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दिव्या मित्तल मिर्जापुर से किस पार्टी की बढ़ाएंगी टेंशन?

पूर्व डीएम दिव्या मित्तल की सियासी एंट्री से मिर्जापुर सदर का समीकरण बदलने की चर्चा, वैश्य वोट बैंक पर नजर और BJP के साथ-साथ सपा के सामने भी नई चुनौती

IAS Officer Divya Mittal Resigns
दिव्या मित्तल (फाइल फोटो)
अपडेटेड 16 अक्टूबर , 2026

पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल के राजनीति में उतरने और 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मिर्जापुर से लड़ने के ऐलान ने जिले की सियासत में नए समीकरणों की चर्चा शुरू कर दी है. उनकी नई पार्टी 'जननीति भारत' का नारा है, 'राजनीति नहीं, जननीति'. 

हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि वे मिर्जापुर की किस विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगी और उनकी पार्टी प्रदेश की सभी 403 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी या नहीं. लेकिन मिर्जापुर की राजनीति को करीब से देखने वाले विश्लेषकों के मुताबिक अगर दिव्या मित्तल मिर्जापुर सदर सीट से मैदान में उतरती हैं तो इसका सबसे बड़ा असर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है. 

दिव्या मित्तल के चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद मिर्जापुर सदर विधानसभा सीट को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है. स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का आकलन है कि अगर वे इसी सीट से चुनाव मैदान में उतरती हैं तो BJP को अपने परंपरागत मतदाताओं के बीच नई चुनौती का सामना करना पड़ सकता है. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह सीट का सामाजिक समीकरण है. 

अनुमानों के मुताबिक मिर्जापुर सदर क्षेत्र में करीब 65 हजार वैश्य, 45 हजार ब्राह्मण, 40 हजार दलित, 35 हजार मुस्लिम, 30 हजार क्षत्रिय और 25 हजार यादव मतदाता हैं. दिव्या मित्तल वैश्य समाज से आती हैं. ऐसे में उनके चुनाव लड़ने पर इस समुदाय के मतदाताओं के बीच उनकी अपील को लेकर चर्चा होना स्वाभाविक है. 

मिर्जापुर के श‍िक्षक राकेश पटेल कहते हैं, “केवल जातीय पहचान के आधार पर वोटों के एकमुश्त हस्तांतरण का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी. उनके पक्ष में मतदाताओं का रुझान इस बात पर निर्भर करेगा कि वे अपने प्रशासनिक अनुभव, स्थानीय पहचान और चुनावी एजेंडे को किस तरह पेश करती हैं.” 

मिर्जापुर का डीएम रहते हुए दिव्या मित्तल ने जो काम किए, उनके बूते वे लोगों से समर्थन मांग सकती हैं
मिर्जापुर का डीएम रहते हुए दिव्या मित्तल ने अपने कामकाज से काफी तारीफें बटोरी थीं (फाइल फोटो)

मिर्जापुर सदर सीट पर BJP के रत्नाकर मिश्रा ने 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज की थी. इससे पहले 2002, 2007 और 2012 में समाजवादी पार्टी के कैलाश चौरसिया लगातार तीन बार इस सीट से विधायक चुने गए थे. यह चुनावी इतिहास बताता है कि सदर सीट पर BJP की मौजूदा पकड़ के बावजूद सपा भी पहले मजबूत स्थिति में रह चुकी है. इसलिए दिव्या मित्तल की एंट्री को केवल एक नए उम्मीदवार के आने के रूप में नहीं, बल्कि पुराने सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों की संभावित परीक्षा के तौर पर भी देखा जा रहा है. 

राकेश पटेल का मानना है कि अगर मित्तल सदर सीट से चुनाव लड़ती हैं तो BJP को नुकसान पहुंचने की आशंका अधिक होगी. इसकी एक वजह यह भी है कि BJP को यहां अपनी पिछली जीत का आधार बनाए रखने के साथ नए चेहरे की चुनौती का जवाब देना पड़ सकता है. 

दूसरी ओर यदि दिव्या मित्तल अपने दम पर वैश्य मतदाताओं के एक हिस्से के साथ दूसरे समुदायों का समर्थन जुटाने में सफल होती हैं, तो मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है. लेकिन इसके लिए उन्हें संगठन, बूथ प्रबंधन और स्थानीय स्तर पर मजबूत चुनावी नेटवर्क भी खड़ा करना होगा.

पूर्व डीएम की छवि बनाम BJP का संगठन

दिव्या मित्तल की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी मिर्जापुर में जिलाधिकारी के रूप में उनका पुराना कार्यकाल हो सकता है. वे सितंबर 2022 से सितंबर 2023 तक जिले की डीएम रही थीं. इस दौरान उनके कामकाज और जनसमस्याओं के समाधान को लेकर उनकी पहचान बनी. खास तौर पर अगस्त 2023 में पहाड़ी इलाके के दूरदराज गांव लहुरिया दह तक पाइप के जरिए पानी पहुंचाने का मामला उनके प्रशासनिक कार्यकाल की चर्चित उपलब्धियों में शामिल रहा. इससे गांव में लंबे समय से चले आ रहे पेयजल संकट को दूर करने में मदद मिली थी.

राजनीति में उतरने के बाद मित्तल इसी प्रशासनिक छवि को चुनावी समर्थन में बदलने की कोशिश कर सकती हैं. उनका तर्क है कि राजनीति का केंद्र जाति और धर्म के समीकरण नहीं बल्कि जवाबदेही, न्याय और बच्चों का भविष्य होना चाहिए. 

अपनी पार्टी 'जननीति भारत' की घोषणा करते हुए उन्होंने तीन प्राथमिकताएं गिनाई हैं. इनमें लोगों की जरूरतों के मुताबिक नीतियां बनाना, पहचान के बजाय आवश्यकता के आधार पर निर्णय लेना और जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना शामिल है. उनकी पार्टी का नारा 'राजनीति नहीं, जननीति' भी इसी सोच को सामने रखता है. मित्तल ने संकेत दिया है कि वे पैसे और बाहुबल पर निर्भर रहने के बजाय समर्थकों के साथ मिलकर राजनीतिक मंच तैयार करना चाहती हैं. 

मिर्जापुर में उनकी प्रशासनिक पहचान उन्हें दूसरे उम्मीदवारों से अलग कर सकती है. डीएम के तौर पर काम करने के कारण उन्हें जिले की भौगोलिक परिस्थितियों, ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की जानकारी है. पहाड़ी इलाकों में पेयजल की समस्या से लेकर बुनियादी सुविधाओं की जरूरतों तक, वे अपने प्रशासनिक अनुभव को चुनावी विमर्श का हिस्सा बना सकती हैं.

 लेकिन किसी अधिकारी के कार्यकाल में मिली लोकप्रियता का चुनावी जीत में बदलना अपने आप में सुनिश्चित नहीं होता. चुनाव में स्थानीय जातीय समीकरण, उम्मीदवार की स्वीकार्यता, पार्टी संगठन और मतदाताओं की प्राथमिकताएं भी निर्णायक होती हैं. 

राजनीतिक‍ विश्लेषकों के अनुसार BJP के लिए चुनौती यह होगी कि वह मित्तल की प्रशासनिक छवि और उनके स्थानीय जुड़ाव का राजनीतिक जवाब कैसे देती है. रत्नाकर मिश्रा लगातार दो विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं. ऐसे में BJP के पास मौजूदा विधायक का अनुभव और स्थापित संगठनात्मक ढांचा है. 

दूसरी तरफ मित्तल को अपनी नई पार्टी के लिए कार्यकर्ताओं और समर्थकों का नेटवर्क तैयार करना होगा. उन्हें यह भी स्पष्ट करना होगा कि उनकी पार्टी स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए क्या ठोस योजनाएं पेश करेगी. जानकार मानती है कि यह मुकाबला केवल लोकप्रियता बनाम संगठन का नहीं होगा. 

सवाल यह भी होगा कि क्या मित्तल अपनी पहचान को जाति आधारित लामबंदी से आगे ले जाकर अलग-अलग सामाजिक वर्गों का भरोसा हासिल कर सकती हैं. यदि वे ऐसा कर पाती हैं, तो BJP के लिए चुनावी चुनौती बढ़ सकती है. लेकिन यदि उनकी अपील सीमित मतदाता वर्ग तक रहती है, तो मजबूत संगठन वाली पार्टी को नुकसान पहुंचाना उनके लिए मुश्किल होगा.

सपा पर क्या होगा असर

दिव्या मित्तल के चुनावी मैदान में उतरने का असर केवल BJP तक सीमित नहीं रहेगा. समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों के लिए भी उनकी उम्मीदवारी कई सवाल खड़े कर सकती है. सबसे अहम सवाल यह है कि मित्तल अपनी पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ेंगी या भविष्य में किसी दूसरी पार्टी के साथ तालमेल की संभावना बनेगी. 

अगर मित्तल मिर्जापुर सदर से अपनी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ती हैं तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने लिए स्वतंत्र जनाधार तैयार करने की होगी. इस स्थिति में BJP और सपा दोनों के मतदाताओं के बीच उनकी अपील मुकाबले की दिशा तय कर सकती है. अगर उन्हें वैश्य समाज के मतदाताओं के एक हिस्से का समर्थन मिलता है, तो BJP के वोट आधार पर असर पड़ने की संभावना जताई जा सकती है. वहीं अगर वे गैर-BJP मतदाताओं को भी आकर्षित करती हैं तो सपा के सामने यह सवाल होगा कि वह अपने परंपरागत मतादाताओं को कितना एकजुट कर पाती है. दूसरी स्थिति तब बनेगी, जब दिव्या मित्तल किसी विपक्षी दल के साथ चुनावी तालमेल करें. 

स्थानीय राजनीतिक आकलनों के मुताबिक अगर वे सपा के समर्थन से चुनाव लड़ती हैं तो वैश्य, यादव, मुस्लिम और दलित मतदाताओं के बीच समर्थन का संभावित गठजोड़ BJP के लिए कठिन चुनौती बन सकता है. हालांकि, यह अभी एक चुनावी संभावना भर है. इन समुदायों के मतदाता एक ही उम्मीदवार के पक्ष में एकमुश्त मतदान करेंगे, ऐसा मानने का कोई आधार नहीं है.

मिर्जापुर जिले की राजनीति में अनुप्रिया पटेल और अपना दल (एस) की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. अनुप्रिया पटेल ने 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में मिर्जापुर सीट से जीत दर्ज की. 2022 के विधानसभा चुनाव में BJP और अपना दल (एस) के गठबंधन ने जिले की पांचों सीटों, छानबे, मिर्जापुर, मझवां, चुनार और मड़िहान पर जीत हासिल की थी. ऐसे में जिले की चुनावी राजनीति में BJP के साथ उसके सहयोगी दल का प्रभाव भी अहम रहेगा. 

अगर मित्तल सदर सीट पर मजबूत चुनौती पेश करती हैं तो उसका असर स्थानीय स्तर पर BJP के चुनावी अभियान और विपक्ष की रणनीति दोनों पर पड़ सकता है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं विधानसभा चुनाव में जिले की सभी सीटों पर उनके प्रभाव का अनुमान लगाना अभी जल्दबाजी होगी. एक सीट पर स्थानीय पहचान और व्यक्तिगत लोकप्रियता का असर दूसरी सीटों पर अपने आप नहीं पहुंचता. 

मित्तल की राजनीतिक घोषणा का एक दूसरा पहलू भी है. उन्होंने 30 अगस्त को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी और केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने 14 सितंबर को उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया था. आईआईटी दिल्ली और आईआईएम बेंगलुरु से पढ़ाई करने वाली मित्तल ने 2013 में सिविल सेवा परीक्षा पास की थी. करीब 13 साल के प्रशासनिक करियर के बाद राजनीति में उनका प्रवेश ऐसे समय हुआ है जब उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं. 

अब उनकी परीक्षा प्रशासनिक अनुभव को राजनीतिक संगठन में बदलने की होगी. उन्हें यह बताना होगा कि 'जननीति भारत' केवल एक नारा नहीं, बल्कि शासन और विकास का व्यावहारिक विकल्प कैसे बनेगी. साथ ही, यह भी स्पष्ट करना होगा कि पार्टी के पास स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए क्या कार्यक्रम हैं और चुनाव जीतने के लिए वह किस तरह का संगठन खड़ा करेगी. 

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