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कश्मीर में मिला 2,000 साल पुराना परिसर बौद्ध इतिहास की किस कड़ी को जोड़ेगा?

उत्तर कश्मीर के जेहनपोरा में 2,000 साल पुराने बौद्ध परिसर की खुदाई जारी है. पुरातत्वविद् ह्वेनसांग के बताए स्तूप और राजा जुष्क के खोए नगर से जुड़े सुराग तलाश रहे हैं

जेहनपोरा में मिला 2000 हजार साल पुराना परिसर
अपडेटेड 16 सितंबर , 2026

लगातार दूसरे साल पुरातत्वविद उत्तर कश्मीर के बारामूला जिले के जेहनपोरा गांव में एक पुरास्थल की खुदाई कर रहे हैं. झेलम नदी के दाहिने किनारे स्थित करीब 2,000 साल पुराना यह बौद्ध स्तूप परिसर कुषाण काल का माना जाता है. 

यह पहली सदी ईस्वी का बताया जा रहा है और इसकी संरचना अर्धवृत्ताकार यानी एप्सिडल आकार की है.

शोधकर्ताओं का मानना है कि इस स्थल से 7वीं सदी के चीनी विद्वान ह्वेनसांग के उस भूले-बिसरे मठ और विशाल स्तूप के बारे में अहम सुराग मिल सकते हैं जिसका उन्होंने अपने यात्रा-वृत्तांत में जिक्र किया था. 

यह भी संभव है कि यहां कुषाण राजा जुष्क का वह खोया हुआ नगर हो जिसका अब तक पता नहीं चल सका है.

खुदाई का दूसरा चरण औपचारिक रूप से 29 अगस्त को शुरू हुआ. इससे पहले खुदाई का पहला चरण पिछले साल चला था. श्रीनगर स्थित कश्मीर विश्वविद्यालय और डिग्री कॉलेज, बारामूला के विद्वानों, शोधकर्ताओं और छात्रों की टीम इस स्थल पर दिन-रात काम कर रही है. 

अब तक करीब छह ट्रेंच खोदी जा चुकी हैं और स्तूप परिसर की नींव का पता चला है. इसका आकार करीब 20 मीटर x 20 मीटर माना जा रहा है.

कश्मीर विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ सेंट्रल एशियन स्टडीज में असिस्टेंट प्रोफेसर और जेहनपोरा की खुदाई के प्रभारी पुरातत्वविद डॉ. मोहम्मद अजमल शाह बताते हैं, "हम 2,000 साल पुरानी संरचना की खुदाई कर उसे सामने ला रहे हैं. इसकी दीवारें अब भी पूरी तरह सुरक्षित मिली हैं. इन्हें कंकड़-पत्थरों से बनाया गया है जो कुषाण काल की वास्तुकला की खासियत है."

14वीं शताब्दी में बनाई गई ह्वेनसांग की पेंटिंग
14वीं शताब्दी में बनाई गई ह्वेनसांग की पेंटिंग

डॉ. शाह के मुताबिक, "कुषाणों ने पहली से चौथी सदी ईस्वी के बीच 300 साल से ज्यादा समय तक कश्मीर पर शासन किया और वे मुख्य रूप से बौद्ध थे. इस स्थल से मिले मिट्टी के बर्तन और दूसरी कलाकृतियां भी इस बात की पुष्टि करती हैं कि यह परिसर कुषाण काल का है."

एक तस्वीर ने फिर जगाई दिलचस्पी

यह पहले से पता था कि जेहनपोरा के टीलों, जिन्हें पहले स्तूप के टीले कहा जाता था, के नीचे प्राचीन संरचनाएं मौजूद हैं. हालांकि उनकी सही उम्र स्पष्ट नहीं थी. मौजूदा खुदाई से अब यह स्थापित हो गया है कि ये करीब 2,000 साल पुराने हैं.

कश्मीर में कुषाण संस्कृति पर पीएचडी कर चुके डॉ. शाह अपने शोध और छात्रों के साथ फील्ड ट्रिप के दौरान इन टीलों का कई बार दौरा कर चुके थे. उनकी दिलचस्पी तब और बढ़ी, जब पेरिस के गिमे म्यूजियम की एक यात्रा के दौरान उन्हें करीब 100 साल पुरानी एक तस्वीर मिली. तस्वीर के पीछे लिखा था, "स्तूपा ड्यून्स, बारामूला."

डॉ. शाह ने इंडिया टुडे को बताया, "मैंने तुरंत पहचान लिया कि यह जेहनपोरा है." कश्मीर लौटने के बाद उन्होंने यह मामला जम्मू-कश्मीर के आर्काइव्स, आर्कियोलॉजी एंड म्यूजियम के निदेशक कुलदीप कृष्ण सिधा के सामने रखा. सिधा ने इस स्थल की पुरातात्विक और सांस्कृतिक अहमियत को समझा और इसकी पहचान की.

पिछले साल अक्टूबर में कश्मीर विश्वविद्यालय और आर्काइव्स, आर्कियोलॉजी एंड म्यूजियम विभाग के बीच खुदाई में सहयोग के लिए एक समझौता हुआ. इसके बाद नवंबर में खुदाई का पहला चरण शुरू हुआ.

दरअसल, दिसंबर 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में ‘फ्रांसीसी म्यूजियम में मौजूद दुर्लभ तस्वीरों’ का जिक्र किया था. उन्होंने कहा था कि इन तस्वीरों ने "शोधकर्ताओं को कड़ियों को जोड़ने और जेहनपोरा स्थल की ऐतिहासिक अहमियत की पुष्टि करने में मदद की." 

मोदी ने कहा था कि इस पुरास्थल की खोज ने 2,000 साल पुराने कश्मीर के गौरवशाली अतीत की एक खिड़की खोल दी है.

मोदी ने अपने कार्यक्रम में कहा था, "जम्मू-कश्मीर के बारामूला में जेहनपोरा नाम की एक जगह है. वहां लोग सालों से कुछ ऊंचे टीले देखते आ रहे थे. इन टीलों का वैज्ञानिक अध्ययन शुरू किया गया. पता चला कि ये टीले इंसानों द्वारा बनाई गई एक बड़ी संरचना के अवशेष हैं."

सिधा ने इंडिया टुडे से कहा, "जेहनपोरा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे हमें प्राचीन कश्मीर के बारे में सिर्फ लिखित स्रोतों पर निर्भर रहने के बजाय वैज्ञानिक पुरातत्व के जरिए इस क्षेत्र के भौतिक इतिहास को सामने लाने का मौका मिलता है. यह स्थल शुरुआती ऐतिहासिक काल/कुषाण काल के एक बड़े बौद्ध परिसर के रूप में सामने आ रहा है. यह कश्मीर के उत्तर-पश्चिमी प्रवेश मार्ग पर रणनीतिक रूप से स्थित था और इसका संबंध गांधार तथा मध्य एशिया से था."

ह्वेनसांग का 'पत्थर का दरवाजा'

करीब 1923-24 में तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य के पुरातत्व विभाग ने जेहनपोरा में सीमित खुदाई कराई थी. हालांकि यह काम ज्यादा समय तक नहीं चला और इसके बारे में विस्तृत रिपोर्ट के बजाय सिर्फ एक संक्षिप्त नोट तैयार हुआ. 

यही वजह है कि बाद के शोधकर्ताओं के पास इस स्थल को समझने के लिए पर्याप्त जानकारी नहीं थी.

जेहनपोरा का स्थल पुराने झेलम घाटी मार्ग पर स्थित है. यह मार्ग कभी कश्मीर घाटी में उत्तर-पश्चिम से आने का एक अहम रास्ता था. आगे की खुदाई से पता चल सकता है कि यह स्थल आगे की खुदाई से पता चल सकता है कि यह स्थल किसी बड़े बौद्ध सांस्कृतिक और संपर्क नेटवर्क का हिस्सा था या नहीं. विभाजन से पहले लाहौर से आने वाले ब्रिटिश यात्रियों ने भी इन टीलों की तस्वीरें खींची थीं.

प्रसिद्ध चीनी बौद्ध भिक्षु, विद्वान और यात्री ह्वेनसांग, जिन्हें श्वनजांग के नाम से भी जाना जाता है, 7वीं सदी ईस्वी में कर्कोटा वंश के राजा दुर्लभवर्धन के शासनकाल में कश्मीर घाटी पहुंचे थे. 

अपने यात्रा-वृत्तांत 'सी-यू-की' यानी 'रिकॉर्ड्स ऑफ द वेस्टर्न रीजन' में ह्वेनसांग ने कश्मीर पहुंचने से पहले कठिन पहाड़ों और गहरी खाइयों को पार करने का जिक्र किया है. इसके बाद वे एक ऐसे ‘पत्थर के दरवाजे’ तक पहुंचे जो आज के बारामूला के पास राज्य के पश्चिमी प्रवेश द्वार के तौर पर जाना जाता था.

डॉ. शाह बताते हैं, "जेहनपोरा पुराने झेलम घाटी मार्ग पर स्थित है. आधुनिक सड़क बनने से पहले यात्री नदी के बाएं किनारे से होकर इस मार्ग का इस्तेमाल करते थे. इसलिए हम ह्वेनसांग के विवरण को ध्यान में रखते हुए भी इस स्थल का अध्ययन कर रहे हैं."

डॉ. शाह के मुताबिक, "ह्वेनसांग ने बारामूला में प्रवेश के रास्ते में एक विशाल स्तूप का जिक्र किया है. उन्होंने 'हुश्कारा' (हु-से-किया-लो) नाम की जगह पर एक बौद्ध मठ में एक रात बिताई थी. इसे अब बारामूला में झेलम के बाएं किनारे पर स्थित उश्कारा गांव के तौर पर पहचाना जाता है. वह करीब दो साल तक कश्मीर में रहे और बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन किया. उन्होंने इस क्षेत्र, यहां के लोगों, संस्कृति और धर्म से जुड़ी कई बातें दर्ज कीं."

खुदाई से क्या पता चला

खुदाई के पहले चरण में बस्ती से जुड़ी संरचनाएं, मिट्टी के बर्तन, धातु की वस्तुएं, कंकड़-पत्थरों से बनी दीवार और मानव अवशेष मिले थे. इन खोजों से यहां मठ से जुड़े अवशेष और प्राचीन सांस्कृतिक परतों के शुरुआती प्रमाण मिले.

सिधा कहते हैं, "ये अलग-अलग मिली हुई कलाकृतियां नहीं हैं. इनका पुरातात्विक संदर्भ और स्ट्रैटिग्राफी यह समझने में मदद कर सकती है कि यहां लोग कैसे रहते थे, पूजा कैसे करते थे, निर्माण कैसे करते थे, क्या उत्पादन करते थे और कश्मीर के बाहर के समुदायों के साथ उनका संपर्क कैसा था. पक्के ऐतिहासिक निष्कर्षों के लिए इनकी विस्तृत वैज्ञानिक जांच जरूरी होगी."

खुदाई के दूसरे चरण में टीम करीब 10 हेक्टेयर में फैले इस स्थल के उन हिस्सों पर ध्यान दे रही है, जहां अभी तक खुदाई नहीं हुई है. 1970 के दशक में बनी एक पावर कैनाल ने इस पूरे स्थल को जेहनपोरा 1 और जेहनपोरा 2, दो हिस्सों में बांट दिया है.

डॉ. शाह कहते हैं, "इस परिसर का ऊपरी ढांचा अब नहीं बचा है. संभवत: यह लकड़ी से बना था. हमें दो दर्जन से ज्यादा लोहे की कीलें मिली हैं. इनमें कुछ की लंबाई छह इंच और एक फुट तक है. इससे पता चलता है कि लकड़ी के ऊपरी ढांचे को लोहे से जोड़ा गया था. यह 2,000 साल पहले कुषाण काल में कश्मीर में लोहे के उन्नत इस्तेमाल को भी दिखाता है. उस समय यह क्षेत्र मध्य एशिया के साथ व्यापार करता था और सिंचाई की नहरें बनाता था. यहां से मनके भी मिले हैं. फिलहाल उनकी सामग्री की जांच की जा रही है."

जुष्क का खोया हुआ नगर

12वीं सदी के कश्मीरी इतिहासकार कल्हण ने अपनी पुस्तक 'राजतरंगिणी' में लिखा है कि तीन कुषाण राजाओं- हुष्क, जुष्क और कनिष्क ने अलग-अलग नगर बसाए थे. 

पुरातत्वविदों ने बारामूला के किनारे स्थित उश्कारा में हुष्क के नगर की पहचान कर ली है. यह स्थल अच्छी तरह संरक्षित है. कनिष्क का नगर बारामूला के बाहरी इलाके में कनिस्पोरा में मिला है हालांकि अब वहां वह संरचना सुरक्षित नहीं है. जुष्क का नगर अब तक नहीं मिला है.

डॉ. शाह कहते हैं, "संभव है कि हम राजा जुष्क द्वारा बसाए गए उस लापता नगर की खुदाई कर रहे हों जिसकी तलाश अब तक पूरी नहीं हुई है. खुदाई धीमी और बेहद मेहनत वाला काम है. जेहनपोरा का आकार देखते हुए इसे पूरी तरह खंगालने में 10 साल या उससे ज्यादा समय लग सकता है."

सिधा को उम्मीद है कि बड़े पैमाने पर खुदाई से कश्मीर के इतिहास में नए अध्याय जुड़ सकते हैं. इससे कश्मीर में बौद्ध धर्म के विकास, बस्तियों के स्वरूप, कुषाण काल की तकनीक और अर्थव्यवस्था तथा गांधार और मध्य एशिया के नेटवर्क में इस क्षेत्र की भूमिका के बारे में ठोस भौतिक प्रमाण मिल सकते हैं.

उन्होंने कहा, "अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं के लिए जेहनपोरा बौद्ध धर्म, लोगों, तकनीक और विचारों के कश्मीर-गांधार-मध्य एशिया गलियारे में आवागमन के अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ स्थल बन सकता है."

उन्होंने आगे कहा, "इसकी असली अहमियत वैज्ञानिक खुदाई को पूरा करने, पुरातात्विक परतों के संदर्भ को सुरक्षित रखने और मिली चीजों का अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों की मदद से विश्लेषण करने में होगी. इस लिहाज से यह काम सिर्फ स्मारकों को जमीन से बाहर निकालने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्राचीन दुनिया में कश्मीर की भूमिका के एक भूले हुए अध्याय को फिर से सामने लाने की कोशिश है."

खुदाई आगे बढ़ने के साथ जेहनपोरा स्थल का संरक्षण और लंबे समय तक उसे सुरक्षित रखना बड़ी चुनौती होगी. इसके ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व को देखते हुए इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भी जरूरत पड़ सकती है.

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