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सपा के राज्यसभा उम्मीदवार धनराज नाथवानी पर क्या होगा BJP का रुख?

सपा ने रिलायंस समूह से जुड़े धनराज नाथवानी को उत्तर प्रदेश से राज्यसभा उम्मीदवार बनाया है जबकि उनके परिवार के BJP के शीर्ष नेतृत्व से पुराने रिश्ते रहे हैं

धनराज नाथवानी के राज्यसभा नामांकन के दौरान अखिलेश यादव और राम गोपाल यादव
अपडेटेड 9 अक्टूबर , 2026

जब समाजवादी पार्टी (SP) प्रमुख अखिलेश यादव ने राज्यसभा चुनाव के लिए एक ‘सरप्राइज उम्मीदवार’ देने का वादा किया था तब बहुत कम लोगों ने सोचा होगा कि यह नाम गुजरात के जामनगर से आएगा. धनराज परिमल नाथवानी ने पार्टी के वरिष्ठ नेता राम गोपाल यादव के साथ उत्तर प्रदेश से सपा उम्मीदवार के तौर पर अपना नामांकन दाखिल किया है.

वे रिलायंस कॉरपोरेट आईटी पार्क लिमिटेड के बोर्ड सदस्य हैं, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) के महत्वपूर्ण मैन्युफैक्चरिंग और बिजनेस वर्टिकल्स संभालते हैं साथ ही गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन (GCA) के अध्यक्ष भी हैं.

माना जा रहा है कि सपा के पास उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों में से दो के लिए पर्याप्त संख्या है. इन सीटों पर 16 अक्टूबर को चुनाव होना है. ऐसे में नाथवानी का चुना जाना लगभग तय माना जा रहा है.

इस नामांकन से दो बातें एक साथ सामने आती हैं. धनराज के पिता परिमल नाथवानी रिलायंस में कॉरपोरेट अफेयर्स के निदेशक हैं. और वे जून में झारखंड से NDA समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर फिर राज्यसभा पहुंचे हैं. अगर दोनों राज्यसभा में पहुंच जाते हैं तो देश के सबसे बड़े कारोबारी समूह के केंद्र में रहने वाला यह परिवार संसद के उच्च सदन के दोनों पक्षों में मौजूद होगा. एक तरफ पिता सत्तारूढ़ गठबंधन के साथ बैठेंगे तो दूसरी तरफ  बेटा उत्तर प्रदेश में उसके मुख्य प्रतिद्वंद्वी के साथ होगा. उत्तर प्रदेश चुनावी लिहाज से उत्तर भारत का सबसे अहम राज्य भी है.

धनराज नाथवानी रिलायंस के जामनगर और वडोदरा मैन्युफैक्चरिंग डिवीजन और गुजरात में उसका Jio कारोबार संभालते हैं. GCA में उन्होंने 2022 में अमित शाह की जगह ली थी जिन्होंने 2009 से 2014 तक नरेंद्र मोदी के बाद इस पद को संभाला था. नाथवानी ने नरेंद्र मोदी स्टेडियम का काम पूरा कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. यह स्टेडियम अहमदाबाद-गांधीनगर को वैश्विक खेल केंद्र के तौर पर विकसित करने की सरकार की योजना का प्रमुख हिस्सा है

परिमल नाथवानी झारखंड से राज्यसभा के लिए चुने गए हैं (फाइल फोटो)
परिमल नाथवानी झारखंड से राज्यसभा के लिए चुने गए हैं (फाइल फोटो)

नाथवानी द्वारकाधीश मंदिर समिति और नाथद्वारा मंदिर बोर्ड के उपाध्यक्ष भी हैं. वे गुजरात स्टेट बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ से जुड़े हैं और गांधीनगर की पंडित दीनदयाल एनर्जी यूनिवर्सिटी के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सदस्य हैं. इसके अलावा वे गुजरात एनर्जी रिसर्च एंड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट से भी जुड़े हैं.

नाथवानी गुजरात सरकार के GEER फाउंडेशन बोर्ड और तकनीकी शिक्षा से जुड़ी एक राज्य समिति के सदस्य भी हैं. इन संस्थाओं के गैर-सरकारी सदस्यों को BJP की अगुवाई वाली राज्य सरकार द्वारा ही नामित किया जाता है. ऐसे में एक सवाल है कि अगर नाथवानी राज्यसभा चुनाव जीतते हैं तो क्या वे सपा सांसद रहते हुए भी इन पदों पर बने रह पाएंगे?

नाथवानी ने राज्यसभा में भेजे जाने के मौके के लिए अखिलेश के प्रति 'दिल से आभार' जताया और इसे अपने 'सार्वजनिक जीवन के नए दौर' की शुरुआत बताया.

अखिलेश ने इस चयन को 'नई पीढ़ी, नई सोच' बताया और इसे उद्योग जगत की ओर एक पहल के तौर पर पेश किया. इस पर रिलायंस ने कुछ नहीं कहा है और यह स्पष्ट नहीं है कि नाथवानी परिवार अपने कारोबारी प्रभाव को लेकर कोई रणनीति बना रहा है या नहीं.

दिलचस्प बात यह है कि परिमल नाथवानी ने झारखंड में एक दशक बिताया था और इसे अपनी 'कर्मभूमि' बताया था. इसके विपरीत धनराज का उत्तर प्रदेश से कोई पुराना संबंध नहीं है और न ही उन्होंने यह बताया है कि वे वहां क्या करना चाहते हैं. सवाल यह भी है कि सपा की राजनीति में वे कितने सक्रिय होंगे जबकि पार्टी का दायरा मुख्य तौर पर उत्तर प्रदेश तक ही सीमित है.

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 की शुरुआत में होने हैं. हालांकि नाथवानी परिवार के BJP के शीर्ष नेतृत्व के साथ लंबे और सार्वजनिक संबंध रहे हैं लेकिन सपा के सूत्र इसे अखिलेश के NDA के करीब आने की वजह नहीं मानते. उनका कहना है कि धनराज अपने फैसले खुद लेते हैं और अपनी अलग पहचान रखते हैं.

इस दिशा में लगाई जा रही अटकलों को उस समय विराम लगा जब अखिलेश को कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर हुए सड़क प्रदर्शन में देखा गया.

सपा की राजनीति 'पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक' वाले PDA गठबंधन पर टिकी है. ऐसे में रिलायंस के एक वरिष्ठ अधिकारी इसमें कहां फिट बैठते हैं, यह साफ नहीं है. हालांकि समाजवादी पार्टी पहले भी ऐसा कर चुकी है. अनिल अंबानी 2004 में सपा के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर राज्यसभा पहुंचे थे और दो साल बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया था. यह अमर सिंह के दौर की बात है जब पार्टी और कॉरपोरेट जगत के बीच करीबी संबंध थे. बाद में अमर सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया और यह दौर खत्म हो गया.

आने वाले महीनों में जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का प्रचार शुरू होगा तब BJP धनराज नाथवानी के प्रति क्या रुख अपनाती है. इससे पता चलेगा कि दिल्ली इसे देश के प्रमुख कारोबारी घरानों में से एक की ओर से जोखिम कम करने की कोशिश मानती है, नाथवानी परिवार की ओर से भरोसे का उल्लंघन मानती है या फिर एक रणनीतिक समझौता.

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