उत्तर प्रदेश के दो सबसे बड़े धार्मिक केंद्र, अयोध्या और वाराणसी, इन दिनों दान और सेवा की दो अलग लेकिन एक-दूसरे से जुड़ी कहानियों के कारण चर्चा में हैं. एक ओर अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी और उसके बाद शुरू हुई एसआईटी जांच ने मंदिरों में दान के प्रबंधन और पारदर्शिता पर बहस तेज कर दी है. दूसरी ओर वाराणसी के श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में तमिलनाडु की 80 वर्षीय महिला श्रद्धालु ने तीन करोड़ रुपए से अधिक का दान चेक के माध्यम से देकर और उसकी आधिकारिक रसीद पाकर यह संदेश दिया कि श्रद्धा के साथ-साथ पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.
यह महज बड़ी धनराशि का दान नहीं है बल्कि उस विश्वास का प्रदर्शन भी है जिसमें दानकर्ता चाहता है कि उसका योगदान पूरी तरह दर्ज हो, उसका आधिकारिक रिकॉर्ड बने और धन निर्धारित उद्देश्य पर ही खर्च हो. ऐसे समय में जब मंदिरों में आने वाले चढ़ावे की निगरानी और जवाबदेही पर सार्वजनिक चर्चा हो रही है, यह घटना अपने आप में एक बड़ा संकेत मानी जा रही है.
इसी दौरान अयोध्या से एक और सकारात्मक खबर सामने आई है. शहर के पुराने शाही परिवार ने छह एकड़ भूमि कैंसर अस्पताल के निर्माण के लिए दान करने का फैसला किया है. इससे यह स्पष्ट होता है कि धार्मिक आस्था अब केवल मंदिर निर्माण या पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रह गई बल्कि स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा जैसी जरूरतों से भी जुड़ रही है.
काशी में दान की नई मिसाल, रसीद लेकर लौटीं श्रद्धालु
तमिलनाडु के कारोबारी परिवार से जुड़ी 80 वर्षीय महिला श्रद्धालु अपने पति और दोनों बेटों के निधन के बाद पूरी तरह धार्मिक जीवन की ओर मुड़ गईं. बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए वाराणसी पहुंचीं तो उन्होंने केवल पूजा-अर्चना ही नहीं की बल्कि मंदिर और उससे जुड़ी सेवाओं के लिए बड़ी धनराशि दान करने की इच्छा भी जताई. उन्होंने सबसे पहले वाराणसी के मंडलायुक्त एस. राजलिंगम से संपर्क किया. अधिकारियों के अनुसार, उन्हें सलाह दी गई कि वे राशि सीधे श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट को सौंप सकती हैं, लेकिन उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे प्रशासनिक अधिकारी की मौजूदगी में ही चेक देना चाहती हैं और दान की आधिकारिक रसीद प्राप्त करना चाहती हैं.
इसके बाद मंदिर ट्रस्ट के अधिकारियों को बुलाया गया और महिला ने उनके सामने कुल तीन करोड़ रुपए से अधिक के चेक सौंपे. उन्हें प्रत्येक दान की आधिकारिक रसीद भी जारी की गई. दान का उद्देश्य भी पूरी तरह तय था. उन्होंने मंदिर के अन्नक्षेत्र के लिए एक करोड़ रुपए दिए ताकि श्रद्धालुओं के लिए भोजन सेवा को मजबूत किया जा सके. अपने दिवंगत दोनों बेटों की स्मृति में एक-एक करोड़ रुपए का योगदान दिया गया; इसके अतिरिक्त अगले 25 वर्षों तक उनके नाम से प्रतिवर्ष होने वाले रुद्राभिषेक के लिए भी अलग धनराशि उपलब्ध कराई गई.
महिला ने मंदिर प्रशासन से यह भी अनुरोध किया कि उनके परिवार और मूल जिले की पहचान सार्वजनिक न की जाए. पूजा-अर्चना के बाद उन्होंने अपने पति और दोनों पुत्रों की आत्मा की शांति के लिए विशेष प्रार्थना की और फिर वाराणसी से लौट गईं. अधिकारियों का कहना है कि हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश के किसी बड़े मंदिर में चेक के माध्यम से दिया गया यह सबसे बड़े दानों में शामिल है. खास बात यह भी रही कि पूरी प्रक्रिया दस्तावेजों और आधिकारिक रसीदों के साथ पूरी हुई.
बढ़ता चढ़ावा बता रहा काशी विश्वनाथ धाम की बदलती तस्वीर
श्रीकाशी विश्वनाथ धाम के नव्य-भव्य स्वरूप के बाद मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं और चढ़ावे, दोनों में खासी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. कॉरिडोर बनने से पहले मंदिर को सालभर में लगभग 20 करोड़ रुपए का दान मिलता था. लेकिन धाम के विस्तार और सुविधाओं में सुधार के बाद यह आंकड़ा तेजी से बढ़ा. वित्तीय वर्ष 2023-24 में मंदिर को लगभग 84 करोड़ रुपए का चढ़ावा मिला जो पुराने समय की तुलना में चार गुना से भी अधिक है. चालू वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के बीच भी यह वृद्धि जारी रही.
पिछले वर्ष इसी अवधि में जहां लगभग 21.50 करोड़ रुपए का दान मिला था वहीं इस बार यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 32 करोड़ रुपए तक पहुंच गया. यानी केवल तीन महीनों में करीब 10 करोड़ रुपए की अतिरिक्त धनराशि मंदिर को प्राप्त हुई. दान के स्वरूप में भी बदलाव दिखाई दे रहा है. अब श्रद्धालु केवल नकद या आभूषण ही नहीं, बल्कि चेक, बैंकिंग माध्यमों और अचल संपत्ति तक का दान कर रहे हैं. इससे मंदिर प्रशासन के सामने वित्तीय प्रबंधन और पारदर्शिता की जिम्मेदारी भी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है.
हाल ही में उद्योगपति मुकेश अंबानी के बेटे और रिलायंस जियो के चेयरमैन आकाश अंबानी ने भी मंदिर को एक करोड़ रुपए का चेक दान किया था. अब तमिलनाडु की बुजुर्ग महिला का तीन करोड़ रुपए से अधिक का योगदान इस सूची में नया महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ता है. राम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे के प्रबंधन को लेकर उठे सवालों के बीच काशी विश्वनाथ में चेक और रसीद आधारित दान व्यवस्था की चर्चा स्वाभाविक रूप से अधिक हो रही है. विशेषज्ञ मानते हैं कि जैसे-जैसे मंदिरों की आय बढ़ेगी, वैसे-वैसे दान की पूरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, डिजिटल और जवाबदेह बनाना भी आवश्यक होगा.
अयोध्या में जमीन का दान, सेवा के नए मॉडल की ओर बढ़ते कदम
अयोध्या में दान की दूसरी बड़ी कहानी स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी है. शहर के पुराने शाही परिवार ने छह एकड़ जमीन दान देकर 150 बेड के मल्टी-स्पेशियलिटी कैंसर अस्पताल और इंस्टीट्यूट की स्थापना का रास्ता खोल दिया है. यह अस्पताल नमो कैंसर केयर फाउंडेशन और अयोध्या कैंसर केयर फाउंडेशन के सहयोग से विकसित किया जाएगा. जमीन दर्शन नगर क्षेत्र में स्थित है और 29 जुलाई, गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गिफ्ट डीड के माध्यम से औपचारिक रूप से फाउंडेशन को हस्तांतरित की जाएगी.
यह दान श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के स्थाई सदस्य और अयोध्या के पूर्व शाही परिवार के सदस्य रहे राजा बिमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र की स्मृति में किया जा रहा है, जिनका पिछले वर्ष अगस्त में निधन हुआ था. परिवार के अनुसार यह पूरी जमीन किसी भी कानूनी विवाद या वित्तीय बोझ से मुक्त है. बिमलेंद्र मिश्र के बेटे यतींद्र मोहन प्रताप मिश्र और उनके भाई शैलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र इसके हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी करेंगे.
योजना के अनुसार भूमि हस्तांतरण के तीन महीने के भीतर अस्पताल की आधारशिला रखी जाएगी और लगभग दो वर्षों में परियोजना पूरी करने का लक्ष्य है. यतींद्र मोहन प्रताप मिश्र का कहना है कि यह अस्पताल उनके पिता के जीवन मूल्यों, दया, सेवा और जरूरतमंदों की सहायता की भावना को समर्पित होगा. उनका मानना है कि अवध क्षेत्र के कैंसर मरीजों को इलाज के लिए लखनऊ, दिल्ली या अन्य महानगरों की ओर नहीं जाना पड़े, इसी उद्देश्य से यह परियोजना शुरू की जा रही है. अयोध्या-अंबेडकर नगर मार्ग पर स्थित यह अस्पताल केवल अयोध्या तक सीमित नहीं रहेगा. इससे गोंडा, बहराइच, बलरामपुर, बस्ती, श्रावस्ती, सुल्तानपुर, अंबेडकर नगर और प्रतापगढ़ जैसे जिलों के हजारों मरीजों को लाभ मिलने की उम्मीद है.
आने वाले समय में मंदिरों की विश्वसनीयता केवल मिलने वाले चढ़ावे की राशि से नहीं बल्कि उसके पारदर्शी प्रबंधन, सार्वजनिक जवाबदेही और समाजहित में उपयोग से तय होगी. यही वह कसौटी होगी जिस पर देश के बड़े धार्मिक संस्थानों की साख और श्रद्धालुओं का विश्वास दोनों टिके रहेंगे.

