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गोरखपुर में ठेकेदार की सनसनीखेज हत्या से गरमाई यूपी की ब्राह्मण राजनीति

गोरखपुर में एक ठेकेदार की बर्बर हत्या के वीडियो ने कानून-व्यवस्था पर सवालों के साथ ब्राह्मण राजनीति को गरमा दिया है. घटना के बाद योगी सरकार पर अखिलेश यादव और अजय राय ने निशाना साधा

Gorakhpur Murder case
गोरखपुर हत्याकांड का वीडियो ग्रैब; इनसेट में मृतक शिवकुमार त्रिपाठी
अपडेटेड 13 अगस्त , 2026

गोरखपुर के सिकरीगंज में बिजली विभाग के ठेकेदार शिवकुमार त्रिपाठी की बेरहमी से हुई हत्या ने सिर्फ कानून-व्यवस्था पर सवाल नहीं खड़े किए हैं बल्कि उत्तर प्रदेश की ब्राह्मण राजनीति को भी एक बार फिर गरमा दिया है. 

हत्या के बाद सामने आए करीब दो मिनट के वीडियो ने लोगों को झकझोर दिया है. वीडियो में तलवार लिए एक किशोर शिवकुमार का पीछा करता दिखता है. जान बचाने के लिए भाग रहे शिवकुमार हाथ जोड़कर छोड़ देने की गुहार लगाते हैं लेकिन हमला नहीं रुकता. सड़क पर गिरने के बाद भी गर्दन, गले और सिर पर तलवार से लगातार वार किए जाते हैं. आसपास खड़े लोग देखते रहते हैं, कुछ वीडियो बनाते हैं लेकिन हमलावर को रोक नहीं पाते. 

इस बर्बरता ने विपक्ष को योगी सरकार पर हमले का नया मुद्दा दे दिया है. समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जिले में अपराधियों के दुस्साहस पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि आखिर ऐसे अपराधियों को संरक्षण कौन दे रहा है. 

अजय राय और अखिलेश यादव के बयानों के बाद हत्याकांड पर बढ़ी सियासी गरमाहट
अजय राय और अखिलेश यादव के बयानों के बाद हत्याकांड पर बढ़ी सियासी गरमाहट

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने भी मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग करते हुए प्रदेश में ब्राह्मणों पर हमलों का मुद्दा उठाया है. इस तरह एक स्थानीय आपराधिक वारदात अब कानून-व्यवस्था से आगे बढ़कर उस राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गई है, जहां यूपी में ब्राह्मणों की सुरक्षा, प्रतिनिधित्व और सत्ता में हिस्सेदारी लगातार चर्चा के विषय रहे हैं.

वीडियो से बढ़ा सियासी दबाव

शिवकुमार त्रिपाठी की हत्या का वीडियो इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील और राजनीतिक रूप से असर डालने वाला पहलू बन गया है. वीडियो में दिखाई देने वाली बर्बरता ने घटना को महज पुरानी रंजिश में हुई हत्या के रूप में देखने की गुंजाइश कम कर दी है. 

वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर आक्रोश बढ़ा और राजनीतिक दलों ने भी इसे कानून-व्यवस्था की विफलता से जोड़ना शुरू कर दिया. आरोप है कि आठ अगस्त की शाम सिकरीगंज के अहिरौली खुर्द गांव में छेदी चौधरी के यहां आयोजित ब्रह्मभोज में शिवकुमार पर पहले सब्बल से हमला किया गया. 

सिर में गंभीर चोट लगने के बाद ग्रामीण उन्हें ऑटो से अस्पताल ले जा रहे थे. इसी दौरान आरोपित किशोर के बाइक से पीछा करने और रास्ते में आटो रुकवाने का आरोप है. इसके बाद शिवकुमार को बाहर खींचकर तलवार से हमला किया गया. करीब 100 मीटर तक जान बचाकर भागने के बाद जब शिवकुमार गिर पड़े तो हमला और भयावह हो गया.

वीडियो में वे हाथ जोड़ते दिखाई देते हैं. आसपास से लोगों की आवाजें आती हैं, लेकिन कोई हमलावर को पकड़ नहीं पाता. पुलिस अब वीडियो और दूसरे इलेक्ट्रानिक साक्ष्यों के जरिए यह पता लगाने में जुटी है कि उस समय मौके पर कौन-कौन मौजूद था. 

मामले में सात बालिग आरोपित जेल भेजे जा चुके हैं, जबकि एक नाबालिग को बाल सुधार गृह भेजा गया है. पुलिस ने घटना में इस्तेमाल तलवार और खंती बरामद कर फोरेंसिक जांच के लिए भेजी है. आरोपितों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की प्रक्रिया भी शुरू की गई है. लेकिन राजनीतिक सवाल यहीं से आगे निकलता है. 

सात आरोपियों को जेल भेजा जा चुका है जबकि एक नाबालिग आरोपी को बाल सुधारगृह भेजा गया है
सात आरोपियों को जेल भेजा जा चुका है जबकि एक नाबालिग आरोपी को बाल सुधारगृह भेजा गया है

अगर पुलिस के मुताबिक यह दो परिवारों के बीच 2024 से चली आ रही रंजिश का परिणाम है तो सवाल यह भी है कि इतनी पुरानी दुश्मनी किस तरह इतनी हिंसक शक्ल तक पहुंची और स्थानीय पुलिस को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? यही सवाल अब यूपी की कानून व्यवस्था और ब्राह्मण राजनीति के केंद्र में आ गया है.

निशाने पर योगी सरकार 

हत्या के बाद समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने जिस तरह सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को निशाने पर लिया है, उससे साफ है कि विपक्ष इस घटना को सिर्फ स्थानीय अपराध के रूप में छोड़ने के मूड में नहीं है. 

अखिलेश यादव ने सवाल उठाया कि मुख्यमंत्री के गृह जिले में अपराधी इतनी बेखौफी से वारदात कैसे कर सकते हैं. उन्होंने ऐसे अपराधियों को मिल रहे कथित संरक्षण पर सवाल खड़ा किया. सपा का प्रतिनिधिमंडल पीड़ित परिवार से मिला और हरसंभव मदद का भरोसा दिया. 

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने इससे आगे बढ़कर घटना को प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय के लोगों पर हो रहे हमलों से जोड़ दिया. उन्होंने सरकार के 'जीरो टॉलरेंस' के दावे पर सवाल उठाते हुए मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग कर दी. यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यूपी की राजनीति में ब्राह्मण मतदाता लंबे समय से एक प्रभावशाली सामाजिक समूह माना जाता है. 

2022 के विधानसभा चुनाव के बाद से ही विपक्ष लगातार यह नैरेटिव बनाने की कोशिश करता रहा है कि BJP सरकार में ब्राह्मण समाज का एक हिस्सा खुद को राजनीतिक रूप से उपेक्षित महसूस कर रहा है. BJP इस धारणा को खारिज करती रही है और सरकार में ब्राह्मण नेताओं की मौजूदगी तथा कानून-व्यवस्था के अपने रिकॉर्ड को सामने रखती है. 

गोरखपुर की यह घटना इसी पुरानी बहस में नया ईंधन डाल रही है. खास बात यह है कि घटना मुख्यमंत्री के गृह जिले में हुई है. ऐसे में विपक्ष के लिए इसे राजनीतिक तौर पर ज्यादा प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने का मौका मिल गया है. 

पुरानी रंजिश के पीछे छिपी कहानी

पुलिस और ग्रामीणों के मुताबिक इस हत्याकांड की पृष्ठभूमि में करीब दो साल पुरानी रंजिश है. 2024 में राहुल चौधरी के चचेरे भाई आदेश चौधरी की हत्या हुई थी. इसके बाद दोनों परिवारों के बीच तनाव बना हुआ था. 

पुलिस फिलहाल शिवकुमार की हत्या को इसी दुश्मनी का परिणाम मानकर जांच आगे बढ़ा रही है. यानी जांच की मौजूदा दिशा में यह मामला किसी राजनीतिक या सामुदायिक टकराव से ज्यादा पारिवारिक रंजिश का मामला है. यही तथ्य BJP के लिए महत्वपूर्ण बचाव का आधार बन सकता है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को उनके ही गृह जिले के इस हत्याकांड को लेकर कानून-व्यवस्था पर घेरा जा रहा है
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को उनके ही गृह जिले के इस हत्याकांड को लेकर कानून-व्यवस्था पर घेरा जा रहा है

सरकार यह तर्क दे सकती है कि व्यक्तिगत दुश्मनी में हुई हत्या को पूरे प्रदेश में किसी समुदाय के खिलाफ हमलों के व्यापक नैरेटिव में बदलना राजनीतिक अतिशयोक्ति है. लेकिन विपक्ष का सवाल घटना की वजह से ज्यादा उस तरीके को लेकर है, जिस तरह हत्या हुई. 

घायल व्यक्ति को अस्पताल ले जाते समय रास्ते में रोकना, उसका पीछा करना और फिर सड़क पर गिराकर तलवार से हमला करते रहना कानून के डर पर गंभीर सवाल खड़े करता है. इसीलिए ब्राह्मण राजनीति का सवाल यहां सीधे घटना की पृष्ठभूमि से नहीं बल्कि पीड़ित की पहचान और सरकार की जवाबदेही से जुड़ रहा है. 

स्थानीय स्तर पर वकीलों की प्रतिक्रिया ने भी इस मामले को राजनीतिक रंग देने में भूमिका निभाई है. गोरखपुर सिविल कोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्यों ने न्यायिक कार्य से दूरी बनाई और कार्रवाई की मांग करते हुए सिविल जज को ज्ञापन दिया. 

11 अगस्त को बेतियाहाता के पार्षद और अधिवक्ता विश्वजीत त्रिपाठी ने हत्या का वीडियो फेसबुक पर पोस्ट किया. उनका आरोप है कि वीडियो हटाने के लिए पुलिस की ओर से दबाव बनाया गया. पुलिस उन्हें थाने ले जाने पहुंची, लेकिन वकीलों के विरोध के बाद वापस लौट गई.  इस पूरे घटनाक्रम ने कानून-व्यवस्था के सवाल को सामाजिक और पेशेवर समुदायों के आक्रोश से जोड़ दिया है. पुलिस की ओर से हल्का दारोगा और कांस्टेबल की भूमिका की जांच भी इसी कड़ी का हिस्सा है. 

अगर जांच में लापरवाही सामने आती है तो दोनों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की बात कही गई है. यानी पुलिस पर भी अब सिर्फ अपराधियों को पकड़ने की नहीं, बल्कि घटना से पहले और बाद की अपनी भूमिका स्पष्ट करने की जिम्मेदारी है.

बीजेपी के लिए दोहरी चुनौती

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है. ऐसे में कोई भी ऐसी घटना, जिसमें जातीय पहचान और कानून-व्यवस्था दोनों का पहलू मौजूद हो, राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है. गोरखपुर का हत्याकांड इसी वजह से महज एक आपराधिक घटना नहीं रह गया है. 

BJP के लिए चुनौती दोहरी है. एक तरफ उसे यह साबित करना होगा कि हत्या के आरोपितों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो रही है. दूसरी तरफ उसे इस धारणा को फैलने से रोकना होगा कि घटना ब्राह्मण समाज के खिलाफ व्यापक असुरक्षा का संकेत है. पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ सख्त कार्रवाई, एनएसए की प्रक्रिया और जल्द चार्जशीट की बात कहकर सरकार की तरफ से कठोर रुख दिखाने की कोशिश की है.

विपक्ष के लिए यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्राह्मण मतदाताओं को लेकर BJP के पारंपरिक समर्थन आधार में सेंध लगाने की कोशिश लंबे समय से जारी है. सपा, कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल अलग-अलग समय पर ब्राह्मणों की कथित उपेक्षा और कानून-व्यवस्था के मुद्दे को उठाते रहे हैं. गोरखपुर की घटना उन्हें इन दोनों मुद्दों को एक साथ जोड़ने का अवसर देती है. 

हालांकि इस घटना से तुरंत किसी बड़े राजनीतिक निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी. अभी पुलिस की जांच में हत्या की वजह पुरानी पारिवारिक रंजिश सामने आ रही है. जातीय आधार पर हत्या के किसी संगठित पैटर्न की पुष्टि भी नहीं हुई है. इसलिए राजनीतिक बयान और जांच के तथ्य, दोनों को अलग-अलग देखना जरूरी होगा. 

फिर भी एक बात साफ है कि शिवकुमार त्रिपाठी की हत्या का वीडियो अब सिर्फ पुलिस केस की फाइल का हिस्सा नहीं है. वह कानून-व्यवस्था, पुलिस की जवाबदेही और ब्राह्मण सुरक्षा के राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है.

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