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डायमंड सिटी की डूबता सच: आखिर हर मानसून क्यों थम जाती है सूरत की रफ्तार?

पिछले दिनों सूरत में 24 घंटे के भीतर 358 मिमी बारिश दर्ज की गई जो शहर के इतिहास में एक दिन में हुई सबसे ज्यादा बारिश थी. जुलाई के महीने में सूरत दो बार बाढ़ की चपेट में आ चुका है

सूरत में बाढ़ ने मचाई तबाही
सूरत में बाढ़ ने मचाई तबाही
अपडेटेड 29 जुलाई , 2026

सूरत गुजरात के व्यस्ततम शहरों में एक है. दुनिया के लगभग सभी हीरे यहां पॉलिश होते हैं. यह शहर भारत के सबसे बड़े कपड़ा कारोबार का प्रमुख केंद्र भी है. इस महीने वही सूरत दो बार बाढ़ की चपेट में आ गया. पहली बार रिकॉर्ड बारिश ने शहर को डुबो दिया जबकि दूसरी बार सामान्य बारिश में भी शहर खुद को संभाल न सका.

8 जुलाई की सुबह तक सूरत में 24 घंटे के भीतर 358 मिमी बारिश दर्ज की गई. यह शहर के इतिहास में एक दिन में हुई सबसे ज्यादा बारिश थी. यह लगभग उतनी ही बारिश है, जितनी सूरत में आमतौर पर पूरे जुलाई महीने में होती है. नगर आयुक्त एम. नागराजन ने मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में बताया कि उस एक सप्ताह में सूरत में पूरे मानसून की लगभग 30 फीसद बारिश हुई थी.  

नौ दिन बाद, सिर्फ सामान्य बारिश से ही सूरत के सबसे आधुनिक और पॉश इलाकों जैसे वेसू, न्यू सिटी लाइट और अलथान की सड़कें पानी में डूब गईं. 20 जुलाई को सामान्य बारिश के साथ समुद्र में हाई टाइड (उच्च ज्वार) आ गया और बाढ़ का पानी शहर के कम से कम 34 निचले इलाकों में घुस गया.

24 जुलाई को स्कूलों को फिर बंद करना पड़ा और 25 जुलाई तक लोग कई इलाकों में घुटनों तक पानी से भरी गलियों से होकर आने-जाने को मजबूर थे. तब तक सूरत में पूरे मानसून के औसत का करीब 93 प्रतिशत पानी बरस चुका था जबकि पूरे गुजरात में यह आंकड़ा लगभग 52 प्रतिशत ही था. 

8 जुलाई की बाढ़ ने सूरत में भारी तबाही मचाई. सूरत के कलेक्टर तेजस परमार के मुताबिक इस आपदा में कम से कम 26 लोगों की मौत हुई. इनमें बिजली का करंट लगने, डूबने, आकाशीय बिजली गिरने और पेड़ गिरने जैसी घटनाएं शामिल थीं. सूरत नगर निगम ने शहर के 187 स्थानों पर जलभराव दर्ज किया. नगर आयुक्त नागराजन के मुताबिक, 3,600 लोगों को बचाया गया और 4,100 लोगों को राहत शिविरों में पहुंचाया गया. दो नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फोर्स (NDRF) और पांच स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फोर्स (SDRF) की टीमें अब भी तैनात हैं.

अब तक नुकसान की कोई आधिकारिक सर्वे रिपोर्ट जारी नहीं की गई है. कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT), गुजरात के अध्यक्ष प्रमोद भगत ने उपमुख्यमंत्री हर्ष सांघवी और कलेक्टर तेजस परमार से नुकसान का आकलन कराने की मांग की है. 

उनके मुताबिक, 1,000 से ज्यादा व्यापारियों को नुकसान हुआ है. उन्होंने वराछा रोड पर पोद्दार प्लाजा मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स मार्केट में करीब 200 करोड़ रुपये और टेक्सटाइल उद्योग में भी लगभग 200 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान लगाया है. भटेना, उधना, लिंबायत और गोडादरा के घनी आबादी वाले रिहायशी और व्यावसायिक इलाके में 1,000 से ज्यादा दुकानें और गोदाम पानी में डूब गए.

सचिन जीआइडीसी, सूरत के सचिन कस्बे में एक बड़ा और प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र है, जिसका मैनेजमेंट गुजरात औद्योगिक विकास निगम (जीआइडीसी) के जरिए किया जाता है. इस इलाके में जिन कारोबारियों की मशीनें और सामान बर्बाद हुए, उन्होंने खराब ड्रेनेज और प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया है. 

जलजमाव को लेकर व्यापारी काफी ज्यादा नाराज हैं. वराछा रोड पर यश प्लाजा कॉम्प्लेक्स के महेश गढ़िया ने मीडिया से कहा, "इस इलाके की सभी दुकानें पानी में डूब गई हैं और मेरे जैसे कारोबारी भारी नुकसान झेल रहे हैं."

बाढ़ की वजह से जनजीवन पूरी तरह ठप हो गया. स्कूल, कॉलेज और आंगनवाड़ी बंद कर दिए गए और बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम की सेवाएं रोक दी गईं. लोग रेलवे स्टेशन के अंडरपास से पानी में होकर गुजरते दिखे और लिंबायत में दोपहिया वाहन पूरी तरह पानी में डूब गए. वहां फायर ब्रिगेड और बचाव दल नावों के जरिए पहुंचे. 

दक्षिण गुजरात के अन्य इलाकों में भी भारी बारिश हुई. कलेक्टर परमार ने बताया कि पलसाना और कामरेज तालुकों में सबसे ज्यादा बारिश दर्ज की गई. नवसारी के एक गांव से NDRF ने 67 लोगों को बचाया. हालांकि, घनी आबादी और निचले इलाके में जलजमाव का सबसे ज्यादा असर देखने को मिला.  

हर बार ऐसी घटना के बाद लोगों के मन में यही सवाल उठता है कि ऐसी स्थिति हर मानसून में क्यों आ जाती है और इसका स्थायी समाधान क्यों नहीं निकलता?

इसका जवाब शहर की जल निकासी व्यवस्था के डिजाइन में छिपा है. भारत के ज्यादातर शहरों की स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज प्रणाली एक घंटे में 12 से 20 मिमी बारिश का पानी निकालने के हिसाब से बनाई गई है जबकि आज के दौर में होने वाली तेज बारिश इससे कई गुना ज्यादा होती है. हालांकि, सूरत की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी खाड़ियों यानी नालियों (Creeks) का नेटवर्क है जो पूरे शहर का पानी निकालता है.

जब कांकरा खाड़ी में पानी भर जाता है तो उसका पानी वापस माठी खाड़ी में पहुंचता है और लिंबायत के घरों में घुस जाता है. कोयली खाड़ी के कुछ हिस्सों को पूरी तरह कंक्रीट से ढका जा रहा है, जिससे उसकी प्राकृतिक जल निकासी क्षमता कम हो रही है. वहीं, मानसून से पहले इन नालियों से निकाली गई गाद को किनारों पर ही छोड़ दिया जाता है जो पहली तेज बारिश में फिर से खाड़ी में बहकर पहुंच जाती है.

इसके अलावा सूरत में जलभराव के लिए भौगोलिक स्थिति भी एक बड़ी वजह है. सूरत तापी नदी के मुहाने पर बसा है. यहां हाई टाइड आने पर पानी का बाहर निकलने का रास्ता बंद हो जाता है. यही वजह थी कि 20 जुलाई को सामान्य बारिश भी बाढ़ में बदल गई.

इसमें कोई दो राय नहीं कि शहर की टाउन प्लानिंग योजनाएं प्राकृतिक ढलानों को ध्यान में रखे बिना बनाई गईं. कई खाड़ियों को पाट दिया गया और कोस्टल रेगुलेशन का भी ठीक से पालन नहीं किया गया. सिटिजन एक्सपर्ट्स ग्रुप्स ने 2024 में 'हूज फॉल्ट, हूज सीन, हूज कोस्ट?' और 2025 में 'इनवाइट डिजास्टर: खादी फ्लड इन सूरत' नाम की दो रिपोर्टों में इन समस्याओं का उल्लेख किया था. हालांकि, इन रिपोर्ट्स के जरिए हालात की सच्चाई सामने आने के बाद भी सरकारी स्तर पर कोई योजना नहीं बनाई गई.

इतिहास देखें तो 1700 के दशक से अब तक सूरत में लगभग 20 बड़ी बाढ़ आ चुकी हैं. इनमें 2002 और 2006 की बाढ़ प्रमुख थीं. हालांकि, हाल के वर्षों में स्थिति और गंभीर हुई है. 2024 और फिर जून 2025 में भी लगातार मानसून के दौरान सूरत में बाढ़ आई थी.

इससे पहले अगस्त 2006 में सूरत सबसे भीषण बाढ़ की चपेट में आया था. उस समय तापी जिले में उकाई बांध से पानी छोड़े जाने के बाद शहर का 80 से 95 फीसद हिस्सा चार दिनों तक डूबा रहा. आधिकारिक तौर पर 120 से 150 लोगों की मौत बताई गई जबकि अनौपचारिक आंकड़े इससे कहीं ज्यादा थे.

बाढ़ की वजह से नुकसान का अनुमान 9,500 करोड़ रुपए से 21,000 करोड़ रुपए के बीच लगाया गया था. दो जांच रिपोर्टों ने इसे प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि कुप्रबंधन का नतीजा बताया. करीब 20 साल बाद राज्य सरकार ने 550 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की है. साथ ही मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने अलथान में कहा कि शहर में हाई टाइड से बार-बार आने वाली बाढ़ के स्थायी समाधान के लिए खाड़ियों के विकास पर 500 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे.

एक बार फिर सूरत के लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं. अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या बड़े बजट की ये घोषणाएं इस बार भी सिर्फ वादे बनकर रह जाएंगी या शहर को हर मानसून में डूबने से बचाने का वाकई स्थायी समाधान मिल सकेगा. 

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