मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 2 नवंबर को एक अहम फैसला सुनाया. अदालत ने आदेश दिया कि 2011 से राज्य सरकार के बारे में राजभवन की राजनीतिक और प्रशासनिक रिपोर्टों को याचिकाकर्ता सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत देख सकता है.
न्यायमूर्ति एवाई कोगजे और विवेक जैन की खंडपीठ ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता अजय दुबे को राज्य की राजनीतिक और प्रशासनिक स्थिति पर केंद्र सरकार को भेजी गई राजभवन की रिपोर्ट देखने की अनुमति दी जाए.
इस अवधि में राज्य में BJP की सरकार थी जबकि केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्यपालों की नियुक्ति की थी. इसके अलावा, मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार के थोड़े समय के कार्यकाल के दौरान BJP के नेतृत्व वाले केंद्र ने राज्यपाल नियुक्त किया था. इस अवधि में रामेश्वर ठाकुर, राम नरेश यादव, आनंदीबेन पटेल और मौजूदा राज्यपाल मंगुभाई सी. पटेल शामिल हैं. यह अवधि व्यापम घोटाले की जांच से भी जुड़ी है.
यह मामला 2011 का है. तब आरटीआई कार्यकर्ता दुबे ने सूचना का अधिकार कानून के तहत आवेदन देकर राजभवन से केंद्र को भेजी गई रिपोर्ट देखने की मांग की थी. सूचना अधिकारी ने उनका आवेदन खारिज कर दिया था. हालांकि राजभवन के अपीलीय अधिकारी ने इसे मंजूरी दे दी थी.
इसके बाद राजभवन ने अपना रुख बदल लिया. उसने जानकारी देने से इनकार कर दिया और अपने ही अपीलीय अधिकारी के फैसले के खिलाफ अपील कर दी. हाई कोर्ट ने 2013 में अपीलीय अधिकारी के फैसले को बरकरार रखा. 2014 में राज्य सूचना आयोग का पुनर्गठन हुआ. इसके बाद राजभवन ने अपीलीय अधिकारी के फैसले के खिलाफ वहां अपील की.
सूचना आयोग ने अपीलीय अधिकारी के फैसले को बरकरार रखा लेकिन राजभवन ने दस्तावेज नहीं दिखाए. इस साल सितंबर में एक नया आवेदन दायर किया गया. इसके बाद मामला हाई कोर्ट की खंडपीठ तक पहुंच गया.
दुबे ने कहा, "यह पहली बार है जब हाई कोर्ट ने रिपोर्टों को सार्वजनिक करने का आदेश दिया है. इन दस्तावेजों से उस बेहद अहम दौर पर रोशनी पड़ने की संभावना है, जब राज्य कई घोटालों से जूझ रहा था. इस दौरान राज्य सरकार के प्रति राजभवन का नजरिया बेहद महत्वपूर्ण है."

