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कोलकाता बुक फेयर पर क्यों बढ़ा विवाद?

2027 के 50वें कोलकाता बुक फेयर से पहले थीम कंट्री और आयोजन के अधिकार को लेकर पब्लिशर्स एंड बुकसेलर्स गिल्ड और राज्य सरकार आमने-सामने हैं

कोलकाता बुक फेयर (फाइल फोटो)
अपडेटेड 16 सितंबर , 2026

10 सितंबर को पश्चिम बंगाल के सचिवालय नबन्ना में पब्लिशर्स एंड बुकसेलर्स गिल्ड और राज्य सरकार की ओर से बनाए गए सलाहकार बोर्ड की बैठक हुई. यह बैठक 2027 में होने वाले कोलकाता इंटरनेशनल बुक फेयर की तैयारी को लेकर बुलाई गई थी लेकिन मेले का आयोजन कौन करेगा, इस बात पर दोनों पक्षों में बहस शुरू हो गई. इस दौरान दो मंत्री और एक वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे.

यह बैठक मेले की तैयारी को लेकर बुलाई गई थी. अगला मेला 22 जनवरी से 3 फरवरी 2027 तक होगा. बैठक में मुख्यमंत्री के सलाहकार डॉ. सुब्रत गुप्ता, मास एजुकेशन और लाइब्रेरी साइंस मंत्री गौरी शंकर घोष और राज्य मंत्री कौशिक चौधरी मौजूद थे. सलाहकार बोर्ड के सदस्य और गिल्ड की ओर से आए लोग भी बैठक में शामिल हुए.

सूत्रों के मुताबिक, विवाद की शुरुआत गिल्ड के एक विज्ञापन से हुई. इसमें 2027 के मेले में स्टॉल लगाने के लिए प्रकाशकों, किताब बेचने वालों और छोटी पत्रिकाओं से आवेदन मांगे गए थे. विज्ञापन में आवेदन करने की आखिरी तारीख 30 सितंबर 2026 रखी गई थी. सलाहकार बोर्ड के सदस्यों का कहना था कि यह विज्ञापन जारी करने से पहले उनसे इस बारे में कोई बात नहीं की गई थी.

बोर्ड के एक सदस्य ने बताया, "इस फैसले की हमें कोई जानकारी नहीं दी गई. गिल्ड ने हमसे बिना पूछे ही विज्ञापन जारी कर दिया''. हालांकि गिल्ड का कहना है कि हर फैसले की जानकारी बोर्ड को देना जरूरी नहीं है. उसके मुताबिक, बोर्ड का काम सिर्फ 'सलाह देना' है.

कोलकाता बुक फेयर पिछले 50 साल से आयोजित हो रहा है (फाइल फोटो)
कोलकाता बुक फेयर पिछले 50 साल से आयोजित हो रहा है (फाइल फोटो)

बैठक में इस बात को लेकर दोनों पक्षों के बीच काफी देर तक बहस हुई. पहले मामला सिर्फ इस बात का था कि काम सही तरीके से और तय नियमों के अनुसार हुआ था या नहीं लेकिन बाद में यह विवाद गिल्ड और नए एडवाइजरी बोर्ड के काम और अधिकारों को लेकर बड़ा हो गया.

मामला इतना बढ़ गया कि सुब्रत गुप्ता को बीच में आकर दोनों पक्षों को शांत कराना पड़ा. लेकिन विवाद सिर्फ स्टॉल देने तक नहीं रहा. 2027 के मेले के लिए किस देश को थीम कंट्री बनाया जाए, यह भी एक बड़ा मुद्दा बन गया. अभी तक सरकार की ओर से इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है. लेकिन सोशल मीडिया पर चर्चा है कि इजरायल को थीम कंट्री बनाया जा सकता है.

इजरायल को थीम कंट्री बनाए जाने की खबर को लेकर बंगाल के साहित्य और प्रकाशन से जुड़े कुछ लोग पहले से ही चिंतित हैं. इसकी एक वजह गाजा में इजरायल की चल रही लड़ाई और फिलिस्तीनियों की मौत को लेकर लगाए गए आरोप हैं. गिल्ड के कुछ लोग भी इजरायल को थीम कंट्री बनाने के खिलाफ बताए जा रहे हैं.

एडवाइजरी कमेटी में गिल्ड की ओर से शामिल देबज्योति दत्ता ने बैठक में पूछा कि इजरायल को थीम कंट्री बनाने का फैसला कब और क्यों लिया गया. उन्होंने यह भी पूछा कि इजरायल को थीम कंट्री बनाने के बारे में फैसला कैसे लिया गया. गिल्ड चाहता है कि इजरायल की जगह भारत को थीम कंट्री बनाया जाए.

गिल्ड की इस मांग की एक खास वजह है. मेले के 25वें संस्करण में भारत थीम कंट्री था, और अब 2027 में इसका 50वां संस्करण होने वाला है. गिल्ड का कहना है कि ऐसे में भारत को फिर से थीम कंट्री बनाया जाना चाहिए. इससे मेले का आयोजन करना भी आसान होगा.

गिल्ड के एक सदस्य ने बताया, "2027 में मेले का 50वां संस्करण होगा. हमारा मानना है कि भारत को फिर से थीम कंट्री बनाया जाना चाहिए. 25वें संस्करण में भी भारत थीम कंट्री था. इसी वजह से 50वें संस्करण में भी भारत को थीम कंट्री बनाना सही रहेगा."

उन्होंने आगे बताया, "इसके अलावा, नेशनल बुक ट्रस्ट और ईस्टर्न जोनल कल्चरल सेंटर भी मेले के आयोजन में हमारे साथ काम कर सकते हैं. ऐसे में भारत को थीम कंट्री बनाने से मेले की तैयारी और आयोजन करना काफी आसान हो जाएगा."

हालांकि, बैठक में मौजूद लोगों के मुताबिक, इजरायल को थीम कंट्री बनाने को लेकर गिल्ड के सवालों का कोई साफ जवाब नहीं मिला.

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. अब सवाल है कि बंगाल की बदली राजनीतिक स्थिति में कोलकाता इंटरनेशनल बुक फेयर का आयोजन कौन करेगा और इसे कौन संभालेगा? गिल्ड 1976 से इस मेले का आयोजन करता आ रहा है. इतने सालों में गिल्ड की पहचान इस मेले से जुड़ गई है. खासकर ममता बनर्जी के 15 साल के शासन के दौरान गिल्ड के राज्य सरकार के साथ अच्छे संबंध रहे लेकिन इस साल बंगाल में BJP के सत्ता में आने के बाद हालात बदल गए.

2027 के मेले की तैयारी में मदद करने और इसे लेकर सलाह देने के लिए राज्य सरकार ने एक नया एडवाइजरी बोर्ड बनाया है. इस बोर्ड में अलग-अलग क्षेत्रों और संगठनों से जुड़े लोग शामिल हैं. इसके 24 सदस्यों में रामकृष्ण मिशन के स्वामी आर्यानंद, भारत सेवाश्रम संघ के स्वामी सरस्वतानंद और BJP के नेता तनुजा चक्रवर्ती, देबजीत सरकार, सप्तर्षि चौधरी और ओफेलिया सिंह शामिल हैं. पत्रकार प्रसेनजीत बख्शी को इस बोर्ड का प्रमुख बनाया गया है.

कमेटी में गिल्ड की ओर से देबज्योति दत्ता, अनिल आचार्य और मिलिंद डे शामिल हैं. हालांकि, गिल्ड के अध्यक्ष सुधांशु शेखर डे और जनरल सेक्रेटरी त्रिदिब कुमार चट्टोपाध्याय को काम में गड़बड़ी के आरोपों के बीच कमेटी में शामिल नहीं किया गया. इसके बावजूद दोनों 10 सितंबर की बैठक में मौजूद थे.

एडवाइजरी कमेटी का कहना है कि मेले की तैयारी और आयोजन का काम खुलकर होना चाहिए. मेले के अलग-अलग कामों के ठेके देने में भेदभाव करने और अपने लोगों को फायदा देने के आरोप भी लगे हैं. इनमें स्टॉल बनाने और बिजली की व्यवस्था जैसे काम शामिल हैं. कमेटी चाहती है कि ठेके देने से लेकर बाकी सभी कामों की पूरी प्रक्रिया सबके सामने हो और सही तरीके से की जाए.

हालांकि गिल्ड के लिए यह मामला सिर्फ अलग-अलग ठेकों या मेले की तैयारी तक सीमित नहीं है. उसे डर है कि आगे चलकर एडवाइजरी कमेटी बनाने का मकसद उसे इसी मेले के आयोजन से हटाना हो सकता है. गिल्ड करीब 50 साल से इस मेले का आयोजन करता आ रहा है.

इस पूरे मामले में एक कानूनी मामला भी जुड़ा हुआ है, जिसकी वजह से गिल्ड को मेले के आयोजन से हटाना आसान नहीं होगा. गिल्ड से जुड़े एक व्यक्ति ने बताया, "एडवाइजरी बोर्ड जिस जरूरी बात को नजरअंदाज कर रहा है, वह यह है कि 'कोलकाता इंटरनेशनल बुक फेयर' नाम और इसके लोगो का कॉपीराइट गिल्ड के पास है. अगर वे गिल्ड को मेले से हटाना चाहते हैं या मेला उससे लेना चाहते हैं तो उन्हें यह भी देखना होगा कि इसके बाद वे मेले के नाम और लोगो का इस्तेमाल कैसे कर पाएंगे."

अगर यह विवाद आगे चलकर और बढ़ता है, तो गिल्ड का यह दावा काम आ सकता है. अभी कोलकाता इंटरनेशनल बुक फेयर को लेकर दो संस्थाओं के बीच अपने अधिकार को लेकर खींचतान चल रही है. एक तरफ गिल्ड है, जो 1976 से इस मेले का आयोजन करता आ रहा है और इसे संभालता रहा है. दूसरी तरफ राज्य सरकार की ओर से बनाया गया एडवाइजरी बोर्ड है. यह बोर्ड इस साल बंगाल में हुए बड़े राजनीतिक बदलाव के बाद बनाया गया है.

और जब मेले के 50वें संस्करण में पांच महीने से भी कम समय बचा है, तब यह विवाद अब सिर्फ इस बात का नहीं रह गया है कि मेले का आयोजन कौन करेगा. अब सवाल यह भी है कि कोलकाता इंटरनेशनल बुक फेयर की पहचान कैसी होगी और बंगाल की सबसे मशहूर सांस्कृतिक संस्थाओं में से एक का भविष्य कौन तय करेगा.

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