
उत्तर प्रदेश में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है. तेजी से बढ़ते शहरीकरण, एयर कंडीशनर, इंडक्शन कुकटॉप, इलेक्ट्रिक वाहनों और घरेलू बिजली उपकरणों के बढ़ते इस्तेमाल ने बिजली की खपत को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है. ऐसे में राज्य सरकार और केंद्र सरकार की 'पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना' ने आम उपभोक्ताओं को अपनी छत पर ही बिजली उत्पादन का विकल्प दिया है.
यही वजह है कि उत्तर प्रदेश आज 2,300 मेगावॉट से अधिक रूफटॉप सोलर क्षमता के साथ देश में दूसरे स्थान पर पहुंच चुका है.
इस पूरी तस्वीर में सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरा है लखनऊ, जिसने रूफटॉप सोलर इंस्टॉलेशन के मामले में न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में नया रिकॉर्ड बनाया है.
हालांकि इस उपलब्धि के साथ एक बड़ी चुनौती भी सामने आई है. हजारों उपभोक्ताओं को अपने सोलर प्लांट से बनने वाली बिजली का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है क्योंकि नेट मीटर और बिलिंग सिस्टम के बीच तकनीकी तालमेल की समस्या अब भी बनी हुई है.
लखनऊ क्यों बना देश की सोलर राजधानी
15 अप्रैल तक के उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार, लखनऊ ने रूफटॉप सोलर इंस्टॉलेशन के मामले में सूरत को पीछे छोड़ दिया. मई तक यह बढ़त और मजबूत हुई तथा लखनऊ देश का पहला जिला बन गया जहां एक लाख से अधिक रूफटॉप सोलर इंस्टॉलेशन हो चुके हैं.
वर्तमान में जिले में 1.23 लाख से अधिक घरों में रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाए जा चुके हैं जिनकी कुल क्षमता लगभग 426 मेगावॉट है. वहीं पीएम सूर्य घर योजना के तहत अकेले 15 अप्रैल तक 3,133 नए इंस्टॉलेशन हुए जबकि जिले में कुल इंस्टॉलेशन की संख्या 87 हजार से आगे निकल चुकी थी. इसके बाद हुए इंस्टॉलेशन के साथ यह आंकड़ा एक लाख के पार पहुंच गया.
लखनऊ की सफलता के पीछे कई कारण हैं. राजधानी होने के कारण यहां बिजली की खपत अन्य शहरों की तुलना में अधिक है. मध्यम वर्ग और उच्च आय वर्ग के परिवारों में बिजली का मासिक बिल लगातार बढ़ रहा था. ऐसे में लोगों ने इसे खर्च कम करने का प्रभावी माध्यम माना. केंद्र और राज्य सरकार की सब्सिडी, ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया, समयबद्ध स्वीकृति और डिस्कॉम तथा कार्यान्वयन एजेंसियों के बेहतर समन्वय ने भी लोगों का भरोसा बढ़ाया.
अधिकारियों का कहना है कि लखनऊ का मॉडल अब दूसरे जिलों के लिए एक बेंचमार्क बन चुका है और इसकी कार्यप्रणाली का अध्ययन कर अन्य शहरों में भी इसी तरह की व्यवस्था विकसित की जा रही है.

पूर्वांचल और मध्यांचल की बढ़त, पश्चिमांचल अब भी पीछे
रूफटॉप सोलर के विस्तार की तस्वीर पूरे उत्तर प्रदेश में समान नहीं है. आंकड़े बताते हैं कि मध्यांचल और पूर्वांचल के जिलों ने इस अभियान को सबसे तेजी से अपनाया है. मध्यांचल विद्युत वितरण निगम के अंतर्गत आने वाले जिलों में रूफटॉप सोलर की कुल क्षमता 931 मेगावॉट तक पहुंच चुकी है जो पूरे प्रदेश में सबसे अधिक है.
पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के क्षेत्र में यह क्षमता 502 मेगावॉट है. वहीं दक्षिणांचल में 340 मेगावॉट और पश्चिमांचल में केवल 311 मेगावॉट क्षमता के सोलर रूफटॉप स्थापित हुए हैं.
अगर शहरों की बात करें तो लखनऊ 426 मेगावॉट क्षमता के साथ सबसे आगे है. इसके बाद वाराणसी में लगभग 163 मेगावॉट और कानपुर में 147 मेगावॉट क्षमता के रूफटॉप सोलर सिस्टम स्थापित किए जा चुके हैं.
दिलचस्प तथ्य यह है कि आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत संपन्न माने जाने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तुलना में मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों ने इस योजना को कहीं अधिक तेजी से अपनाया है. ऊर्जा विभाग के अधिकारियों का मानना है कि बढ़ती बिजली दरों, पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता और सरकार की सब्सिडी नीति ने लोगों को सौर ऊर्जा की ओर आकर्षित किया है.
इसके अलावा शहरी क्षेत्रों में दिन के समय अधिक बिजली खपत होने से उपभोक्ताओं को अपने मासिक बिल में उल्लेखनीय बचत दिखाई देने लगी, जिससे दूसरे लोगों का भी भरोसा बढ़ा.
नेट मीटरिंग की बड़ी चुनौती
लखनऊ की सफलता की कहानी जितनी प्रेरणादायक है, उसके बाद सामने आई समस्याएं उतनी ही गंभीर हैं. लखनऊ इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई एडमिनिस्ट्रेशन (लेसा) के अनुसार लगभग पांच हजार उपभोक्ताओं को अब तक उनके सोलर प्लांट से उत्पादित अतिरिक्त बिजली का पूरा क्रेडिट नहीं मिल पाया है. इसकी मुख्य वजह नेट मीटर को बिजली विभाग के रेवेन्यू मैनेजमेंट सिस्टम (आरएमएस) से जोड़ने में हो रही देरी है.
नेट मीटरिंग व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि उपभोक्ता पहले अपने घर में सोलर से बनी बिजली का उपयोग करें और अतिरिक्त बिजली ग्रिड में भेज दें. बाद में यही बिजली उनके मासिक बिल में समायोजित हो जाती है. लेकिन जब नेट मीटर और बिलिंग सिस्टम के बीच तकनीकी समन्वय नहीं हो पाता तो ग्रिड में भेजी गई बिजली का पूरा रिकॉर्ड नहीं बनता. परिणामस्वरूप उपभोक्ताओं को अपेक्षा से अधिक बिजली बिल चुकाना पड़ता है.
इतना ही नहीं, शिकायतों के समाधान की प्रक्रिया भी उपभोक्ताओं की परेशानी बढ़ा रही है. विभाग ने ऑनलाइन शिकायत निस्तारण के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म शुरू किया है लेकिन प्रभावित लोगों का कहना है कि उन्हें आज भी बिजली विभाग और सोलर इंस्टॉलेशन कंपनियों के बीच कई बार चक्कर लगाने पड़ते हैं. दोनों पक्ष अक्सर जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाल देते हैं, जिससे समाधान में महीनों लग जाते हैं.
उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के एक पदाधिकारी का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में रूफटॉप सोलर कार्यक्रम को सफल बनाना चाहती है तो केवल इंस्टॉलेशन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा. समय पर नेट मीटर इंटीग्रेशन, बिलिंग सिंक्रोनाइजेशन और प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। तभी उपभोक्ताओं को योजना का वास्तविक आर्थिक लाभ मिल सकेगा.
शिकायतें और विभाग की सफाई
रूफटॉप सोलर लगाने वाले कई उपभोक्ताओं का अनुभव बताता है कि तकनीकी खामियां उनकी बचत पर सीधा असर डाल रही हैं.
चार किलोवाट क्षमता का सोलर प्लांट लगाने वाले उपभोक्ता राजेश कुमार दीक्षित बताते हैं कि उनका सिस्टम हर महीने लगभग 500 यूनिट बिजली का उत्पादन करता है लेकिन बिजली बिल में केवल 275 से 375 यूनिट का ही क्रेडिट दिखाई देता है. बाकी बिजली का हिसाब कहां जा रहा है, इसका स्पष्ट उत्तर उन्हें अब तक नहीं मिला.
इसी तरह जितेंद्र कुमार वर्मा ने नवंबर 2025 में अपना सोलर सिस्टम लगवाया था. उनका कहना है कि शुरुआती उम्मीद थी कि बिजली बिल में भारी कमी आएगी लेकिन इसके उलट मार्च में जहां उनका बिल 305 रुपये था, वहीं जुलाई में यह बढ़कर 8,041 रुपये पहुंच गया.
उन्होंने कई बार 1912 हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई लेकिन हर बार उन्हें सोलर इंस्टॉलेशन कंपनी से संपर्क करने की सलाह देकर मामला टाल दिया गया. उनका कहना है कि उपभोक्ता बिजली विभाग और निजी कंपनी के बीच फंसकर रह गया है.
बिजली विभाग का कहना है कि इस समस्या के समाधान की दिशा में काम शुरू कर दिया गया है. अमौसी जोन के मुख्य अभियंता राम कुमार के अनुसार अब ऐसे नेट मीटर लगाए जा रहे हैं जो पहले से कॉन्फिगर होकर आते हैं. इन मीटरों को अलग से आरएमएस से जोड़ने की आवश्यकता नहीं होगी और रूफटॉप सोलर से बनने वाली बिजली अपने आप रिकॉर्ड होती रहेगी. उनका कहना है कि इससे भविष्य में होने वाले इंस्टॉलेशन में ऐसी शिकायतें काफी कम हो जाएंगी.
हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल नई तकनीक अपनाने से समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं होगी. पहले से लगे हजारों सिस्टम का समयबद्ध एकीकरण, पुराने लंबित मामलों का निस्तारण और पारदर्शी बिलिंग व्यवस्था विकसित करना भी उतना ही जरूरी है. यदि ऐसा नहीं हुआ तो लोगों का भरोसा प्रभावित हो सकता है और सरकार की महत्वाकांक्षी सौर ऊर्जा योजना की गति भी धीमी पड़ सकती है.

