दावे को खारिज किया है.
इसलिए इस आरोप को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता. हालांकि, NCPI में हालिया नियुक्तियों के बाद इस दावे को एक नया संदर्भ जरूर मिला है.
BJP का आदमी संभाल रहा है NCPI
चटर्जी की नियुक्ति खास तौर पर महत्वपूर्ण है,= क्योंकि उनका राजनीतिक अतीत BJP से जुड़ा रहा है. NCPI अध्यक्ष बनने से पहले वे बंगाल में BJP के राजनीतिक और मीडिया संगठन का हिस्सा थे.
2024 के बशीरहाट चुनाव प्रचार से उनका जुड़ाव उन्हें उस सीट पर BJP के चुनावी अभियान का हिस्सा बनाता है, जो बंगाल में पार्टी के प्रमुख राजनीतिक संघर्षों में से एक रही थी. अब वही व्यक्ति उस राजनीतिक संगठन की कमान संभाल रहा है जिसमें TMC के 20 सांसद शामिल हुए हैं.
BJP के साथ अपने पुराने जुड़ाव, पात्रा के चुनाव प्रचार में अपनी भूमिका और TMC के 20 सांसदों के NCPI में शामिल होने की परिस्थितियों से जुड़े सवालों पर जवाब के लिए चटर्जी से संपर्क किया गया. उनका जवाब संक्षिप्त था: “कोई टिप्पणी नहीं.”
यह जवाब इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि इससे कुछ साबित होता है. बल्कि इसलिए कि ये सवाल उन राजनीतिक संबंधों की पूरी कड़ी से जुड़े हैं, जिनके चलते NCPI गुमनामी से निकलकर बंगाल में विपक्षी दल के सबसे बड़े विभाजन के केंद्र में पहुंच गई है.
NCPI का मूल नेतृत्व किनारे हुआ
इस पूरे घटनाक्रम में एक और बात असामान्य है. नई समिति सिर्फ पूर्व TMC सांसदों को मौजूदा संगठन में शामिल नहीं करती. उसने उनमें से कई को पार्टी के शीर्ष पदों पर भी जगह दी है.
TMC के सात पूर्व सांसद अब राष्ट्रीय पदों पर हैं जबकि पार्टी के मूल संगठन से जुड़े लोगों की भूमिकाएं बदल दी गई हैं. कभी पार्टी के संस्थापक ढांचे के केंद्र में रहे उत्तिया अब महासचिव हैं. वहीं चटर्जी जो पार्टी की शुरुआती सार्वजनिक पहचान का हिस्सा नहीं थे अब अध्यक्ष हैं.
इस बीच डे ने आरोप लगाया है कि पूर्व TMC सांसद बिना उन लोगों से सलाह किए NCPI पर ‘कब्जा’ करने की कोशिश कर रहे थे, जिन्होंने पार्टी बनाई थी. उन्होंने इस मुद्दे पर लोकसभा अध्यक्ष को पत्र भी लिखा है.
पार्टी के भीतर की उलझन जून में ही साफ दिखाई देने लगी थी. संस्थापक सदस्यों ने मीडिया से कहा था कि उन्हें प्रस्तावित विलय की जानकारी खबरों और सोशल मीडिया के जरिए मिली. पार्टी के एक पूर्व पदाधिकारी ने कहा था कि उन्हें यह भी नहीं बताया गया था कि नया अध्यक्ष कौन है.
NCPI की कहानी अब एक अजीब समानता लिए हुए है. कुंडू परिवार और कुछ संस्थापक सदस्यों के इर्द-गिर्द शुरू हुई पार्टी ने TMC के 20 सांसदों को अपने साथ मिला लिया. बाद में इन सांसदों को पार्टी में औपचारिक पद भी दिए गए. और संगठन की कमान जिस व्यक्ति को सौंपी गई उसका अतीत BJP से जुड़ा रहा है.

