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दुधवा में लगातार मर रहे बाघ; बिगड़ रहा तराई के जंगलों का संतुलन?

लखीमपुर खीरी जिले के तहत आने वाले दुधवा टाइगर रिजर्व में बीते 90 दिन में चार बाघों की मौत हो चुकी है और विशेषज्ञ इन पर सवाल उठा रहे हैं

सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 2 जुलाई , 2026

दुधवा टाइगर रिजर्व और उससे जुड़े दक्षिण खीरी वन प्रभाग के जंगल कभी देश में बाघ संरक्षण की सबसे सफल कहानियों में गिने जाते थे. उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में फैले इन जंगलों ने पिछले डेढ़ दशक में बाघों की संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. लेकिन पिछले तीन महीनों में जो घटनाएं सामने आई हैं उन्होंने इस सफलता के मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

महज 90 दिनों के भीतर लखीमपुर खीरी जिले में चार बाघ और बाघिनों की मौत हो चुकी है. इनमें एक ट्रेन से कटकर मरा, एक की मौत आपसी संघर्ष में हुई, एक आदमखोर घोषित बाघिन रेस्क्यू के दौरान मर गई और अब एक घायल नर बाघ की मौत ने वन विभाग को नई चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है.

सबसे ताजा मामला 29 जून की रात दक्षिण खीरी वन प्रभाग की महेशपुर रेंज का है. उदयपुर गांव के पास करीब 10 वर्षीय नर बाघ मृत मिला. इससे कुछ घंटे पहले इसी बाघ ने एक किसान पर हमला किया था. ड्रोन निगरानी में वन विभाग ने देखा कि बाघ सामान्य गतिविधि नहीं कर पा रहा था और महज 100 से 150 मीटर के दायरे में ही सीमित था. इससे उसके गंभीर रूप से घायल होने का संदेह हुआ. डीएफओ तापस मिहिर ने तत्काल कानपुर चिड़ियाघर के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. नासिर को बुलाया. शाम छह बजे से रात तक निगरानी और रेस्क्यू की तैयारी चलती रही लेकिन उपचार शुरू होने से पहले ही बाघ ने दम तोड़ दिया.

बाघ के सीने, कंधे और दाहिने हिस्से पर गहरे घाव मिले हैं. प्रारंभिक जांच में आशंका जताई जा रही है कि यह चोटें दूसरे बाघ से संघर्ष, किसी कठोर वस्तु से टकराने अथवा ग्रामीणों द्वारा हमले के कारण भी हो सकती हैं. हालांकि वास्तविक कारण भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई), बरेली की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट होगा. वन विभाग ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ. रेनू सिंह को मौके पर भेजा. उन्होंने पूरे घटनाक्रम की समीक्षा करते हुए अधिकारियों को हर पहलू की जांच करने के निर्देश दिए हैं.

चार मौतें, चार अलग वजहें लेकिन संकट एक ही

एक अप्रैल को मैलानी रेलवे स्टेशन के पास रेलवे ट्रैक के किनारे एक बाघिन का शव मिला था. वन विभाग का कहना था कि उसकी मौत ट्रेन की टक्कर से हुई जबकि रेलवे ने अपनी प्रारंभिक जांच में इससे इनकार किया. पोस्टमार्टम में मिले गंभीर आंतरिक घावों ने वन विभाग के दावे को बल दिया.
इसके बाद 5 मई को मझगई रेंज के नौनिया वन ब्लॉक में तीन से चार वर्ष की बाघिन मृत मिली. पोस्टमार्टम के दौरान उसके पंजों में दूसरे बाघ के बाल मिले. इससे स्पष्ट हुआ कि उसकी मौत क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई में हुई थी. 23 जून को मझगई रेंज में एक ऐसी बाघिन को ट्रैंकुलाइज किया गया जिसने महिला कोकिला और ग्रामीण रामदीन की जान ले ली थी.

पांच दिन की तलाश के बाद उसे पकड़ा गया लेकिन कुछ ही देर बाद उसकी मौत हो गई. इस घटना को लेकर सवाल उठे तो प्रदेश के वन मंत्री ने विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित कर जांच के आदेश दिए. अब 29 जून को घायल नर बाघ की मौत ने इन घटनाओं की श्रृंखला को और गंभीर बना दिया है.

चारों घटनाओं की परिस्थितियां अलग हैं लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इन्हें अलग-अलग मामलों के बजाय व्यापक पारिस्थितिक दबाव के संकेत के रूप में देखने की जरूरत है. वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि जब किसी परिदृश्य में लगातार इस प्रकार की घटनाएं होने लगें तो केवल मौत का कारण जान लेना पर्याप्त नहीं होता. यह भी समझना जरूरी होता है कि आखिर बाघ बार-बार ऐसी परिस्थितियों में क्यों पहुंच रहे हैं.

रेल ट्रैक, इंसानी दबाव और सिकुड़ते गलियारे

दुधवा टाइगर रिजर्व का बफर क्षेत्र आज भी कई स्थानों पर रेलवे लाइन और सड़कों से कटा हुआ है. बांकेगंज-मैलानी रेलखंड का लगभग 12 किलोमीटर हिस्सा जंगल के बीच से गुजरता है. यहां लोको पायलटों को अधिकतम 30 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से ट्रेन चलाने के निर्देश हैं लेकिन वन अधिकारियों का कहना है कि कई मामलों में वास्तविक गति इससे अधिक पाई गई है. 1 अप्रैल को जिस बाघिन की मौत हुई थी, उसके बाद दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर डॉ. एच. राजामोहन ने रेलवे अधिकारियों के साथ बैठक में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था. उनका कहना था कि संवेदनशील वन्यजीव क्षेत्र में निर्धारित गति सीमा का कड़ाई से पालन कराया जाना चाहिए.

रेलवे अधिकारियों का दावा अलग है. उनका कहना है कि घटना स्थल पर ट्रेन की टक्कर के स्पष्ट सबूत नहीं मिले थे और चालक निर्धारित गति सीमा के भीतर ट्रेन चला रहे थे. पोस्टमार्टम पैनल के सदस्य डॉ. दया शंकर का कहना है कि बाघिन के शरीर में गंभीर आंतरिक चोटें मिली थीं जो किसी अत्यंत तेज टक्कर की ओर संकेत करती हैं. उनका मानना है कि बड़े वन्यजीवों के मामलों में हमेशा ट्रैक पर स्पष्ट निशान मिलना जरूरी नहीं होता.

वहीं पिछले तीन वर्षों के रिकॉर्ड भी चिंता बढ़ाते हैं. 2023 में इसी रेलखंड पर तीन चीतल और एक मादा भालू की ट्रेन से कटकर मौत हुई. 2024 में बाघ का शावक घायल हुआ. फरवरी 2025 में किशनपुर अभयारण्य के पास हाईवे पर वाहन की टक्कर से एक बाघ की मौत हुई. यह बताता है कि केवल जंगल के भीतर संरक्षण पर्याप्त नहीं है, बल्कि वन्यजीवों के आवाजाही मार्ग भी सुरक्षित होने चाहिए.

क्या बढ़ रही है बाघों के बीच प्रतिस्पर्धा?

दुधवा में बाघों की संख्या लगातार बढ़ी है. संरक्षण की दृष्टि से यह उपलब्धि है लेकिन इसके साथ क्षेत्रीय संघर्ष भी बढ़ना स्वाभाविक माना जाता है. नर और मादा दोनों अपने-अपने इलाकों पर अधिकार बनाए रखने के लिए संघर्ष करते हैं. मझगई रेंज में मिली बाघिन की मौत इसका उदाहरण मानी जा रही है. पोस्टमार्टम के दौरान मिले दूसरे बाघ के बाल और शरीर पर गहरे घावों ने स्पष्ट किया कि यह प्राकृतिक क्षेत्रीय संघर्ष का मामला था.

वन्यजीव वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि बाघों की संख्या बढ़ती है लेकिन उनके लिए उपलब्ध सुरक्षित क्षेत्र और कॉरिडोर नहीं बढ़ते तो संघर्ष की घटनाएं भी बढ़ सकती हैं. युवा बाघ नए क्षेत्र की तलाश में गांवों और कृषि क्षेत्रों तक पहुंच जाते हैं, जहां उनका इंसानों से सामना होने लगता है. महेशपुर के मामले में भी यही संभावना जताई जा रही है. घायल बाघ सामान्य रूप से शिकार करने में असमर्थ था. ऐसी स्थिति में इंसान उसके लिए आसान लक्ष्य बन सकता है. किसान पर हमला शायद इसी वजह से हुआ. वन विभाग यह भी जांच कर रहा है कि हमले के बाद कहीं ग्रामीणों ने प्रतिशोध में बाघ पर हमला तो नहीं किया. हालांकि अभी तक इसका कोई पुष्ट प्रमाण सामने नहीं आया है.

जांच जारी लेकिन संरक्षण रणनीति पर पुनर्विचार की जरूरत

महेशपुर में मिले बाघ के सभी अंग सुरक्षित पाए गए हैं. इससे शिकार की आशंका फिलहाल कमजोर मानी जा रही है लेकिन वन विभाग ने किसी भी संभावना से इनकार नहीं किया है. अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ. रेनू सिंह ने पूरे मामले की विस्तृत जांच के निर्देश दिए हैं. वहीं बाघिन की रेस्क्यू के दौरान हुई मौत की जांच एसआइटी कर रही है. विभाग ने दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर डॉ. एच. राजामोहन से सभी घटनाओं से जुड़े दस्तावेज तलब किए हैं.

अधिकारियों के अनुसार संबंधित कर्मचारियों के बयान भी दर्ज किए जाएंगे और प्रत्येक मामले की स्वतंत्र समीक्षा होगी. दक्षिण खीरी वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी तापस मिहिर के मुताबिक महेशपुर में मृत मिले बाघ के शरीर पर कई चोटें मिली हैं. संक्रमण की भी आशंका है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के वास्तविक कारणों की पुष्टि हो सकेगी. सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच कराई जा रही है. वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि अब केवल घटनाओं की जांच पर्याप्त नहीं होगी. दुधवा में रेलवे, वन विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय, संवेदनशील रेलखंडों पर प्रभावी स्पीड मॉनिटरिंग, वन्यजीव कॉरिडोर की वैज्ञानिक पहचान, गांवों में त्वरित रेस्पॉन्स टीमों की उपलब्धता और मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने के लिए दीर्घकालिक योजना जरूरी है.

दुधवा आज भी देश के सबसे महत्वपूर्ण बाघ आवासों में शामिल है. लेकिन यदि लगातार हो रही ऐसी असामान्य मौतों के पीछे मौजूद कारणों का समय रहते समाधान नहीं किया गया, तो संरक्षण की अब तक की उपलब्धियां धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकती हैं. चार मौतें केवल चार घटनाएं नहीं हैं, बल्कि वे यह संकेत भी हैं कि तराई के जंगलों में इंसान और बाघ के बीच संतुलन पहले जितना सहज नहीं रह गया है. यही संतुलन आने वाले वर्षों में दुधवा के भविष्य का सबसे बड़ा सवाल होगा.

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