
केरल विधानसभा ने हाल ही में वरिष्ठ नागरिक (देखभाल और अधिकारों का संरक्षण) विधेयक, 2026 को सर्वसम्मति से पारित किया. इस विधेयक का मुख्य जोर ‘सिल्वर इकोनॉमी’ (बुजुर्गों की जरूरतों से जुड़ी अर्थव्यवस्था) को बढ़ावा देने और बुजुर्गों की उपेक्षा व शोषण रोकने पर है.
सामाजिक रूप से जागरूक और उच्च साक्षरता वाला राज्य होने के बावजूद केरल बुजुर्गों के अनुकूल नहीं रहा है. पिछले सात दशकों में राज्य ने सामाजिक सूचकांकों पर तो अच्छी प्रगति की लेकिन आर्थिक मोर्चे पर पिछड़ गया.
हालांकि विदेशों में रहने वाले केरलवासियों से मिलने वाली रकम से राज्य की अर्थव्यवस्था को सहारा मिलता रहा है. अनुमान है कि करीब 22 लाख प्रवासी केरलवासी (NRK) हर साल 2.16 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा अपने घर भेजते हैं. इसके अलावा राज्य के हजारों छात्र विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं और उन देशों में अस्थाई नौकरियां भी कर रहे हैं.
केरल की आबादी 3.6 करोड़ से ज्यादा है. यह देश के उन राज्यों में शामिल है जहां आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है. यहां भारत की सबसे अधिक जीवन प्रत्याशाओं में से एक है. राज्य में औसत जीवन प्रत्याशा 75.1 साल है. कुछ अनुमानों के मुताबिक, 2031 तक 60 साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग राज्य की आबादी का करीब 21 फीसदी हो जाएंगे.
राज्य के आर्थिक और जनगणना संबंधी आंकड़ों के मुताबिक, पथनमथिट्टा जिले में बुजुर्गों की आबादी सबसे ज्यादा 17.9 फीसदी है. इसके बाद कोट्टायम में 15.9 फीसदी और अलप्पुझा में 15.2 फीसदी बुजुर्ग हैं. पथनमथिट्टा जिले में राज्य की सबसे कम जनसंख्या वृद्धि दर्ज की गई है. 2001 से 2011 के बीच यहां दस साल की जनसंख्या वृद्धि दर -3.12 फीसदी रही.

बुजुर्गों की बढ़ती आबादी का मतलब है कि सरकार की सामाजिक जिम्मेदारियां भी बढ़ेंगी. ऐसे में सवाल है कि वरिष्ठ नागरिक (देखभाल और अधिकारों का संरक्षण) विधेयक पारित होने से कितनी मदद मिलेगी? कोल्लम जिले के पुनालुर में रहने वाले 65 वर्षीय सेवानिवृत्त हाई स्कूल शिक्षक जस्टिन जॉर्ज के मुताबिक, "आंकड़े बताते हैं कि केरल में आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है. सरकार ने बुजुर्गों के हितों की रक्षा के प्रावधानों वाला विधेयक तो पेश किया है लेकिन इससे अकेले इस वर्ग की जटिल समस्याओं का पूरी तरह समाधान नहीं हो सकता."
जॉर्ज कहते हैं, "उन बेहद गरीब लोगों का क्या होगा जो बुढ़ापे में पहुंच चुके हैं और बदहाली का सामना कर रहे हैं? उनमें से कई ने अपने जीवनसाथी को खो दिया है या उन्हें उनके परिवारों ने छोड़ दिया है. उन्हें भोजन और चिकित्सा सुविधा मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी है. तभी यह पूरी कवायद सार्थक होगी."
केरल के बुजुर्गों के एक बड़े वर्ग को लगातार चिकित्सा देखभाल की जरूरत है. अध्ययनों से पता चला है कि उनमें उच्च रक्तचाप, मधुमेह और दूसरी पुरानी बीमारियां बड़े पैमाने पर मौजूद हैं. इसके अलावा, नजर और सुनने की क्षमता में कमी के साथ चलने-फिरने में होने वाली दिक्कतें भी बड़ी चुनौतियां हैं.
बुजुर्ग महिलाओं में बड़ी संख्या ऐसी विधवाओं की है जिनके पास आर्थिक सहारा नहीं है. पूर्व सूचना आयुक्त के. सुधाकरन ने इंडिया टुडे से कहा कि बुजुर्गों के कल्याण के लिए समय की मांग एक ‘सामूहिक प्रयास’ है. उन्होंने कहा, "सरकार को हर जिले में बुजुर्गों की देखभाल के केंद्र बनाने चाहिए और उन्हें बेहतर से बेहतर चिकित्सा सुविधाएं देनी चाहिए."
सिल्वर इकोनॉमी की बातों को महज शब्दों का प्रचार बताते हुए उन्होंने सवाल किया, "क्या सरकार 60 साल से अधिक उम्र के लोगों को कौशल विकास कार्यक्रमों में रोजगार देती है? क्या कंपनियां उन्हें नौकरी देती हैं? बुजुर्गों को संकट से बचाने के लिए जमीन पर ठोस काम करने की जरूरत है."
स्पष्ट है कि इस दिशा में जिन जरूरी कदमों की कमी है, वही सबसे अहम हैं. कानून बनाने या अभियान चलाने का कोई खास मतलब नहीं होगा, अगर समाज बुजुर्गों को सड़कों पर पहुंचने से नहीं रोक पाता. केरल का प्रमुख तीर्थस्थल गुरुवायुर इस समस्या का बड़ा उदाहरण है. यहां बड़ी संख्या में बुजुर्गों को उनके बच्चे छोड़ जाते हैं. पुलिस आमतौर पर इन लोगों को धर्मार्थ संस्थाओं की ओर से चलाए जा रहे बेसहारा लोगों के आश्रय गृहों में भेज देती है.
केरल के पूर्व मुख्य सचिव जीजी थॉमसन का मानना है कि नया कानून बुजुर्गों की देखभाल के लिए एक व्यवस्थित व्यवस्था तैयार करेगा. हालांकि उनके मुताबिक गरीब बुजुर्गों के लिए व्यापक और पर्याप्त धन से समर्थित सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत है.
थॉमसन कहते हैं, "किसी बुजुर्ग को शोषण से बचाने और यह सुनिश्चित करने में बुनियादी अंतर है कि उसके पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन, सिर छिपाने के लिए छत और दवाइयों तक पहुंच हो. इस कानून की असली कसौटी कोच्चि या तिरुवनंतपुरम के सुविधाओं से लैस वृद्धाश्रमों में मिलने वाली सेवाओं की गुणवत्ता नहीं होनी चाहिए. इसकी कसौटी केरल के किसी दूरदराज के गांव में रहने वाली 80 साल की गरीब विधवा की जिंदगी होनी चाहिए. सिर्फ गरीब होने की वजह से बुढ़ापा किसी सजा में नहीं बदलना चाहिए."

