
11 अक्टूबर को मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में वन भूमि से आदिवासी परिवारों को हटाए जाने की घटना अब केवल स्थानीय प्रशासन से जुड़ा विवाद नहीं रह गई है. यह मुख्यमंत्री मोहन यादव के लिए एक राजनीतिक कसौटी बन गई है. इस विवाद में राज्य में BJP के सबसे कद्दावर नेताओं में से एक, पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान भी शामिल हो गए हैं.
चौहान ने बरैला समुदाय के 12 परिवारों को उस जमीन से हटाए जाने के बाद कड़ी प्रतिक्रिया दी जो मध्य प्रदेश राज्य वन विकास निगम को आवंटित है. यह राज्य सरकार के अधीन काम करने वाला एक व्यावसायिक निकाय है.
इन परिवारों का गांव कोसमी, विदिशा लोकसभा क्षेत्र में आता है जिसका प्रतिनिधित्व चौहान करते हैं. यह बुधनी विधानसभा क्षेत्र का भी हिस्सा है जो मुख्यमंत्री के रूप में चौहान के राजनीतिक करियर का मुख्य आधार रहा है.
जल्द ही इस मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया. चौहान ने यादव से मुलाकात की और उनसे जवाब मांगा. मुख्यमंत्री ने पूर्व मुख्यमंत्री को आश्वासन दिया कि वे मामले की जांच के आदेश देंगे. इसके तुरंत बाद सीहोर जिला प्रशासन ने राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी. रिपोर्ट में बेदखली की कार्रवाई का समर्थन किया गया और आदिवासी परिवारों को वन भूमि पर अतिक्रमण करने वाला बताया गया.

हालांकि सीहोर की यह घटना एक बड़ी समस्या की केवल ऊपरी तस्वीर है. वन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश में अतिक्रमण शासन-प्रशासन के सामने लंबे समय से बनी हुई चुनौतियों में से एक है. राज्य में अधिसूचित 94.69 लाख हेक्टेयर वन भूमि में से करीब 5.75 लाख हेक्टेयर पर अवैध कब्जा है. यह कुल वन क्षेत्र का लगभग छह फीसदी है.
इसका बोझ सभी जिलों में समान रूप से नहीं फैला है. अतिक्रमण के मामले में बुरहानपुर सबसे ऊपर है जहां 52,751 हेक्टेयर वन भूमि पर कब्जा है. इसके बाद रायसेन का नंबर आता है, जहां 46,000 हेक्टेयर जमीन अतिक्रमण की चपेट में है. अलीराजपुर में 25,601 हेक्टेयर, छतरपुर में 12,957 हेक्टेयर और खंडवा में 4,034 हेक्टेयर वन भूमि अब भी वन विभाग के कब्जे से बाहर है.
अतिक्रमण का रुझान भी चिंताजनक है. 2021 में वन विभाग ने अतिक्रमण के 1,825 मामले दर्ज किए थे जिनमें 2,110 हेक्टेयर जमीन शामिल थी. 2024 तक मामलों की संख्या मामूली घटकर 1,774 रह गई लेकिन प्रभावित जमीन का रकबा दोगुने से भी ज्यादा बढ़कर 4,275 हेक्टेयर हो गया.
2025 में अधिकारियों ने 4,292 हेक्टेयर जमीन से जुड़े अतिक्रमण के 2,345 मामले दर्ज किए. इससे साफ है कि अतिक्रमण का दायरा हर साल दर्ज होने वाले मामलों की संख्या में बदलाव के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है.
सीहोर मामले में राज्य सरकार का रुख इसी व्यापक पृष्ठभूमि से जुड़ा है. जिला प्रशासन की ओर से राज्य सरकार को सौंपी गई रिपोर्ट के मुताबिक, विवादित वन भूमि पर केवल नौ परिवार रह रहे थे. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इन परिवारों के मकान सिंहपुर और हबीबनगर गांवों में भी हैं और वहां उनके नाम मतदाता सूची में दर्ज हैं. रिपोर्ट में गूगल अर्थ की तस्वीरों का भी हवाला दिया गया है. इनके मुताबिक, 2021 में 31 हेक्टेयर के इस भूखंड पर अतिक्रमण का कोई संकेत नहीं था. यहां कब्जा 2022 के बाद ही दिखाई देने लगा.
प्रशासन ने इस अतिक्रमण को बड़े पैमाने पर किए गए पौधारोपण को नुकसान पहुंचाने से भी जोड़ा है. उसका आरोप है कि जमीन पर लगाए गए कुल 3.37 लाख पौधों में से 78,000 पौधे नष्ट कर दिए गए.
इसलिए यादव के लिए यह विवाद केवल एक बेदखली की कार्रवाई का मामला नहीं है. उनके सामने एक ओर आदिवासियों के दावे और राजनीतिक संवेदनशीलताएं हैं तो दूसरी ओर वन संपदा की रक्षा करने की राज्य की जिम्मेदारी.
कार्रवाई में शामिल अधिकारियों के खिलाफ कदम उठाने से सरकार के इनकार से उसका रुख स्पष्ट होता है. सरकार विभागीय कार्रवाई का बचाव कर रही है और सीहोर की घटना को वन भूमि पर अतिक्रमण के खिलाफ व्यापक अभियान का हिस्सा बता रही है. फिलहाल इस फैसले से जुड़ी राजनीति को संभालना अतिक्रमण की समस्या से भी ज्यादा मुश्किल साबित हो सकता है.

