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छत्तीसगढ़ : जहां पांच आरक्षित सीटें, वहां भी क्यों नहीं चल पाया राहुल का सामाजिक न्याय का फॉर्मूला!

चार जून को जारी हुए लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को कुल 11 में से महज एक लोकसभा सीट पर जीत मिली है

राहुल गांधी (फाइल फोटो)
राहुल गांधी (फाइल फोटो)
अपडेटेड 7 जून , 2024

इस साल फरवरी की 13 तारीख को राहुल गांधी छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में थे. ओबीसी और अनुसूचित जनजाति बहुल इस इलाके के अम्बिकापुर में उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए जनता से सवाल पूछा था कि सरकारी से लेकर प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों में उनकी भागीदारी कितनी है? 

दरअसल, राहुल गांधी इन सवालों के जरिए लोगों को जातिगत जनगणना का महत्व समझाने की कोशिश कर रहे थे. वे लोगों से वादा कर रहे थे कि 'इंडिया' सरकार बनने पर देश भर में जातिगत जनगणना होगी और 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी' की तर्ज पर लोगों को अवसर मिलेगा.

वैसे तो राहुल अपनी 'भारत जोड़ो न्याय यात्रा' के दौरान लगभग हर जगह यही सवाल दोहरा रहे थे. लेकिन छत्तीसगढ़ में जो ताजा आम चुनाव के नतीजे आए हैं उसको देखकर लगता है कि सामाजिक न्याय का 'राहुल गांधी फॉर्मूला' यहां के मतदाताओं ने खारिज कर दिया. राज्य में पांच आरक्षित लोकसभा सीटें हैं. इनमें से चार अनुसूचित जनजाति के लिए तो एक अनुसूचित जाति के लिए हैं. कांग्रेस को इन सभी पांच सीटों पर हार का सामना करना पड़ा है. इनमें वे सीटें भी शामिल हैं जहां से राहुल अपनी 'न्याय यात्रा' का काफिला लेकर गुजरे थे. 

पूरे छत्तीसगढ़ में कुल 11 लोकसभा सीटें हैं. 4 जून को जारी हुए नतीजों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इनमें से 10 सीटें जीतीं. जबकि कांग्रेस को एक मात्र कोरबा सीट पर विजय मिली. राज्य में कांग्रेस के इस लचर प्रदर्शन के बाद कहा जा सकता है कि मतदाताओं ने पार्टी के उस प्रचार अभियान को भी बहुत तवज्जो नहीं दी, जिसमें कहा जा रहा था कि अगर भाजपा तीसरी बार सत्ता में आती है तो वह आरक्षण खत्म कर देगी. 

इसके अलावा इन आरक्षित सीटों पर मतदाताओं में नाराजगी इस बात को लेकर भी थी कि मुख्यमंत्री रहते हुए भूपेश बघेल ने ओबीसी का आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी कर दिया था. हालांकि यह मामला हाई कोर्ट में उलझ कर रह गया. 

राहुल गांधी के न्याय यात्रा का पहला पड़ाव रायगढ़ ही रहा था. लेकिन इस लोकसभा सीट पर भाजपा के राधेश्याम राठिया ने कांग्रेस उम्मीदवार मेनका देवी सिंह को 2,40,391 वोटों के भारी अंतर से हराया है. यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित उन चार सीटों में से एक रही है जहां से कांग्रेस राज्य के निर्माण के बाद कभी नहीं जीत पाई है. हालांकि इस बार राहुल की न्याय यात्रा से कांग्रेस के नेताओं में आस जगी थी कि यह सीट जीती जा सकती है. लेकिन यह उम्मीद धरी की धरी रह गई. छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण 1 नवंबर, 2000 को हुआ था.  

रायगढ़ से ही सटी सरगुजा लोकसभा सीट पर भी कांग्रेस कोई कमाल नहीं दिखा सकी. यह सीट भी अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट है. यहां भी राहुल ने चुनावी अभियान के समय सामाजिक भागीदारी पर काफी जोर दिया था. छह महीना पहले जब यहां विधानसभा चुनाव हुआ, तब भी कांग्रेस को यहां से एक भी सीट नहीं मिल पाई थी. ताजा आम चुनाव में कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए चिंतामणि महाराज ने कांग्रेस उम्मीदवार शशी सिंह को 64,822 सीटों से पराजित कर दिया.

राज्य के उत्तरी भाग में स्थित इन दो आरक्षित सीटों के अलावा दक्षिणी छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस का प्रदर्शन निराशाजनक रहा. अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित यहां की दो सीटें बस्तर और कांकेर हैं. 2019 में हुए आम चुनाव में पार्टी ने बस्तर सीट पर जीत दर्ज की थी. लेकिन इस चुनाव में उसे हार का सामना करना पड़ा. पार्टी के उम्मीदवार कवासी लखमा इस सीट पर भाजपा के महेश कश्यप से 55,245 वोट से चुनाव हार गए. 

वहीं कांकेर सीट पर कांग्रेस ने 2019 की तुलना में अपना प्रदर्शन बेहतर ​तो किया लेकिन भाजपा के भोजराज नाग से पार्टी के उम्मीदवार ​बीरेश ठाकुर महज 1,884 वोट से हार गए. 2019 में कांग्रेस के ही टिकट पर बीरेश ठाकुर इसी सीट पर 6,914 वोटों से हारे थे.

राज्य की इन चार एसटी सीटों के अलावा अनुसूचित जाति के आरक्षित एक मात्र जांजगीर चांपा सीट पर भी कांग्रेस पिछड़ गई. छह माह पहले इस लोकसभा की सभी सात ​विधानसभा सीटों पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी. लेकिन जिन मतदाताओं ने कांग्रेस के सात विधायकों को इस लोकसभा क्षेत्र से चुना, उन्हीं मतदाताओं ने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार को सिरे से खारिज कर दिया.

दरअसल, मतदाताओं की नाराजगी कांग्रेस के उम्मीदवार शिव डहरिया से इसलिए भी थी क्योंकि दस साल पहले उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा था और हार के बाद कभी इस ​इलाके में दिखे ही नहीं. राज्य की कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे डहरिया को लेकर इस क्षेत्र के लोगों को उम्मीद थी कि कम से कम अब वे इस इलाके की सुध लेंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं. 

बहरहाल, बस्तर और कांकेर को छोड़ दें तो राहुल गांधी इन सभी आरक्षित सीटों पर अपने न्याय यात्रा का काफिला लेकर पहुंचे थे. इन एसटी और एससी बहुल सीटों को साधने के लिए राहुल ने 'गिनती करो' का फार्मूला देकर जातिगत जनगणना और अवसरों में हिस्सेदारी देने की बात कही थी. लेकिन चुनावी नतीजों को देखकर कहा जा सकता है कि राज्य के मतदाताओं ने उनके कहे पर भरोसा नहीं जताया.

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