
आसमान में उड़ने का सपना देखने वाले युवाओं के लिए पायलट की सीट तक पहुंचना सिर्फ जुनून नहीं बल्कि कई साल की मेहनत और परिवार की बड़ी आर्थिक कुर्बानी का नतीजा होता है.
लेकिन कानपुर में प्रशिक्षण विमान के लगातार दो हादसों ने इस सपने के सबसे अहम पड़ाव, फ्लाइंग ट्रेनिंग, की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
27 अगस्त की सुबह गंगा बैराज के पास नत्थापुरवा गांव में एक निजी कंपनी का टेक्नाम टेक्नो पी2006टी विमान उड़ान भरने के करीब 20 मिनट बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया. हादसे में प्रशिक्षक पायलट सचिन भाटिया और ट्रेनी पायलट अभिषेक पुजारी की मौत हो गई.
विमान ने सुबह 11:20 बजे कानपुर कैंट स्थित प्रशिक्षण केंद्र से उड़ान भरी थी. करीब 11:40 बजे नत्थापुरवा के ऊपर 300-400 फीट की ऊंचाई पर वह अचानक हवा में तिरछा हुआ और बाउंड्री तोड़ते हुए एक खाली प्लॉट में जा गिरा. ग्रामीण जब मौके पर पहुंचे तो एक पायलट विमान में फंसा था, जबकि दूसरा कुछ दूरी पर गंभीर रूप से घायल पड़ा था.
ग्रामीणों और पुलिस ने हंसिया से सीट बेल्ट काटकर विमान में फंसे पायलट को बाहर निकाला. दोनों को हैलट अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. हादसे के बाद महानिदेशालय, नागरिक उड्डयन यानी डीजीसीए ने जांच के आदेश दिए हैं. डीजीसीए ने पायलट का प्रशिक्षण प्रदान करने वाली कंपनी के दूसरे विमानों की उड़ानों पर भी अगले आदेश तक रोक लगा दी है.

क्या है सुरक्षा की गारंटी?
पायलट बनने का सपना महंगा है. कानपुर की कंपनी में प्रशिक्षण ले रहे युवाओं के सामने इसका उदाहरण साफ है. जिस टेक्नो पी2006टी विमान से हादसा हुआ, उसकी उड़ान के लिए प्रति घंटे करीब 47 हजार रुपए खर्च होते हैं.
प्रशिक्षण की कुल फीस लगभग 49.92 लाख रुपए है और सिर्फ रजिस्ट्रेशन के लिए 1.25 लाख रुपए देने पड़ते हैं. यानी परिवार अपने बच्चे को कॉकपिट तक पहुंचाने के लिए लाखों रुपए निवेश करता है. इसके बदले सबसे पहली उम्मीद यही होती है कि प्रशिक्षण के दौरान उसकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होगी.
कानपुर की कंपनी के कैंट स्थित प्रशिक्षण बेड़े में करीब 15-20 विमान बताए जाते हैं और लगभग 100 प्रशिक्षु पायलट प्रशिक्षण ले रहे हैं. यहां शुरुआती प्रशिक्षण के लिए सिंगल इंजन विमान इस्तेमाल होते हैं, जबकि कॉमर्शियल पायलट लाइसेंस यानी सीपीएल के अंतिम चरण में मल्टी-इंजन विमानों की ट्रेनिंग दी जाती है.
सेस्ना 152, सेस्ना 172 और डायमंड डीए 40 जैसे विमान शुरुआती प्रशिक्षण के लिए इस्तेमाल होते हैं. आगे चलकर प्रशिक्षुओं को डायमंड डीए 42, सेस्ना 310, पाइपर सेनेका और टेक्नो पी2006टी जैसे मल्टी-इंजन विमानों पर प्रशिक्षण दिया जाता है.

को खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह दो इंजन वाला हल्का विमान है और सीपीएल प्रशिक्षण में इसका इस्तेमाल किया जाता है.
इस चरण में प्रशिक्षु पायलटों को दो इंजन वाले विमान की जटिल प्रणालियों के साथ-साथ इंजन फेल होने जैसी आपात स्थितियों से निपटना सिखाया जाता है. ऐसे में इसी श्रेणी के विमान का हादसा प्रशिक्षण व्यवस्था की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा करता है.
एविएशन विशेषज्ञ अमित कुमार के मुताबिक किसी प्रशिक्षण विमान का दुर्घटनाग्रस्त होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि गलती विमान या प्रशिक्षण संस्था की थी. इसकी वास्तविक वजह डीजीसीए की जांच के बाद ही सामने आएगी. फिर भी हादसे की परिस्थितियां कई तकनीकी संभावनाओं की ओर इशारा करती हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार इंजन तक ईंधन की आपूर्ति बाधित होना, इंजन का बंद होना या विमान के किसी नियंत्रण तंत्र में तकनीकी खराबी हादसे की संभावित वजह हो सकती है. हालांकि यह केवल प्रारंभिक संभावना है, अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट से ही निकलेगा.
सबसे अहम सवाल यह है कि अगर विमान में कोई तकनीकी समस्या थी तो वह उड़ान से पहले की जांच में क्यों नहीं पकड़ी गई. और अगर तकनीकी खराबी नहीं थी तो महज 20 मिनट की उड़ान के बाद 300-400 फीट की ऊंचाई से विमान के अचानक तिरछे होकर गिरने की वजह क्या थी?
दो महीने में दो हादसे
करीब दो महीने पहले 27 जून को इसी प्रशिक्षण केंद्र में दो इंजन वाले विमान से जुड़ी दुर्घटना में दिल्ली की एक प्रशिक्षु पायलट गंभीर रूप से घायल हुई थीं. वह प्रशिक्षक के साथ प्रशिक्षण ले रही थीं. लैंडिंग के बाद इंजन बंद करने की प्रक्रिया के दौरान वह विमान से उतर रही थीं, तभी प्रोपेलर की चपेट में आ गईं और उनकी पीठ में चोट आई. उस घटना की जांच भी डीजीसीए कर रहा है.
बाद में विमान को फिट बताया गया था. लेकिन अब उसी विमान के 27 अगस्त के हादसे में प्रशिक्षक और प्रशिक्षु पायलट की मौत ने उस पुराने मामले को भी फिर चर्चा में ला दिया है.
जांच टीम ने हादसे के बाद एकेडमी पहुंचकर उड़ान से पहले की प्रारंभिक जांच, विमान की स्थिति और प्रशिक्षण प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल की है. कई लोगों के बयान लिए गए और मृत प्रशिक्षक के अनुभव से संबंधित दस्तावेज भी जुटाए गए.
यह भी देखा जा रहा है कि विमान के रखरखाव में तय मानकों का पालन हुआ था या नहीं और विदेश में निर्मित विमान में मेंटीनेंस के दौरान लगाए गए पुर्जों का रिकॉर्ड क्या था.
प्रशिक्षक सचिन भाटिया के पास करीब 3400 घंटे का उड़ान अनुभव बताया गया है. ऐसे में यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या दुर्घटना मानवीय चूक का परिणाम थी या अनुभवी पायलट के सामने ऐसी स्थिति पैदा हुई जिसे संभालना संभव नहीं था.
अमित कुमार कहते हैं, “प्रशिक्षण विमान में आपात स्थिति से निपटने की क्षमता का परीक्षण केवल पायलट के कौशल से नहीं होता. विमान की फिटनेस, इंजन, नियंत्रण प्रणाली, उपकरण, रनवे, मौसम, उड़ान से पहले की जांच और प्रशिक्षण प्रक्रिया, सभी कड़ियां बराबर महत्वपूर्ण हैं. इनमें से किसी एक कड़ी में चूक पूरी उड़ान को खतरे में डाल सकती है.”
डीजीसीए की जांच में प्री-फ्लाइट निरीक्षण, ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट, विमान के लॉगबुक, मेंटीनेंस रिकॉर्ड, इंजन की स्थिति और प्रशिक्षक-प्रशिक्षु की उड़ान संबंधी जानकारी की भी जांच महत्वपूर्ण होगी. प्रशिक्षण के दौरान आपातकालीन परिस्थितियों के लिए प्रशिक्षुओं को किस स्तर की तैयारी कराई जा रही थी, यह भी जांच का हिस्सा हो सकता है.
पी2006टी कैसे बना जानलेवा
इटली की टेक्नाम कंपनी का टेक्नो पी2006टी को दुनिया के सबसे हल्के प्रमाणित दो इंजन वाले नागरिक विमानों में गिना जाता है. इसकी खासियत कम वजन और कम परिचालन लागत है. विमान में रोटैक्स 912 सीरीज के दो इंजन लगे होते हैं और प्रत्येक इंजन करीब 100 हॉर्स पावर का होता है.
दोनों इंजन मिलकर करीब 34-38 लीटर प्रति घंटे ईंधन की खपत करते हैं. विमान एविएशन फ्यूल के साथ सीसा रहित पेट्रोल पर भी उड़ सकता है. करीब 260-270 किलोमीटर प्रति घंटे की क्रूज गति और लगभग 1200 से 1740 किलोमीटर की रेंज इसे प्रशिक्षण के लिए उपयोगी बनाती है.
इसमें जी1000 एनएक्सआई ग्लास कॉकपिट और ऑटोपायलट जैसी आधुनिक प्रणालियां भी हैं. दो इंजन होने की वजह से सामान्य परिस्थितियों में इसे सिंगल इंजन विमान से अधिक सुरक्षित माना जाता है. एक इंजन बंद होने पर दूसरा इंजन विमान को उड़ाने और सुरक्षित लैंडिंग में मदद कर सकता है. यही वजह है कि इस विमान का हादसा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है.
अगर दो इंजन वाला विमान उड़ान भरने के सिर्फ 20 मिनट बाद इतनी कम ऊंचाई पर दुर्घटनाग्रस्त होता है तो जांच में यह पता लगाना जरूरी होगा कि दोनों इंजन एक साथ प्रभावित हुए थे या विमान की नियंत्रण प्रणाली में कोई समस्या आई थी.
एविएशन विशेषज्ञों ने शुरुआती तौर पर ईंधन आपूर्ति बाधित होने या एयरफ्रेम/कंट्रोल सिस्टम में तकनीकी समस्या जैसी संभावनाओं का भी जिक्र किया है. लेकिन इन संभावनाओं को अभी कारण मानना उचित नहीं होगा. दुर्घटना के बाद विमान के मलबे, इंजन, ईंधन प्रणाली, कॉकपिट उपकरण और अन्य तकनीकी हिस्सों की फोरेंसिक जांच से ही तस्वीर साफ होगी.
विमान की एक और खासियत यह है कि इसमें पायलटों के लिए पैराशूट आधारित रेस्क्यू सिस्टम नहीं है. लिहाजा कम ऊंचाई पर अचानक तकनीकी समस्या पैदा होने पर पायलट के पास प्रतिक्रिया देने का समय बेहद सीमित हो सकता है.
नत्थापुरवा में विमान जिस ऊंचाई से गिरा, वहां किसी बड़े आपातकालीन बचाव विकल्प का इस्तेमाल कर पाना व्यावहारिक रूप से मुश्किल रहा होगा.
बढ़ते हादसे
कानपुर का हादसा देश में विमान दुर्घटनाओं की व्यापक तस्वीर से अलग नहीं है. एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2021 से अगस्त 2026 तक देश में 51 विमान दुर्घटनाएं दर्ज हुई हैं.
इस अवधि में 2021 में नौ, 2022 में 12, 2023 में 10, 2024 में छह, 2025 में आठ और अगस्त 2026 तक छह दुर्घटनाएं हुईं. यानी औसतन करीब हर 41 दिन में एक विमान दुर्घटना हुई. इनमें प्रशिक्षण विमानों की दुर्घटनाएं भी चिंता का विषय रही हैं.
2021 और 2022 के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रशिक्षण विमानों के क्रैश होने की घटनाएं दर्ज हुईं. इस साल भी कानपुर के हादसे से पहले बारामती में 28 जनवरी को लियरजेट 45 एक्सआर, विजयपुरा में 8 फरवरी को सेस्ना 172 और झारखंड के चतरा में 23 फरवरी को बीचक्राफ्ट किंग एयर सी90ए समेत अन्य हादसे हुए हैं.
इस साल अगस्त तक कानपुर को मिलाकर छह विमान दुर्घटनाएं हो चुकी हैं. इन आंकड़ों का मतलब यह नहीं कि हर प्रशिक्षण उड़ान असुरक्षित है. एविएशन दुनिया के सबसे अधिक विनियमित क्षेत्रों में से एक है और हजारों प्रशिक्षण उड़ानें बिना किसी घटना के पूरी होती हैं.
लेकिन प्रशिक्षण विमान हादसे का असर अलग होता है क्योंकि कॉकपिट में बैठे लोगों में से एक अक्सर ऐसा युवा होता है जिसने पायलट बनने के लिए अपनी जिंदगी की दिशा तय की होती है और परिवार ने उस पर लाखों रुपए खर्च किए होते हैं.

