
महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ महायुति को बड़ा झटका लगा है. राज्य विधान परिषद की पांच सीटों में से तीन पर उसे हार का सामना करना पड़ा है. इनमें नागपुर स्नातक सीट भी शामिल है. यह ऐसे समय हुआ है जब भारत के कुछ हिस्सों में Gen Z के विरोध प्रदर्शन और युवाओं में नाराजगी देखने को मिल रही है वहीं महाराष्ट्र में प्रभावशाली मराठा समुदाय के एक वर्ग में भी असंतोष है.
नागपुर स्नातक सीट पर हार खास तौर पर अहम है क्योंकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी इसी क्षेत्र से आते हैं. नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मुख्यालय भी है.
पुणे स्नातक, पुणे शिक्षक, अमरावती शिक्षक, नागपुर स्नातक और औरंगाबाद स्नातक सीटों के लिए द्विवार्षिक चुनाव 23 अक्टूबर को हुए थे. मतगणना 27 और 28 अक्टूबर को हुई. इन सीटों के निर्वाचक मंडल में क्रमशः स्नातक और शिक्षक शामिल होते हैं.
हर चुनाव के लिए मतदाताओं को नए सिरे से पंजीकरण कराना पड़ता है. ऐसे में उस पार्टी या उम्मीदवार को बढ़त मिलती है जो सबसे ज्यादा मतदाताओं का पंजीकरण कराने और उन्हें मतदान केंद्रों तक लाने में सफल रहता है.
इनमें से दो सीटें (पुणे शिक्षक और नागपुर स्नातक) कांग्रेस के पास थीं. एक-एक सीट राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) और उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार के नेतृत्व वाली दूसरी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के पास थी. ये क्रमशः पुणे स्नातक और औरंगाबाद स्नातक सीटें थीं. अमरावती शिक्षक सीट एक निर्दलीय के पास थी जो बाद में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गया था.
पहले भी बागी उम्मीदवार आधिकारिक प्रत्याशियों का खेल बिगाड़ने की अपनी ताकत दिखा चुके हैं. इसी साल BJP के बागी गोकुल गीते ने नासिक स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र से शिवसेना के विधान परिषद सदस्य किशोर दराडे को चौंकाने वाली हार दी थी. दावा किया गया था कि गीते को BJP के भीतर के कुछ लोगों का समर्थन हासिल था. हालांकि बाद में वे शिंदे की शिवसेना में सहयोगी सदस्य के रूप में शामिल हो गए.

BJP को सबसे बड़ा झटका उसके पुराने गढ़ नागपुर स्नातक सीट पर लगा. यहां उसके उम्मीदवार सुधाकर कोहले को कांग्रेस के विधान परिषद सदस्य अभिजीत वंजारी ने बेहद करीबी मुकाबले में हरा दिया.
कोहले को उम्मीदवार बनाने के BJP के फैसले से पूर्व विधान परिषद सदस्य अनिल सोले नाराज हो गए थे. उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नामांकन दाखिल कर दिया था. भारतीय जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष पंडित बच्चराज व्यास के बेटे और पूर्व विधान परिषद सदस्य गिरीश व्यास ने सोले के समर्थन में पार्टी के पदों से इस्तीफा दे दिया था.
यह निर्वाचन क्षेत्र लंबे समय से BJP और संघ परिवार का गढ़ रहा है. 1958 से यहां बच्चराज व्यास, गंगाधरराव फडणवीस (देवेंद्र फडणवीस के पिता) और बाद में गडकरी जैसे दिग्गजों का प्रतिनिधित्व रहा है.
2020 में तत्कालीन विधान परिषद सदस्य सोले का टिकट काटकर नागपुर के मेयर संदीप जोशी को उम्मीदवार बनाया गया था. जोशी फडणवीस के चुनाव अभियान का प्रबंधन करते रहे थे. लेकिन वे कांग्रेस के अभिजीत वंजारी से हार गए थे. हालांकि फडणवीस और राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने सोले और व्यास को मनाने के लिए काफी कोशिशें की थीं.
करीब दो दिन तक चली मतगणना के दौरान कोहले आगे चल रहे थे. लेकिन राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के बागी उम्मीदवार नीलेश कराले 'मास्तर' के पहली वरीयता के बाद के वोटों का बड़ा हिस्सा वंजारी को मिला. कराले पेशे से शिक्षक हैं और सोशल मीडिया पर भी लोकप्रिय हैं. उनके वोटों से वंजारी को बढ़त मिल गई.
कराले को 24,000 से ज्यादा वोट मिले और वे किसी हद तक निर्णायक भूमिका में आ गए. इस जीत से फडणवीस को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा. वे सीट जिताने के लिए दो दिन तक नागपुर में डेरा डाले रहे थे और आखिरी दिनों में जमीनी स्तर पर चुनाव अभियान की बारीकियों पर खुद नजर रख रहे थे.
इस हार की वजह BJP और RSS के एक वर्ग में कोहले की उम्मीदवारी को लेकर नाराजगी, Gen Z के प्रदर्शनकारियों को कराले का समर्थन और विदर्भ में कांग्रेस नेताओं का एकजुट होकर काम करना बताया जा रहा है.
पुणे स्नातक सीट पर BJP की उम्मीदवार स्मिता जाधव को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की उम्मीदवार हर्षदा देशमुख जाधव ने करारी शिकस्त दी. स्मिता मीडिया कारोबारी प्रतापसिंह जाधव की बहू हैं जबकि हर्षदा पूर्व आईएएस अधिकारी प्रभाकर देशमुख की बेटी हैं. इस हार की वजह महायुति के घटक दलों के बीच मतभेद को बताया जा रहा है.
मौजूदा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के विधान परिषद सदस्य अरुण लाड ने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया था. माना जा रहा था कि उनके बेटे शरद को इस सीट से BJP का टिकट मिलेगा. लेकिन BJP ने स्मिता जाधव को उम्मीदवार बनाया. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता और चिकित्सा शिक्षा मंत्री हसन मुश्रीफ के समर्थक प्रताप उर्फ भैया माने ने भी चुनाव लड़ने के लिए दावेदारी पेश की थी लेकिन बाद में नाम वापस ले लिया.
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे ने पुणे स्नातक सीट पर पार्टी का दावा छोड़कर उसे BJP को देने पर नाराजगी जताई है. अविभाजित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने यह सीट जीती थी. पार्टी के एक नेता ने कहा कि संगठन के भीतर इस नाराजगी के चलते उसके कुछ मतदाताओं ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) का समर्थन किया होगा.
दिलचस्प बात यह है कि कोल्हापुर के कांग्रेस पार्षद सुनील मोदी को शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) का उम्मीदवार बनाए जाने से भी हर्षदा देशमुख जाधव की संभावनाओं पर कोई असर नहीं पड़ा. पुणे स्नातक और पुणे शिक्षक सीटों के अंतर्गत पुणे, सतारा, सांगली, कोल्हापुर और सोलापुर के पांच जिले आते हैं.
ग्रामीण विकास मंत्री और फडणवीस के करीबी जयकुमार गोरे ने पूर्व सांसद रणजीतसिंह निंबालकर और पूर्व विधायक राम सातपुते के साथ सोलापुर और सतारा में चुनाव अभियान की कमान संभाली थी. लेकिन उनकी कोशिशें सफल होती नहीं दिखीं.
औरंगाबाद स्नातक सीट पर भी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) ने अपनी प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को झटका दिया. उसके उम्मीदवार डॉ. प्रतापसिंह पाटिल ने तीन बार के विधान परिषद सदस्य सतीश चव्हाण को करारी शिकस्त दी.
प्रतापसिंह, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के विधायक डॉ. राहुल पाटिल के भाई हैं. इस नतीजे पर महायुति और मराठा आरक्षण आंदोलन के नेता मनोज जरांगे पाटिल के बीच बढ़ती दूरी का असर पड़ा. मराठवाड़ा क्षेत्र में जरांगे का मजबूत जनाधार है. सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर के मतभेदों ने भी नतीजे को प्रभावित किया.
शिंदे की शिवसेना के नेता और मंत्री संजय शिरसाट, पूर्व मंत्री एवं विधायक अब्दुल सत्तार और विधायक संजना जाधव समेत कई नेताओं ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के लिए प्रचार किया.
दिलचस्प बात यह है कि शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने इस सीट से दिलीप घुगे को उम्मीदवार बनाया था. कथित तौर पर इसका मकसद प्रतापसिंह पाटिल की जीत की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाना था. बताया गया कि क्षेत्र के शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के एक वरिष्ठ नेता के कहने पर यह फैसला लिया गया था. हालांकि राहुल पाटिल अपने भाई के लिए प्रचार करते रहे.
पुणे शिक्षक सीट पर कांग्रेस के विधान परिषद सदस्य जयंत असगांवकर को BJP के कौस्तुभ गावड़े ने हरा दिया. चार उम्मीदवारों के बीच हुए इस मुकाबले में शिवसेना के सचिन सानप और पूर्व विधान परिषद सदस्य दत्तात्रय सावंत भी मैदान में थे. यह हार असगांवकर के समर्थक सतेज (बंटी) पाटिल के लिए बड़ा झटका है.
सतेज, शिक्षा क्षेत्र के बड़े कारोबारी और महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल दिवंगत डी.वाई. पाटिल के बेटे हैं. कुछ ही दिन पहले पाटिल ने कोल्हापुर की प्रतिष्ठित गोकुल सहकारी दुग्ध महासंघ के चुनाव में जीत हासिल की थी. इस महासंघ का सालाना कारोबार 4,000 करोड़ रुपए से ज्यादा है.
BJP के चुनाव अभियान के अलावा गावड़े को कोल्हापुर स्थित श्री स्वामी विवेकानंद शिक्षण संस्था के नेटवर्क से भी मदद मिली. वे इस संस्था के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं. शिवसेना ने पहले शिंदे के करीबी माने जाने वाले मंगेश चिवटे को उम्मीदवार बनाने का फैसला कर सबको चौंकाया था. हालांकि, चिवटे ने बाद में नाम वापस ले लिया.
लेकिन उद्योग मंत्री और शिवसेना नेता उदय सामंत के सहयोगी सानप चुनाव मैदान में बने रहे. जमीनी स्तर से मिली खबरों के मुताबिक, सभी प्रमुख उम्मीदवारों ने बड़े पैमाने पर संसाधन झोंके थे. नतीजे घोषित होने के बाद गावड़े ने सानप के साथ अपने मुकाबले को ‘दोस्ताना लड़ाई’ बताया.
कांग्रेस को भी निराशा हाथ लगी. उसकी उम्मीदवार अदिति पोहरे अमरावती शिक्षक सीट पर मौजूदा विधान परिषद सदस्य और शिवसेना के उम्मीदवार किरण सरनाइक से हार गईं. पोहरे पूर्व मंत्री हर्षवर्धन देशमुख की बेटी और संपादक एवं मीडिया हस्ती प्रकाश पोहरे की बहू हैं.
हर्षवर्धन देशमुख अमरावती स्थित श्री शिवाजी शिक्षा संस्था के अध्यक्ष हैं. इस संस्था का कॉलेजों और स्कूलों के शिक्षकों के बीच मजबूत नेटवर्क है. सरनाइक को महायुति के भीतर भारी उठापटक का सामना करना पड़ रहा था. इस सीट पर पार्टी के बागी और पूर्व विधान परिषद सदस्य श्रीकांत देशपांडे भी मैदान में थे. उनके अलावा BJP के राज्यसभा सांसद डॉ. अनिल बोंडे की बहन संगीता शिंदे और BJP विधायक राजेश वानखड़े के बहनोई शेखर भोयर भी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे थे.
बुलढाणा जैसे जिलों में BJP और शिवसेना के बीच तनावपूर्ण संबंध हैं. दावा किया जा रहा था कि इसका असर चुनाव के नतीजे पर पड़ेगा. यह निर्वाचन क्षेत्र विदर्भ के अमरावती, अकोला, यवतमाल, वाशिम और बुलढाणा जिलों में फैला हुआ है.
BJP के एक पदाधिकारी कहते हैं कि विधान परिषद चुनावों में पार्टी और महायुति का प्रदर्शन अच्छा रहा है. पांच में से दो सीटें जीतकर BJP ने अपनी संख्या शून्य से बढ़ाकर दो कर ली है. फडणवीस के करीबी एक अन्य सूत्र ने दावा किया कि महायुति के भीतर बगावत की वजह 2024 के विधानसभा चुनावों में उसकी शानदार जीत और गठबंधन में कई दलों की मौजूदगी भी है. इससे गठबंधन के भीतर ज्यादा हिस्सेदारी पाने की होड़ बढ़ी है.
शिवसेना के एक सूत्र ने कहा कि BJP की सहयोगी पार्टियों, जैसे शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, को कई बार अपनी अलग पहचान दिखाने के लिए गठबंधन से अलग रुख अपनाना पड़ता है. इसका मकसद "यह रेखांकित करना है कि वे BJP में समाहित नहीं होना चाहते". वे यह भी कहते हैं, "तीन दलों का यह गठबंधन तीन टांगों वाली दौड़ की तरह है, जिसमें तालमेल बिठाना मुश्किल है. इसलिए हमें और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को अपनी अलग स्थिति दिखाने के लिए बयानबाजी करनी पड़ती है. वरना ऐसा लगेगा कि हमने BJP के सामने समर्पण कर दिया है."
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम जाहिर न करने की शर्त पर कहा कि सत्तारूढ़ गठबंधन में बगावत की वजह विपक्षी महा विकास अघाड़ी (MVA) का कमजोर पड़ना भी है. विपक्षी दलों के कई नेता बेहतर अवसरों की तलाश में पाला बदलकर सत्तारूढ़ खेमे में आ गए हैं. उन्होंने कहा, "विपक्ष सिमट रहा है जबकि सत्तारूढ़ खेमे में जगह के लिए होड़ बढ़ रही है."
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के एक नेता कहते हैं कि महा विकास अघाड़ी में बगावत के कारण नागपुर स्नातक सीट गंवानी पड़ी. यह सहयोगी दलों के बीच ‘खराब तालमेल’ का संकेत है. कांग्रेस ने जिन दो सीटों पर कब्जा बरकरार रखा था उनमें भी हार का सामना किया. इससे संकेत मिलता है कि उसे अपने प्रदर्शन की गंभीर समीक्षा करने की जरूरत है.

