
कोलकाता की दुर्गा पूजा से शुरू हुआ एक डिजिटल प्रोजेक्ट अब धर्म, तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर होने वाली वैश्विक चर्चा का हिस्सा बनने जा रहा है.
ThePujaApp साल 2013 से वर्चुअल टूर के जरिए कोलकाता की पूजा की झांकियों को दर्ज कर रहा है. अब इसे जर्मनी की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी ऑफ एरफर्ट में 28 से 30 सितंबर तक होने वाली अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस – ‘गॉड, ह्यूमन, मशीन : इमेजेस एंड इमेजिनरीज ऑफ रिलिजिन इन दि एज ऑफ AI’ में आमंत्रित किया गया है.
यह निमंत्रण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐप को सिर्फ पश्चिम बंगाल के सबसे बड़े त्योहार दुर्गा पूजा के डिजिटल गाइड के तौर पर नहीं देखा जा रहा है. इसे इस बात के उदाहरण के रूप में भी देखा जा रहा है कि तकनीक धार्मिक अनुभव को किस तरह सहेज सकती है और उसका स्वरूप बदल सकती है
ऐप के दो संस्थापकों में से एक सौम्यादित्य मुखर्जी कहते हैं, "यह हमारे लिए गर्व और आभार का क्षण है. हमने इसकी शुरुआत सिर्फ जिज्ञासा और पूजा के प्रति प्रेम के चलते एक छोटे से प्रोजेक्ट के तौर पर की थी. यह निमंत्रण हमारे लिए उपलब्धि का एहसास कराता है."

मुखर्जी के मुताबिक, आयोजक कई संस्करणों से ऐप के काम करने के तरीके पर करीब से नजर रख रहे थे. ऐप की ओर से इसमें शामिल होने के लिए कोई आवेदन नहीं किया गया था.
ThePujaApp की शुरुआत एक सीधी सोच के साथ हुई थी. ऐसे लोगों के लिए दुर्गा पूजा के पंडालों का वर्चुअल टूर तैयार करना जो वहां जाकर पूजा नहीं देख सकते थे. खास तौर पर कोलकाता से बाहर रहने वाले बंगालियों के लिए. 2013 में इसके पहले संस्करण में सिर्फ 10 पूजा शामिल थीं.
एक दशक से ज्यादा समय बाद इसके आर्काइव में 500 से ज्यादा झांकियां शामिल हैं. इनमें कोलकाता की कई ऐसी पूजाएं भी हैं, जिनकी भव्य थीम और कलाकृतियां अब उस जगह मौजूद नहीं हैं.
कोविड महामारी ने इस विचार को जबर्दस्त बढ़ावा दिया. जब लोगों का पूजा पंडालों में जाना सीमित हो गया तो वर्चुअल पूजा देखने वालों की संख्या पांच से छह गुना बढ़ गई. इससे प्लेटफॉर्म करीब 4 लाख यूजर्स का समुदाय बनाने में सफल रहा.
ऐप के साथ काम करने वाली पूजा समितियों को अलग-अलग QR कोड भी मिलते हैं. इनके जरिए लोग उनकी डिजिटल आर्काइव तक पहुंच सकते हैं. इस तरह एक ऐसा त्योहार, जिसकी झांकियां जानबूझकर कुछ समय के लिए ही बनाई जाती हैं, उसकी स्थाई डिजिटल मेमोरी तैयार हो जाती है.
अब ऐप सिर्फ मौजूद चीजों को दर्ज करने तक सीमित नहीं है. 2025 में इसके AI से चलने वाले सेल्फी फीचर ने यूजर्स को अपनी सेल्फी या ग्रुप फोटो अपलोड करने और खुद को डिजिटल तरीके से अपनी पसंद के पूजा पंडाल के अंदर दिखाने की सुविधा दी. इसके लिए उन्हें भीड़ या रोशनी की मुश्किलों से जूझने की जरूरत नहीं पड़ती.
एरफर्ट में ThePujaApp को एक खास राउंडटेबल ‘ट्रेवर्सिंग डिजाइन, आर्ट एंड डिवोशन’ का हिस्सा बनाया गया है. इस राउंडटेबल में इस्लामी धार्मिक कला पर काम करने वाले कलाकार भी शामिल होंगे. अगले दिन Hajji VR और VR Karbala के साथ एक गाइडेड VR डिमॉन्स्ट्रेशन में ThePujaApp को भी दिखाया जाएगा.
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि क्या तकनीक लोगों को वर्चुअल तरीके से पूजा पंडाल तक ले जा सकती है. सवाल यह है कि डिजिटल तकनीक लोगों के पवित्र चीजों को देखने, याद रखने और उनकी कल्पना करने के तरीके को कैसे बदल रही है.
इसी बहस के बीच कोलकाता के गायब होते पंडालों को एक अनपेक्षित दूसरी जिंदगी मिली है. वे अब धर्म और AI को लेकर होने वाली वैश्विक चर्चा का हिस्सा हैं.

