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मनप्रीत बादल का कद बढ़ा, अब पंजाब में कम होगी BJP की मुश्किल?

जाट सिख नेतृत्व की तलाश से लेकर अकाली दल से संभावित रिश्तों तक, पंजाब चुनाव से कुछ महीने पहले मनप्रीत बादल को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाना BJP की पंजाब रणनीति में अहम बदलाव का संकेत है

अपडेटेड 20 अगस्त , 2026

5 जनवरी 2022 को तत्कालीन कांग्रेस नेता मनप्रीत सिंह बादल बठिंडा एयरपोर्ट की हवाई पट्टी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगवानी के लिए मौजूद थे. पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के दो स्टाफ सदस्य कोविड पॉजिटिव पाए गए थे तो वे खुद आइसोलेशन में थे. ऐसे में उन्होंने अपनी जगह वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल को भेजा था. राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस प्रमुख भी वहां मौजूद नहीं थे.
 
कुछ घंटे बाद मनप्रीत प्रधानमंत्री को विदा करने के लिए फिर एयरपोर्ट पहुंचे. इस बार वजह कुछ और थी. प्रधानमंत्री मोदी का काफिला फिरोजपुर के पास एक फ्लाईओवर पर करीब 20 मिनट तक फंसा रहा था. इसे सुरक्षा में गंभीर चूक माना गया और उनकी तय रैली रद्द करनी पड़ी थी.

बठिंडा से रवाना होते समय मोदी ने मनप्रीत से कहा था कि वे अपने मुख्यमंत्री को धन्यवाद दें कि वे जिंदा लौट रहे हैं. मनप्रीत उनसे बार-बार माफी मांगते हुए दिखाई दिए.
 
इसके बाद मनप्रीत को लगातार दो चुनावी झटके लगे. 2022 में कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर वे बठिंडा शहरी विधानसभा सीट से आम आदमी पार्टी के जगतार सिंह गिल से 63,000 से ज्यादा वोटों से हार गए. अगले साल जनवरी में वे BJP में शामिल हो गए.

2024 के गिद्दड़बाहा विधानसभा उपचुनाव में BJP ने उन्हें उसी सीट से उम्मीदवार बनाया, जिस पर वे चार बार जीत चुके थे लेकिन मनप्रीत तीसरे स्थान पर रहे और उनकी जमानत तक जब्त हो गई.
 
अब तस्वीर पूरी तरह पलट गई है. मनप्रीत को BJP का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है. उनके साथ वसुंधरा राजे, राम माधव और डी. पुरंदेश्वरी जैसे वरिष्ठ नेताओं को भी यह जिम्मेदारी मिली है.
 
पंजाब में अगले साल की शुरुआत में चुनाव होने हैं. ऐसे में इस नियुक्ति का महत्व है लेकिन BJP के राष्ट्रीय नेतृत्व के फैसले और राज्य इकाई की जमीन पर उनकी क्षमता के बीच एक अंतर है. पिछले कुछ हफ्तों में यह अंतर और साफ हुआ है.

रवनीत सिंह बिट्टू 2024 में कांग्रेस छोड़कर BJP में शामिल हुए थे
रवनीत सिंह बिट्टू 2024 में कांग्रेस छोड़कर BJP में शामिल हुए थे

 
BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की टीम पंजाब इकाई के पदाधिकारियों की सूची जारी होने के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं में पैदा हुए असंतोष को शांत करने की कोशिश कर रही है. सूची में कुछ बदलाव भी किए गए हैं.

पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और चंडीगढ़ के प्रभारी रह चुके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक सौदान सिंह को फिर से राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव संगठन बनाया गया है. इससे पहले वे उपाध्यक्ष थे. राजस्थान BJP के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और हरियाणा के प्रभारी रहे सतीश पूनिया को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है और उन्हें पंजाब का प्रभारी भी बनाया गया है.
 
मनप्रीत की नियुक्ति BJP की उस पुरानी रणनीति का हिस्सा है, जिसमें पार्टी शिरोमणि अकाली दल के 2020 में एनडीए से अलग होने के बाद अपना जाट सिख नेतृत्व तैयार करना चाहती है. अकाली दल ने केंद्र के कृषि कानूनों के मुद्दे पर एनडीए छोड़ा था.
 
BJP ने अब तक इस दिशा में कई नाम आगे बढ़ाए हैं. केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब BJP का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह बिट्टू 2024 में कांग्रेस छोड़कर BJP में आए. उसी साल वे लुधियाना लोकसभा सीट से चुनाव हार गए, लेकिन इसके बावजूद उन्हें केंद्र में मंत्री बनाया गया और बाद में राजस्थान से राज्यसभा भेजा गया.
 
चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के चांसलर सतनाम सिंह संधू को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया. अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के संस्थापक सदस्यों में शामिल तेजा सिंह समुंदरी के पोते तरनजीत सिंह संधू 2024 में अमृतसर लोकसभा सीट से चुनाव हार गए. इस साल मार्च में उन्हें दिल्ली का उपराज्यपाल बनाया गया.
 
मनजिंदर सिंह सिरसा BJP सरकार की दिल्ली कैबिनेट में हैं. खराब स्वास्थ्य के बावजूद हरजीत सिंह ग्रेवाल को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष बनाया गया. तरुण चुघ, जिन्हें हाल ही में राज्यसभा भेजा गया है, पंजाब से राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारी पाने वाले एकमात्र हिंदू नेता हैं.
 
पंजाब की आबादी में जाट सिख करीब 18 प्रतिशत हैं. गांवों में उनका खासा प्रभाव है और राज्य की राजनीति में भी उनका दबदबा है. BJP जिन जाट सिख नेताओं को आगे बढ़ा रही है, उनमें एक बात समान है. ये सभी समुदाय के प्रभावशाली तबके से आते हैं. इनमें राजनयिक, शिक्षाविद, राजनीतिक परिवारों से जुड़े लोग और मंत्री शामिल हैं. लेकिन इनमें से लगभग किसी की भी गांवों में मजबूत राजनीतिक पकड़ नहीं है.
 
मनप्रीत इस तस्वीर का सबसे साफ उदाहरण हैं. उन्होंने मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और नितिन नवीन का आभार जताया है. उन्होंने कहा है कि BJP में राष्ट्रीय जिम्मेदारी उनके लिए “इनाम नहीं, बल्कि परीक्षा” है. उन्होंने यह भी कहा है कि पंजाब में BJP की सरकार बनेगी.
 
मनप्रीत प्रमुख राजनेता गुरदास सिंह बादल के बेटे, दिवंगत अकाली नेता प्रकाश सिंह बादल के भतीजे और अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल के चचेरे भाई हैं. उन्होंने 1995 में गिद्दड़बाहा विधानसभा सीट जीती और लगातार तीन बार और वहां से विधायक रहे.

पंजाब की खराब वित्तीय स्थिति को लेकर अकाली नेतृत्व से मतभेद के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी. 2011 में उन्होंने पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब बनाई. इसी पार्टी में भगवंत मान भी शुरुआती दौर में शामिल हुए थे. 2012 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी.
 
2014 में मनप्रीत ने बठिंडा लोकसभा सीट से सुखबीर सिंह बादल की पत्नी हरसिमरत कौर बादल के खिलाफ चुनाव लड़ा और हार गए. इसके बाद उन्होंने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया. 2017 में उन्होंने बठिंडा अर्बन विधानसभा सीट जीती और कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार में दूसरी बार वित्त मंत्री बने.
 
मनप्रीत को राज्य की वित्तीय स्थिति की अच्छी समझ रखने वाला नेता माना जाता है. वे उर्दू के असर वाली पंजाबी में धाराप्रवाह बोलते हैं. लेकिन किसी विधानसभा सीट पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए जिस तरह गांव-गांव जाकर लगातार काम करना पड़ता है, उसमें उनकी खास दिलचस्पी नहीं रही. उनके राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी समस्या लगातार भरोसे का संकट रही है.
 
हर पार्टी में मनप्रीत के साथ एक आरोप भी चलता रहा है. आरोप यह है कि उनका बादल परिवार से विवाद है, लेकिन बाद में वे उसी परिवार के करीब भी आते रहे हैं. कांग्रेस में रहते हुए अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने उन पर निशाना साधा था.

वड़िंग ने बाद में गिद्दड़बाहा सीट मनप्रीत से हासिल की और 2022 के चुनाव के बाद पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष बने. चुनाव प्रचार के दौरान वड़िंग ने बठिंडा के मतदाताओं से सभी बादलों को हराने की अपील की थी. इसमें उनकी अपनी पार्टी के उम्मीदवार मनप्रीत भी शामिल थे.
 
2024 के लोकसभा चुनाव में बठिंडा से कांग्रेस उम्मीदवार जीत मोहिंदर सिंह सिद्धू ने मनप्रीत से यह साफ करने को कहा था कि वे BJP के साथ हैं या अकाली दल के. उन्होंने हरसिमरत कौर के साथ किसी समझौते का आरोप भी लगाया था. मनप्रीत उस चुनाव प्रचार से काफी दूर रहे. उनके करीबी लोगों ने इसकी वजह खराब स्वास्थ्य बताई.
 
मनप्रीत के BJP में शामिल होने के दिन से ही बठिंडा की BJP इकाई का एक धड़ा उनके खिलाफ रहा है. जनवरी 2023 में पार्टी में आने के बाद जिला कोर कमेटी ने भी उनके खिलाफ आवाज उठाई. इस कमेटी का नेतृत्व सरूप चंद सिंगला कर रहे थे. 2021 में सिंगला, जो उस समय अकाली दल में थे, बठिंडा के मॉडल टाउन में दो प्लॉटों को लेकर विजिलेंस ब्यूरो के पास शिकायत ले गए थे.
 
सितंबर 2023 में विजिलेंस ब्यूरो ने मनप्रीत और पांच अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की. आरोप था कि बठिंडा डेवलपमेंट अथॉरिटी के रिकॉर्ड में बदलाव करके इन प्लॉटों को खुली बोली से बाहर रखा गया और मनप्रीत ने इन्हें सफल बोली लगाने वालों से हासिल किया.
 
मनप्रीत ने लगातार इन आरोपों से इनकार किया है. उन्होंने एफआईआर को दुर्भावना से प्रेरित और राजनीतिक बताया है. अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं और कुछ भी साबित नहीं हुआ है.
 
सिंगला और मनप्रीत के बीच टकराव अब भी जारी है और दोनों बठिंडा अर्बन से BJP का टिकट चाहते हैं. इस साल हुए नगर निकाय चुनावों में BJP के खराब प्रदर्शन के बाद दोनों खेमों ने एक-दूसरे पर पार्टी को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए.
 
सबसे गंभीर हमला अकाली दल की ओर से आया. अगस्त 2024 में गिद्दड़बाहा उपचुनाव से पहले अकाली दल के विधानसभा क्षेत्र प्रभारी हरदीप सिंह डिंपी ढिल्लों ने मनप्रीत के मुद्दे पर इस्तीफा दे दिया. उन्होंने कहा कि जनवरी में सुखबीर ने उनसे बताया था कि मनप्रीत अकाली दल में वापस आना चाहते हैं.

इसके बाद मनप्रीत गिद्दड़बाहा में सक्रिय हो गए और लोगों से मिलने लगे, लेकिन उन्होंने उन्हें BJP में शामिल होने के लिए नहीं कहा.
 
सुखबीर ने इन खबरों को गलत बताया. उन्होंने कहा कि मनप्रीत उनके चचेरे भाई हो सकते हैं, लेकिन वे BJP में हैं और उनके रास्ते अलग हैं. मनप्रीत ने डिंपी के आरोपों को निराशा का नतीजा बताया.

डिंपी बाद में आम आदमी पार्टी में चले गए और उसे टिकट पर चुनाव जीते. अकाली दल ने चुनाव नहीं लड़ा. उस समय सुखबीर को अकाल तख्त ने तनखैया घोषित किया हुआ था.
 
अब ऐसी चर्चा है कि 7 अगस्त को संसद भवन में सुखबीर की प्रधानमंत्री मोदी से 20 मिनट की मुलाकात हुई. इसके बाद कोई आधिकारिक बयान नहीं आया और उनके सहयोगियों ने इसे अनौपचारिक मुलाकात बताया.

एक प्रमुख अखबार ने एक सूत्र के हवाले से खबर दी कि बातचीत चल रही है और हाल के युवा प्रदर्शनों के बाद BJP पुराने सहयोगियों को फिर से साथ लाने पर विचार कर रही है, क्योंकि BJP विरोधी दल एकजुट हो रहे हैं.
 
BJP के हर वरिष्ठ नेता ने ऐसी किसी बातचीत से इनकार किया है. नितिन नवीन ने भी साफ कहा है कि पार्टी पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी.
 
लेकिन आंकड़े BJP और अकाली दल के लिए ज्यादा उत्साहजनक नहीं हैं. अकाली दल का वोट शेयर 2022 में 18 प्रतिशत था, जो 2024 के लोकसभा चुनाव में घटकर 13 प्रतिशत और हाल के नगर निकाय चुनावों में 9.71 प्रतिशत रह गया.

BJP के अकेले चुनाव लड़ने से भी उसे पंजाब में कोई बड़ी सफलता नहीं मिली है. चंडीगढ़ के इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन के अध्यक्ष डॉ. प्रमोद कुमार के मुताबिक, दोनों पार्टियां तीसरे और चौथे स्थान के लिए लड़ेंगी और असली मुकाबला सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच रहेगा.
 
इन परिस्थितियों में BJP में मनप्रीत की पदोन्नति के दो मतलब निकाले जा रहे हैं और पार्टी ने अभी इनमें से किसी एक को स्पष्ट नहीं किया है. पहला यह कि अगर BJP अकाली दल के साथ फिर से गठबंधन करने की तैयारी कर रही होती तो वह मनप्रीत को आगे नहीं बढ़ाती. दूसरा यह कि अगर सुखबीर के साथ बातचीत का रास्ता खुला रखना है, तो मनप्रीत जैसा व्यक्ति इस बातचीत में उपयोगी हो सकता है.
 
लेकिन इन दोनों बातों से एक बड़ा सवाल हल नहीं होता. पंजाब में जाट सिखों का प्रभाव गांवों, पंचायतों, सहकारी संस्थाओं, गुरुद्वारा नेटवर्क और किसान संगठनों के जरिए चलता है. दिल्ली में राष्ट्रीय पद मिल जाने से किसी प्रमुख जाट सिख नेता को अपने आप यह प्रभाव नहीं मिल जाता.

BJP पिछले छह साल से पंजाब में बड़े और चर्चित चेहरों को अपने साथ जोड़ रही है. लेकिन अभी तक वह अपना मजबूत संगठन नहीं बना पाई है.
 
चार साल से ज्यादा समय पहले जिस मनप्रीत बादल ने बठिंडा एयरपोर्ट की हवाई पट्टी पर खड़े होकर मोदी के फंसे काफिले को लेकर माफी मांगी थी, आज वही मनप्रीत प्रधानमंत्री की पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व का हिस्सा हैं. लेकिन इससे पंजाब में BJP को वह राजनीतिक ताकत मिलती है या नहीं, जिस पर पार्टी भरोसा कर सके, इसका जवाब आने वाले कुछ महीनों में मिलेगा.

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