अपना बरसों पुराना सपना पूरा होने यानी कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही दिनों बाद डी.के. शिवकुमार 19 जून को अपने परिवार के साथ आंध्र प्रदेश के तिरुमला स्थित तिरुपति बालाजी मंदिर पहुंचे थे. वहां उन्होंने भगवान वेंकटेश्वर का आशीर्वाद लिया और मुख्य देवता की अभिषेक सेवा में भी हिस्सा लिया. लेकिन 12 जुलाई को बेंगलुरु में एक मंदिर कार्यक्रम के दौरान दिया गया उनका एक सुझाव उस यात्रा से मिली सद्भावना पर पानी फेरता नजर आ रहा है.
शिवकुमार ने कहा कि कर्नाटक सरकार इस बात पर विचार करेगी कि तिरुपति बालाजी मंदिर के गर्भगृह में भगवान वेंकटेश्वर को प्रतिदिन अर्पित की जाने वाली अत्यंत प्रतिष्ठित 'नित्य हारती' सेवा में राज्य की ओर से मंत्री, विधायक, वरिष्ठ अधिकारी या न्यायाधीश शामिल हों.
उनके इस बयान को तुरंत परंपरा में दखल के रूप में देखा गया और तिरुपति-तिरुमला के धार्मिक हलकों के साथ-साथ आंध्र प्रदेश की राजनीति में भी हलचल मच गई. इसकी वजह यह है कि दशकों पुरानी परंपरा के अनुसार नित्य हारती (सुबह भगवान के समक्ष कपूर का दीप घुमाने की रस्म) का अधिकार केवल तिरुमला-तिरुपति के करीब 20 मठाधीशों और मैसूर के पूर्व महाराजा के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त एक अधिकारी को ही प्राप्त है.
तिरुपति कन्नड़ भाषी श्रद्धालुओं का भी प्रमुख तीर्थस्थल है. कन्नड़ भाषी श्रद्धालु भगवान वेंकटेश्वर को उतनी ही श्रद्धा से पूजते हैं, जितनी तेलुगु और तमिल श्रद्धालु. नित्य हारती में मैसूर रियासत के प्रतिनिधि को सम्मान दिए जाने की परंपरा को विजयनगर साम्राज्य और बाद में वोडेयार वंश के शासनकाल के दौरान 1947 तक तिरुपति मंदिर को मिले संरक्षण और दान की मान्यता के रूप में देखा जाता है.
परंपरा के अनुसार मैसूर के महाराजा के वंशजों को पहली नित्य हारती में शामिल होने की अनुमति थी. बाद में यह जिम्मेदारी एक विशेष प्रतिनिधि को सौंप दी गई. लेकिन शिवकुमार ने घोषणा की कि उनकी सरकार नित्य हारती में कर्नाटक के आधिकारिक प्रतिनिधित्व के लिए नया प्रोटोकॉल लाएगी.
प्रस्तावित प्रोटोकॉल के तहत यदि नियुक्त अधिकारी उपलब्ध नहीं होता है तो उसकी जगह राज्य का कोई मंत्री, विधायक, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी या न्यायाधीश कर्नाटक की ओर से औपचारिक नित्य हारती कर सकेगा. शिवकुमार का तर्क है कि विधायक और वरिष्ठ अधिकारी समाज की सेवा करते हैं,इसलिए उन्हें भी यह धार्मिक सेवा करने का अधिकार मिलना चाहिए.
इस प्रस्ताव की आंध्र प्रदेश की राजनीति में तीखी आलोचना हो रही है क्योंकि यह एक ऐसी धार्मिक परंपरा से जुड़ा मामला है, जिसमें आंध्र प्रदेश के मंत्रियों और विधायकों को भी हिस्सा लेने की अनुमति नहीं है. सत्तारूढ़ तेलुगु देशम पार्टी (TDP), उसकी सहयोगी BJP और तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (TTD) बोर्ड के सदस्य शिवकुमार के प्रस्ताव को बेतुका बता रहे हैं.
TDP के राष्ट्रीय प्रवक्ता नीलायापालेम विजय कुमार ने कहा, "सबसे पहले कर्नाटक के मुख्यमंत्री को यह समझना चाहिए कि यह मंदिर आंध्र प्रदेश में है और इसका संचालन तिरुमला तिरुपति देवस्थानम नाम की स्वतंत्र संस्था करती है. आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री भी मंदिर के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते."
मंदिर नगरी तिरुपति के रहने वाले विजय कुमार ने आगे कहा, "अगर हम कर्नाटक के धर्मस्थल या श्रृंगेरी जैसे प्रमुख हिंदू तीर्थस्थलों की परंपराओं को लेकर कोई प्रस्ताव या आदेश पारित करें तो क्या होगा? डी.के. शिवकुमार को अधिक समझदारी दिखानी चाहिए थी. उन्हें अपना बयान वापस लेना चाहिए."
आंध्र प्रदेश BJP के प्रवक्ता और TTD बोर्ड के सदस्य भानुप्रकाश रेड्डी ने शिवकुमार के प्रस्ताव को ‘अधिकार क्षेत्र से बाहर का दखल’ बताया. उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव TTD से बिना किसी सलाह-मशविरे के दिया गया. रेड्डी ने कहा, "कर्नाटक को मिला यह सम्मान मैसूर रियासत के तिरुमला के लिए किए गए योगदान के कारण है. यह सम्मान किसी और को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता. कर्नाटक के मुख्यमंत्री की सिफारिश पर इसे मनमाने ढंग से किसी और तक नहीं बढ़ाया जा सकता."
रेड्डी ने 14 जुलाई को तिरुमला में हुई TTD बोर्ड की बैठक में यह मुद्दा उठाया. बैठक की अध्यक्षता TTD बोर्ड के चेयरमैन बी.आर. नायडू ने की. रेड्डी के अनुसार, नायडू ने बोर्ड के सदस्यों को आश्वासन दिया कि इस तरह का कोई प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया जाएगा और यदि नित्य हारती को लेकर कर्नाटक सरकार की ओर से कोई औपचारिक प्रस्ताव आता है तो उसे खारिज कर दिया जाएगा. हालांकि बैठक में मौजूद TTD के एक अधिकारी ने कहा कि नायडू का मानना था कि फिलहाल इस मुद्दे पर आगे चर्चा की जरूरत नहीं है क्योंकि कर्नाटक सरकार की ओर से अभी तक कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं आया है.
रेड्डी ने इंडिया टुडे से कहा, "शिवकुमार को तिरुमला को राजनीति का अखाड़ा बनाने से बचना चाहिए. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें अपने पद की गरिमा के अनुरूप बयान देने चाहिए. उन्हें लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने या सदियों पुरानी परंपराओं को बदलने की कोशिश से बचना चाहिए."

