scorecardresearch
डार्क मोड

दतिया उपचुनाव में कांग्रेस की एकजुटता BJP की गलतियों पर कैसे पड़ी भारी?

मुख्यमंत्री मोहन यादव के लिए दतिया उपचुनाव काफी अहम था. माना जा रहा है कि दिग्गज नेता नरोत्तम मिश्रा को टिकट न देने की कीमत BJP को चुकानी पड़ी

दतिया उपचुनाव जीते कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह
अपडेटेड 4 अगस्त , 2026

संगठित चुनाव अभियान की बदौलत मध्य प्रदेश कांग्रेस ने विधानसभा उपचुनाव में दतिया सीट बरकरार रखी. इस कड़े मुकाबले में BJP की हार की एक बड़ी वजह उम्मीदवार चयन में हुई चूक भी मानी जा रही है.

दतिया के पूर्व राजघराने के सदस्य कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने BJP के आशुतोष तिवारी को 6,000 से अधिक वोटों से हराया. चुनाव की शुरुआत से ही यह मुकाबला चर्चा में आ गया क्योंकि BJP ने पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं दिया था. मिश्रा 2008 से लगातार तीन बार इस सीट से विधायक रहे थे लेकिन 2023 के चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती से हार गए थे. भारती को एक आपराधिक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद यह उपचुनाव कराना पड़ा.

इस नतीजे से सत्तारूढ़ BJP के लिए कई अहम सबक निकलते हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मिश्रा को टिकट न देना शीर्ष स्तर पर लिया गया फैसला था. माना जाता है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव और BJP के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल मिश्रा को उम्मीदवार बनाए जाने के पक्ष में नहीं थे.

अगर मिश्रा जीत जाते तो BJP का एक और वरिष्ठ नेता विधानसभा पहुंचता और आगे चलकर राज्य मंत्रिमंडल में जगह का दावेदार बन सकता था. BJP ने इसके बजाय मिश्रा की तरह ब्राह्मण नेता आशुतोष तिवारी पर दांव लगाया.

टिकट नहीं मिलने के बाद मिश्रा एक चुनावी सभा में, मुख्यमंत्री की मौजूदगी में ही भावुक हो गए थे. इससे पहले दतिया के BJP जिला अध्यक्ष ने विरोध में इस्तीफा दे दिया था जबकि मिश्रा के समर्थकों ने ग्वालियर-दतिया राजमार्ग जाम कर दिया था. प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े. इसके बाद मिश्रा ने एक सभा में कथित तौर पर दतिया के पुलिस अधीक्षक मयूर खंडेलवाल को चेतावनी देते हुए कहा था कि वे हमेशा “अपने दोस्तों और दुश्मनों को याद रखते हैं.”

हालांकि प्रदेश BJP को अंदरूनी नुकसान की आशंका थी फिर भी मिश्रा ने पार्टी उम्मीदवार के लिए प्रचार किया. हालांकि उनके बेटे ने प्रचार से दूरी बनाए रखी. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मिश्रा को टिकट नहीं देने की वजह से BJP को वोटों का नुकसान हुआ क्योंकि चुनाव प्रचार में भागीदारी कम होने के साफ संकेत मिले.

आशुतोष तिवारी ने हार स्वीकार करते हुए कहा कि इसकी वजहों का विश्लेषण किया जाएगा और सुधार के लिए जरूरी कदम उठाए जाएंगे. उनकी पार्टी के लिए संदेश साफ है. अगर मिश्रा को टिकट नहीं देने की वजह से BJP को वोटों का नुकसान हुआ है तो पार्टी के पुराने नेताओं की नाराजगी आगे भी सामने आ सकती है. 

BJP एक कैडर आधारित पार्टी है लेकिन इस चुनाव ने दिखाया कि नेतृत्व केंद्रित राजनीति का असर पार्टी की चुनावी संभावनाओं पर पड़ा है और उम्मीदवार बदलने से वोट हमेशा स्थानांतरित नहीं होते. दूसरा, इस उपचुनाव की रणनीति में शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे अनुभवी नेताओं की भूमिका नहीं रही.

इस उपचुनाव पर मुख्यमंत्री मोहन यादव का काफी कुछ राजनीतिक दांव पर लगा था लेकिन नतीजा उनके पक्ष में नहीं गया. दतिया के स्थानीय लोगों का कहना है कि आमतौर पर सत्तारूढ़ दल के उम्मीदवार को मिलने वाला प्रशासनिक समर्थन इस चुनाव में दिखाई नहीं दिया. 

वहीं, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अनुसूचित जाति (SC) के समर्थन की उम्मीद कर रहे आजाद समाज पार्टी के उम्मीदवार दामोदर यादव को करीब 22,000 वोट मिले लेकिन वे विजयी कांग्रेस उम्मीदवार के लिए चुनौती नहीं बन सके.

चुनाव प्रचार के शुरुआती दौर में BJP ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को उपचुनाव का प्रभारी बनाया था  लेकिन बाद में यह जिम्मेदारी ग्वालियर से सांसद भरत सिंह कुशवाह को दे दी गई. इसे पार्टी के भीतर तालमेल की कमी के तौर पर देखा गया. BJP ने दतिया के पूर्व राजघराने के एक अन्य सदस्य राहुल सिंह को भी घनश्याम सिंह के खिलाफ बयान देने के लिए प्रचार में उतारा, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ.

दूसरी ओर, कांग्रेस ने जैसे ही घनश्याम सिंह को उम्मीदवार घोषित किया, उसके पक्ष में माहौल बनने लगा. पार्टी में कभी दिवंगत माधवराव सिंधिया के करीबी माने जाने वाले घनश्याम सिंह 1993 और 2003 में दतिया से विधायक रह चुके हैं. 2008 में नरोत्तम मिश्रा के चुनावी राजनीति में आने के बाद उन्होंने यह सीट छोड़ दी थी.

घनश्याम सिंह और उनके परिवार की इलाके में अच्छी पकड़ है. कांग्रेस की सदस्य उनकी बेटी मांडवी ने शुरुआत से ही चुनाव प्रचार संभाल लिया था. चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में यह चर्चा भी चली कि राजेंद्र भारती की टीम कथित तौर पर BJP की मदद कर रही है. 

इसके बाद कांग्रेस नेतृत्व ने भारती को निलंबित कर दिया, जिससे पार्टी ने पहले की तुलना में अधिक निर्णायक रुख दिखाया. कांग्रेस ने बड़ी संख्या में अपने विधायकों को चुनावी जिम्मेदारी देकर अलग-अलग क्षेत्रों में तैनात किया.

कांग्रेस नेता अवधेश नायक, 2023 की तरह इस बार भी टिकट नहीं मिलने से नाराज थे. पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने सार्वजनिक रूप से नायक से माफी मांगी और उन्हें फिर से चुनाव प्रचार में लौटने के लिए तैयार किया. आखिरकार कांग्रेस ने एकजुट और समन्वित चुनाव अभियान चलाया जो BJP पर भारी पड़ा. अब 230 सदस्यीय विधानसभा में BJP के 164 विधायक हैं जबकि कांग्रेस की संख्या बढ़कर 65 हो गई है.

ADVERTISEMENT
Advertisement