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गोंडा हत्याकांड से यूपी में कैसे गरमाई निषाद राजनीति?

निषाद पार्टी के नेता की हत्या के बाद संजय निषाद का धरना, राजपाल कश्यप के साथ तस्वीर और SC दर्जे की मांग ने 2027 से पहले निषाद राजनीति को फिर सुर्खियों में ला दिया

sanjay nishad and samajwadi party leader rajpal kashyap protest
धरने पर बैठे संजय निषाद, राजपाल कश्यप और मुकेश सहनी (Photo-ITG)
अपडेटेड 14 सितंबर , 2026

गोंडा के परसपुर थाना क्षेत्र में 9 सितंबर की रात निषाद पार्टी के स्थानीय नेता और व्यापारी विनोद साहनी पर बाइक सवार बदमाशों ने धारदार हथियारों से हमला करने के बाद गोली मार दी. उन्हें लखनऊ के किंग जार्ज मेड‍िकल यूनिवर्सिटी रेफर किया गया जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. 

इस वारदात ने गोंडा में सनसनी फैलाई लेकिन अगले दो दिनों में यह मामला स्थानीय कानून-व्यवस्था से निकलकर उत्तर प्रदेश की निषाद राजनीति के केंद्र में आ गया. विनोद साहनी की हत्या के बाद राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री और निषाद (निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल) पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद ने अपनी ही सरकार के खिलाफ धरना दे दिया. 

उन्होंने पुलिस की लापरवाही पर सवाल उठाते हुए जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की. एक कैबिनेट मंत्री का अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठना इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि मृतक विनोद साहनी खुद निषाद पार्टी से जुड़े नेता थे और निषाद समुदाय से आते थे.

विनोद साहनी की हत्या की वजह को लेकर पुलिस की जांच अभी जारी है. गोंडा के SP अभिषेक झा के मुताबिक पूछताछ में आरोपियों शुभम सिंह, सुभाष सिंह और आकाश सिंह ने दावा किया है कि विनोद ने सोशल मीडिया पर एक खास समुदाय को निशाना बनाने वाला आपत्तिजनक और समाज में विभाजन पैदा करने वाला कंटेंट पोस्ट किया था और इसी वजह से उन्होंने उससे बदला लिया. 

विनोद साहनी (दाएं) की हत्या के आरोपी
विनोद साहनी (दाएं) की हत्या के आरोपी

पुलिस इन दावों की जांच कर रही है. अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हुई है कि हत्या जातिगत विवाद के कारण हुई. इसके बावजूद पीड़ित और आरोपियों की सामाजिक पृष्ठभूमि ने इस मामले को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है.

समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हत्या को PDA यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ अत्याचार की कड़ी बताया. उन्होंने सरकार पर एक खास ऊंची जाति के लोगों को संरक्षण देने का आरोप लगाया. 

अखिलेश ने विनोद साहनी के बेटे राजा से फोन पर बात कर हरसंभव मदद का भरोसा दिया. अखिलेश ने इस मामले को कानून-व्यवस्था से जोड़ते हुए सरकार पर हमला किया और सवाल उठाया कि जिस प्रदेश में कानून-व्यवस्था के बेहतर होने का दावा किया जाता है, वहां एक कैबिनेट मंत्री को अपनी बात पुलिस तक पहुंचाने के लिए धरने पर क्यों बैठना पड़ा.

BJP को सहयोगी के तेवर का संदेश

संजय निषाद का धरना इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू बन गया है. वे सरकार का हिस्सा हैं लेकिन गोंडा की घटना में उन्होंने सरकार और प्रशासन पर दबाव बनाने का रास्ता चुना. यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब निषाद पार्टी लंबे समय से अपने सामाजिक आधार से जुड़े मुद्दों को लेकर BJP पर दबाव बनाती रही है.

धरने के दौरान समाजवादी पार्टी के पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष राजपाल कश्यप की मौजूदगी ने इस घटनाक्रम को और राजनीतिक बना दिया. समाजवादी पार्टी का पिछड़ा वर्ग नेतृत्व निषाद समुदाय के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहा है जबकि निषाद पार्टी BJP की सहयोगी है. 

ऐसे में दोनों नेताओं का एक मंच पर दिखाई देना भले ही गठबंधन का संकेत न हो, लेकिन इसकी राजनीतिक तस्वीर का असर BJP तक जाना स्वाभाविक है.

संजय निषाद के लिए यह घटनाक्रम दोहरी भूमिका निभाने का अवसर भी है. एक तरफ उन्हें सरकार में रहते हुए कानून-व्यवस्था पर कार्रवाई सुनिश्चित कराने का दबाव बनाना है, दूसरी तरफ निषाद समुदाय को यह संदेश देना है कि उनकी पार्टी सत्ता में हिस्सेदारी के बावजूद समुदाय के सवालों पर समझौता नहीं कर रही. 

संजय निषाद 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले NDA में चले गए थे (फाइल फोटो)
संजय निषाद 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले NDA में चले गए थे (फाइल फोटो)

यह राजनीति संजय निषाद के हालिया रुख से भी जुड़ती है. निषाद पार्टी BJP की सहयोगी होने के बावजूद निषाद समाज को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग को लगातार उठाती रही है. 2027 के चुनाव से पहले इस मुद्दे को लेकर दबाव बढ़ना तय माना जा रहा है.

निषाद पार्टी का राजनीतिक इतिहास भी इस घटनाक्रम को महत्वपूर्ण बनाता है. पार्टी का एक दौर समाजवादी पार्टी के साथ भी रहा है. वर्ष 2018 में गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में निषाद पार्टी ने SP-BSP गठबंधन का समर्थन किया था. 

गोरखपुर में संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर BJP को हराया था. 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले निषाद पार्टी शुरुआती दौर में SP-BSP गठबंधन के साथ दिखाई दी, लेकिन बाद में BJP के साथ चली गई. 

इसलिए राजपाल कश्यप के साथ संजय निषाद की मौजूदगी को किसी नए गठबंधन का प्रमाण तो नहीं माना जा सकता लेकिन यह जरूर बताती है कि निषाद पार्टी अपने राजनीतिक विकल्पों को लेकर सार्वजनिक रूप से पूरी तरह बंद दरवाजे की राजनीति नहीं कर रही.

SC दर्जे की मांग 

निषाद राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा समुदाय की सात उपजातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा और आरक्षण देने की मांग है. निषाद, मल्लाह, केवट, मांझी, बिंद और नदी किनारे रहने वाले तथा मछली पकड़ने वाले कई अन्य समूह इस व्यापक सामाजिक आधार का हिस्सा माने जाते हैं. 

फिलहाल ये समुदाय OBC श्रेणी में आते हैं. सामाजिक न्याय समिति-2001 की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश की पिछड़ी जातियों में निषाद समाज की आबादी करीब 4.33 प्रतिशत है. प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में नदी और जलस्रोतों से जुड़े समुदाय अलग-अलग नामों से पहचाने जाते हैं. 

पूर्वांचल में इन्हें मुख्यतः निषाद, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कश्यप, फर्रुखाबाद में बाथम और झांसी के आसपास रैकवार के नाम से जाना जाता है. पूर्वांचल के करीब डेढ़ दर्जन जिलों में इनकी प्रभावी संख्या मानी जाती है. यही सामाजिक आधार निषाद पार्टी की राजनीतिक ताकत है. 

गोरखपुर समेत पूर्वांचल की कई विधानसभा सीटों पर निषाद वोट चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में रहा है. 2018 के गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव ने निषाद वोट की राजनीतिक अहमियत को खास तौर पर सामने रखा था. लेकिन सत्ता में हिस्सेदारी के बावजूद SC दर्जे की मांग पूरी नहीं होने से संजय निषाद पर अपने सामाजिक आधार के बीच राजनीतिक दबाव बना हुआ है. 

2027 का चुनाव करीब आने के साथ यह दबाव और बढ़ गया है. हाल में संजय निषाद ने कहा था कि यदि निषाद समुदाय को SC का दर्जा दे दिया जाता है तो उनकी पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव में BJP से एक भी सीट नहीं मांगेगी और फिर भी BJP के साथ बनी रहेगी. 

यह बयान बताता है कि निषाद पार्टी के लिए आगामी चुनाव में सीटों के बंटवारे से पहले सामाजिक मांगों को राजनीतिक प्राथमिकता देने की रणनीति है. गोंडा की घटना ने इस रणनीति को एक भावनात्मक और स्थानीय मुद्दे से जोड़ दिया है.

BJP और SP दोनों के लिए बढ़ी चुनौती

गोंडा की घटना ऐसे समय में हुई है जब BJP और समाजवादी पार्टी दोनों 2027 के लिए पिछड़े वोटों को लेकर अपनी रणनीति मजबूत कर रहे हैं. BJP के लिए निषाद समुदाय खासकर पूर्वांचल में महत्वपूर्ण सामाजिक आधार है. दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी PDA के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को एक साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है. 

विनोद साहनी की हत्या ने दोनों दलों को अपने-अपने राजनीतिक संदेश को आगे बढ़ाने का अवसर दिया है. BJP के सहयोगी संजय निषाद के लिए यह समुदाय के बीच अपनी सक्रियता दिखाने और सरकार से पुलिस कार्रवाई की मांग करने का मौका है.

SP के लिए यह सरकार की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाने और PDA के राजनीतिक नैरेटिव को मजबूत करने का अवसर है. लखनऊ के जय नारायण डिग्री कालेज में राजनीति शास्त्र विभाग के प्रोफेसर ब्रजेश मिश्र कहते हैं, “इस घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संजय निषाद ने सरकार के भीतर रहकर सरकार पर दबाव बनाने का रास्ता चुना है. BJP के साथ गठबंधन में रहते हुए उनकी राजनीति अब दो मोर्चों पर चल रही है. एक तरफ सत्ता में हिस्सेदारी और गठबंधन की मजबूरी है, दूसरी तरफ निषाद समाज के बीच अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की जरूरत.” 

राजपाल कश्यप के साथ धरने की तस्वीर ने इसी राजनीतिक संतुलन को और स्पष्ट कर दिया है. इसे फिलहाल किसी नए गठबंधन की शुरुआत कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन BJP के लिए यह जरूर एक संकेत है कि 2027 के चुनाव से पहले निषाद पार्टी अपने सामाजिक आधार को लेकर ज्यादा आक्रामक रुख अपना सकती है. 

मिश्र कहते हैं, “वहीं समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती यह है कि वह निषाद समाज को अपने PDA गठजोड़ में कितना प्रभावी ढंग से जोड़ पाती है. निषाद पार्टी का BJP के साथ मौजूदा गठबंधन इस राह की सबसे बड़ी राजनीतिक बाधा है, लेकिन गोंडा की घटना ने विपक्ष को इस समुदाय के बीच मुद्दा उठाने का नया अवसर दिया है.” 

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