लखनऊ के कुकरैल रिजर्व फॉरेस्ट में प्रस्तावित देश की पहली नाइट सफारी आखिरकार हकीकत की ओर बढ़ चुकी है. 15 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की उस महत्वाकांक्षी परियोजना को मंजूरी दे दी, जो पिछले चार वर्षों से कानूनी और पर्यावरणीय जांच के विभिन्न चरणों से गुजर रही थी.
जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि जब केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी (CEC) परियोजना को आवश्यक शर्तों के साथ मंजूरी दे चुके हैं, तब राज्य सरकार को इसे लागू करने से रोकने का कोई कारण नहीं है.
हालांकि अदालत ने राज्य सरकार को खुली छूट नहीं दी. उसने स्पष्ट किया कि CEC, CZA और पर्यावरण मंत्रालय द्वारा तय की गई प्रत्येक शर्त का अक्षरशः पालन करना होगा. अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि CEC समय-समय पर परियोजना का निरीक्षण करेगी और अगर किसी भी स्तर पर शर्तों का उल्लंघन पाया गया तो उसे गंभीरता से लिया जाएगा.
सुनवाई के दौरान परियोजना का विरोध करने वाले पक्ष ने तर्क दिया कि रिजर्व फॉरेस्ट को पर्यटन केंद्र में बदलना पर्यावरण के लिए उचित नहीं होगा. इस पर अदालत ने यह टिप्पणी की कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन जरूरी है तथा आधुनिक वन्यजीव संरक्षण की अवधारणाओं को भी अपनाना होगा; अदालत की यह टिप्पणी कि "जू अब पुराने हो चुके हैं" इस परियोजना को लेकर नई सोच का संकेत मानी जा रही है. अब प्रदेश सरकार अगस्त में परियोजना का शिलान्यास कराने की तैयारी कर रही है. पहले चरण के लिए 631 करोड़ रुपए स्वीकृत हो चुके हैं जबकि निर्माण कार्य के लिए 206 करोड़ रुपए जारी किए जा चुके हैं. विभाग का लक्ष्य पहले चरण को दो वर्षों में पूरा करना है.
कैसी होगी भारत की पहली नाइट सफारी
करीब 1,510 करोड़ रुपए की यह परियोजना 855 एकड़ क्षेत्र में विकसित होगी. इसे दो चरणों में बनाया जाएगा. पहले चरण में नाइट सफारी और इको-टूरिज्म जोन तैयार होगा जबकि दूसरे चरण में आधुनिक डे जू का निर्माण किया जाएगा. इस परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक रात्रिकालीन व्यवहार के दौरान देखा जा सकेगा. सामान्य चिड़ियाघरों में दिन के समय अधिकांश निशाचर जीव निष्क्रिय दिखाई देते हैं, लेकिन यहां विशेष ‘मूनलाइट सिमुलेशन’ यानी कृत्रिम चांदनी जैसी प्रकाश व्यवस्था बनाई जाएगी, जिससे जानवरों की जैविक घड़ी प्रभावित न हो और पर्यटक उनके वास्तविक व्यवहार का अनुभव कर सकें.
पूरे सफारी क्षेत्र में बैटरी चालित वाहनों से भ्रमण कराया जाएगा. अलग-अलग देशों और भारत के विविध वन्यजीव परिदृश्यों पर आधारित थीम जोन विकसित किए जाएंगे. प्राकृतिक घास के मैदान, वेटलैंड, चट्टानी क्षेत्र, स्थानीय वृक्षों से युक्त जंगल और जलाशय इस तरह तैयार किए जाएंगे कि जानवर कृत्रिम बाड़ों में नहीं बल्कि प्राकृतिक परिवेश में दिखाई दें. परियोजना में एशियाई शेर, बंगाल टाइगर, तेंदुआ, लकड़बग्घा, उड़ने वाली गिलहरी, घड़ियाल सहित कई प्रजातियों के लिए विशेष आवास बनाए जाएंगे.
इसके अलावा संरक्षण प्रजनन केंद्र, वन्यजीव शिक्षा केंद्र, रिसर्च लैब, 7-डी थिएटर, ऑडिटोरियम, कैफेटेरिया और इंटरप्रिटेशन सेंटर जैसी सुविधाएं भी विकसित होंगी. मुख्य प्रवेश द्वार को गुफा की आकृति में तैयार किया जाएगा, जहां कृत्रिम झरनों और प्राकृतिक वातावरण का अनुभव मिलेगा. अंदर लगभग एक किलोमीटर लंबी सड़क, 200 वाहनों की पार्किंग और उच्चस्तरीय पर्यटक सुविधाएं विकसित की जाएंगी. टिकट की संभावित कीमत 500 से 1000 रुपए के बीच रखी जा सकती है. सामान्य दिनों में प्रतिदिन लगभग 4,000 और सप्ताहांत व अवकाश के दिनों में 8,000 पर्यटकों के आने का अनुमान लगाया गया है.
पर्यटन ही नहीं, संरक्षण और रिसर्च का भी केंद्र बनने का दावा
प्रदेश सरकार इस परियोजना को केवल पर्यटन परियोजना नहीं बल्कि संरक्षण आधारित आधुनिक वन्यजीव केंद्र के रूप में प्रस्तुत कर रही है. सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य वन्यजीव संरक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान, संरक्षण प्रजनन, पर्यावरण शिक्षा और इको-टूरिज्म को एक मंच पर लाना है. कुकरैल रिजर्व फॉरेस्ट पहले से ही देश के सबसे महत्वपूर्ण घड़ियाल संरक्षण केंद्रों में से एक है.
वर्ष 1975 में यहां स्थापित घड़ियाल पुनर्वास केंद्र ने पिछले पांच दशकों में हजारों घड़ियालों का संरक्षण और प्रजनन किया है. यहां तैयार किए गए घड़ियाल देश की विभिन्न नदियों में छोड़े जाते रहे हैं. वन्यजीव विशेषज्ञ मोहम्मद बिलाल खान कहते हैं, "अगर परियोजना वास्तव में संरक्षण आधारित मॉडल पर लागू होती है और पर्यटन को वैज्ञानिक प्रबंधन के भीतर रखा जाता है तो यह भारत में आधुनिक वन्यजीव प्रबंधन का नया मॉडल बन सकती है. लेकिन इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण शर्त है कि जानवरों का कल्याण और प्राकृतिक आवास सर्वोच्च प्राथमिकता बने रहें."
भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के एक पूर्व वैज्ञानिक का मानना है कि नाइट सफारी का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं होना चाहिए. वे कहते हैं, "दुनिया के सफल नाइट सफारी मॉडल संरक्षण, रिसर्च और शिक्षा पर आधारित हैं. अगर वैज्ञानिक निगरानी, सीमित पर्यटक दबाव और आवास प्रबंधन सही ढंग से किया जाए तो यह परियोजना संरक्षण के लिए उपयोगी साबित हो सकती है." विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि निशाचर जीवों के व्यवहार, प्रजनन और स्वास्थ्य पर अध्ययन के लिए भी यह केंद्र महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.
पर्यावरणीय चिंताएं भी कम नहीं इसलिए अदालत ने रखी कड़ी निगरानी
कुकरैल रिजर्व फॉरेस्ट लगभग 2,027 हेक्टेयर में फैला लखनऊ का सबसे बड़ा संरक्षित हरित क्षेत्र है. यह गोमती नदी के पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. इसी कारण परियोजना की शुरुआत से ही कई पर्यावरणविदों ने इसे लेकर चिंता व्यक्त की थी. पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी रिजर्व फॉरेस्ट में बड़े पैमाने पर पर्यटन गतिविधियां बढ़ने से ध्वनि प्रदूषण, प्रकाश प्रदूषण, यातायात और मानव दखल बढ़ने का खतरा रहता है. निशाचर जीव विशेष रूप से कृत्रिम रोशनी और मानवीय गतिविधियों के प्रति संवेदनशील होते हैं. पर्यावरणविद प्रो. सी.पी. सिंह का कहना है, "सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि परियोजना पर्यटन केंद्र बनती है या संरक्षण केंद्र. अगर पर्यटकों की संख्या अनियंत्रित रही या व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ीं तो जंगल के प्राकृतिक चरित्र पर असर पड़ सकता है."
इसी आशंका को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने परियोजना की निगरानी का जिम्मा CEC को सौंपा है. अदालत ने तीन महीने बाद स्थल निरीक्षण करने और अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है. परियोजना का विरोध करने वाले पक्षों को भी सुझाव देने की अनुमति दी गई है. CEC ने पहले भी परियोजना के मूल डिजाइन में कई बदलाव सुझाए थे. इन्हीं बदलावों के बाद परियोजना को अंतिम स्वीकृति मिली है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि जंगल का अधिकतम हिस्सा सुरक्षित रहे और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर न्यूनतम प्रभाव पड़े.
अगर सब कुछ योजना के अनुसार हुआ तो लखनऊ केवल नवाबी विरासत, इमामबाड़ों और चिकनकारी के लिए ही नहीं बल्कि देश की पहली नाइट सफारी के लिए भी जाना जाएगा. दुनिया में फिलहाल सिंगापुर, चीन, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे देशों में ही बड़े स्तर पर नाइट सफारी संचालित हैं.

