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हिमाचल प्रदेश : राजाओं की 'मंडी' में सियासत का रंगमंच

कांग्रेस ने अभी तक मंडी लोकसभा सीट से अपने उम्मीदवार का एलान नहीं किया है. लेकिन जैसे ही पार्टी कंगना रनौत के खिलाफ अपने कैंडिडेट को सामने लाएगी, यह और भी दिलचस्प चुनावी मुकाबला बन जाएगा

मंडी लोकसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार अभिनेत्री कंगना रनौत
मंडी लोकसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार अभिनेत्री कंगना रनौत
अपडेटेड 9 अप्रैल , 2024

 - डा. रचना गुप्ता, शिमला से

देश के 18वें लोकसभा चुनावों में हिमाचल प्रदेश की एक सीट 'मंडी' ने लोगों का खूब ध्यान खींचा है. वजह - बॉलीवुड की राजनीति में धमाकेदार एंट्री. जो मंडी कभी राजाओं की मंडी हुआ करती थी, वहां अब रंगमंच की सियासत नया गुल खिल रहा है. 

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस चर्चित सीट पर बॉलीवुड अभिनेत्री और राजपूत समुदाय से आने वाली कंगना रनौत को चुनावी मैदान में उतार कर कई विवाद मोल ले लिए हैं. 

कंगना को मंडी लोकसभा सीट से उतारना भाजपा के लिए इसलिए सुविधाजनक था क्योंकि नवंबर 2022 में हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी ने इस जिले की 10 में से 9 सीटों पर जीत हासिल की थीं. जबकि इस क्षेत्र की बाकी विधानसभा सीटों पर वोटों का अंतर बहुत कम रहा था. 

सोशल मीडिया पर अक्सर ट्रोलिंग का सामना करने वालीं कंगना पर हिमाचल के देव समाज (प्रदेश का एक समाज सुधार आंदोलन) का सीधा असर दिखा है. हालांकि कंगना की सोशल मीडिया मैनेजमेंट टीम अपने आलोचकों को बराबर की टक्कर दे रही है. लेकिन चुनावी राह और सेलिब्रिटी स्टेट्स दोनों अपनी-अपनी जगह हैं. 

कांग्रेस ने अभी तक मंडी लोकसभा सीट से अपने उम्मीदवार का एलान नहीं किया है. लेकिन जैसे ही पार्टी कंगना के खिलाफ अपने कैंडिडेट को सामने लाएगी, जरूर यह लड़ाई एक नए रूप में पहुंच जाएगी. 

मंडी सीट की बात करें तो यहां की सियासत विवादित रही है तो दिलचस्प भी. यहां से लड़ने वाले उम्मीदवार हमेशा विशिष्ट तबके के लोग रहे हैं. राजसी घरानों से महेश्वर सिंह तीन बार, वीरभद्र सिंह दो बार, उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह दो बार तो केंद्रीय मंत्री रहे पंडित सुखराम इस सीट से तीन बार सांसद रहे. 

वीरभद्र सिंह जहां बुशहर रियासत से थे तो वहीं महेश्वर कुल्लू के और सुखराम मंडी जिले से ताल्लुक रखते थे. पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता जयराम ठाकुर को यहां से हार मिली थी. लेकिन जब वे मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने इस जिले में अच्छी पकड़ बनाई. जिसका नतीजा रहा कि राष्ट्रीय स्यवंसेवक संघ से जुड़े रामस्वरूप शर्मा 2019 में इस सीट से भारी मतों से जीत गए. 

लेकिन शर्मा ने दिल्ली में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. खाली हुई सीट के लिए हुए उपचुनाव में कांग्रेस की प्रतिभा सिंह ने 49.23 फीसद मतों से जीत हासिल की. इस समय राज्य में भाजपा की जयराम सरकार थी. हालांकि इस बार कंगना की उम्मीदवारी की घोषणा से पहले ही प्रतिभा सिंह ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया था. 

प्रतिभा सिंह के इस कदम पर लोगों में राय बनी कि वे मोदी लहर के चलते आगे नहीं आना चाहतीं. उन्होंने अपनी ही सरकार से शिकायत की कि वह मंडी के कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर रही है. इधर, जैसे ही दिल्ली से कंगना के नाम का एलान हुआ, सोशल मीडिया की कॉमेंट्री और धूम-धड़ाके के बीच मंडी लोकसभा सीट सुपर हॉट सीट बन गई. 

जहां मंडी के भाजपा कार्यकर्ता अपने सुपरस्टार को एकदम सामने देख सन्न थे तो वहीं पार्टी के वरिष्ठ नेता कंगना की छाया भर बन के रह गए. तेज-तर्रार कंगना ने अपने ऊपर लगे आरोपों का खंडन सरकाघाटी व बिलासपुरी मिश्रित बोली से मंडयाली में किया तो पांगी, लाहुल, रामपुर, छतरी, सराज और मंडी के स्थानीय बोली बोलने वाले वोटरों में उनकी जबान में बात करने की उम्मीद जगी. वोटरों को रिझाने के लिए कंगना को इन बोलियों में भी बोलना होगा. 

दरअसल, मंडी संसदीय क्षेत्र में 17 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें चार कुल्लू जिले की, जबकि चंबा, किन्नौर, लाहुल-स्पीति व शिमला की एक-एक विधानसभा सीट शामिल हैं. मंडी संसदीय क्षेत्र में 6 जिले आते हैं और इन सभी 6 जिलों की बोलियां अलग-अलग हैं. 

मंडी संसदीय क्षेत्र में भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर है. लेकिन विधानसभा सीटों की बात करें तो सिराज में जयराम की सीट, मंडी में अनिल शर्मा की सीट, भरमौर से जनकराज की सीट और सुंदरनगर से राकेश जमवाल की सीटों से भाजपा को बहुत बड़ा वोट शेयर मिलता है. और मंडी जिले की इन्हीं सीटों से कंगना की उम्मीदवारी का वजन भी बढ़ता है.

लेकिन कंगना के लिए मुश्किलें भी कम नहीं. ज्यों-ज्यों प्रचार परवान चढ़ेगा, कांग्रेस जमकर वार करेगी. कंगना की बिंदास तस्वीरों को लेकर हो या मुंहफट बयानबाजी, या खान-पान को लेकर संघ व पार्टी विचारधारा के विपरीत पुराने मसले हों, ये सभी इस अभिनेत्री के लिए जरूर मुश्किलें खड़ी करेंगे. 

इसके अलावा कुल्लू से भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व सांसद महेश्वर सिंह के प्रभाव वाले देव समाज की नाराजगी कंगना का रास्ता उतना आसान नहीं करती जितना कि किसी सामान्य कार्यकर्ता, जैसे रामस्वरूप का हो सका था. अगर वीरभद्र परिवार भी चुनाव में कूदा तो क्षेत्र में राजशाही की एकजुटता और देवलु समाज भी अपना प्रभाव जरूर डालेगा.  

देखा जाए तो कंगना की चमक की वजह से पार्टी के बड़े स्थानीय नेताओं की चमक फीकी पड़ी है. मंच पर खड़े बड़े नेताओं की महत्ता खतम हुई है. यह मसला भी चुनाव प्रभावित कर सकता है. लेकिन एक बोल्ड अभिनेत्री के रूप में कंगना युवाओं की पसंद भी हैं. इस नजरिए से देखें तो रनौत के लिए कार्यकर्ता वोट मायने न भी रखे, तो भी फैंस वोट काफी हो जाएंगे. 

कहा जा रहा है कि कांग्रेस अभी मूड भांप रही है. थोड़ा रुककर प्रत्याशी घोषित करेगी. प्रतिभा सिंह, विक्रमादित्य या महेश्वर सिंह जैसे कद्दावर नेता कांग्रेस के हथियार होंगे. विक्रमादित्य पिता की गद्दी संभालते हैं, तो कंगना की मुश्किलें बढ़ सकती है. पिता की तरह सिंह भी युवाओं में खासे लोकप्रिय हैं.

साल 2021 के लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी प्रतिभा सिंह को 3,65,650 वोट मिले थे जबकि भाजपा के खुशाल सिंह को 3,56,664 वोट मिले. दोनों के मतों के बीच अंतर सिर्फ 1.18 फीसदी था. वहीं 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा के राम स्वरूप शर्मा को 6,47,189 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के आश्रय शर्मा को 2,41,730 वोट मिले जिसमें मतों का अंतर 43 फीसदी था.

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के राम स्वरूप को 3,62,824 वोट मिले थे जबकि कांग्रेस की प्रतिभा सिंह को 3,22,968 मत मिले. यहां मतांतर 5.5 था. अब देखना यह है कि रनौत की सोशल मीडिया मैनेजमेंट व रंगमंच की हवाओं के बीच क्या लोग मंडी में मोदी लहर व चेहरे को जिंदा रख पाएंगे? क्या वे जयराम सरीखे साधारण नेता व मोदी के विकास को आत्मसात करेंगे?

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