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नैपकिन मशीनों से लेकर डिजिटल अटेंडेंस तक, बंगाल के सरकारी स्कूलों का होगा कायाकल्प

पश्चिम बंगाल के 80 हजार से ज्यादा स्कूलों के बुनियादी ढांचे और सुविधाओं में सुधार के लिए केंद्र से 2,700 करोड़ रुपए मिलने वाले हैं

India's top and bottom states for school infrastructure this year: UDISE 2025-26 Report
स्कूलों में सुविधाओं की कमी का असर छात्रों की उपस्थिति पर भी पड़ता है (सांकेतिक तस्वीर)
अपडेटेड 26 अगस्त , 2026

पश्चिम बंगाल की भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार को वित्त वर्ष 2026-27 के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड (PAB) फंड के तहत करीब 2,700 करोड़ रुपए मिलने वाले हैं. इससे पूरे राज्य में सरकारी और सरकारी मदद पाने वाले स्कूलों की बुनियादी सुविधाएं बेहतर करने और उनके कामकाज में सुधार के लिए बड़ी रकम उपलब्ध हो सकेगी.

इस फंड से शिक्षा के लिए मिलने वाली उस बड़ी रकम का इस्तेमाल हो सकेगा, जो केंद्र और पिछली तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार के बीच लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक टकराव के कारण अटकी हुई थी.

इस फंड में केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी तय है. कुल 2,700 करोड़ रुपए में से 60 फीसदी खर्च केंद्र सरकार उठाएगी, जबकि बाकी 40 फीसदी पश्चिम बंगाल सरकार देगी. स्कूल शिक्षा विभाग के सूत्रों ने बताया कि राज्य सरकार खर्च होने और रकम के इस्तेमाल की जानकारी दिए जाने के बाद आगे की किस्तें भी ले सकेगी.

इस फंड की अहमियत सिर्फ शुरुआती तौर पर मंजूर की गई रकम में नहीं है. असल बात यह है कि राज्य इससे स्कूलों में लंबे समय से चली आ रही कई बुनियादी सुविधाओं की कमी दूर करने की योजना बना रहा है. स्कूल शिक्षा विभाग इस रकम का इस्तेमाल क्लासरूम, टॉयलेट, पीने के पानी, बिजली और स्कूलों को छात्रों के लिए आसानी से इस्तेमाल करने लायक बनाने जैसी बुनियादी सुविधाओं पर करना चाहता है.

स्कूल शिक्षा विभाग के सर्व शिक्षा मिशन के राज्य प्रोजेक्ट डायरेक्टर विभु गोयल कहते हैं, "हमारे सभी स्कूलों में इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना हमारी प्राथमिकता है. अतिरिक्त क्लासरूम, लड़कियों के टॉयलेट, पानी की सप्लाई, हैंड रेल, बिजली और सोलर एनर्जी के जरिए बिजली की सप्लाई हमारी प्राथमिकता है."

प्रस्तावित खर्च का एक बड़ा हिस्सा उन सुविधाओं पर किया जाएगा, जिनका स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर की चर्चा में अक्सर ध्यान नहीं जाता. लेकिन इनका सीधा असर छात्रों की स्कूल में मौजूदगी और पढ़ाई जारी रखने पर पड़ता है. खासकर किशोरियों के लिए इन सुविधाओं की अहमियत ज्यादा है. सूत्रों ने बताया कि विभाग ने बंगाल के करीब 9,000 सीनियर और सीनियर सेकेंडरी स्कूलों में सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन लगाने का फैसला किया है.

पानी से जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर भी इस योजना का एक बड़ा हिस्सा है. राज्य सरकार स्कूलों में पानी की पाइपलाइन बिछाने के लिए अलग से करीब 500 करोड़ रुपये खर्च कर रही है. इससे पता चलता है कि सरकार पहले भरोसेमंद पानी की सप्लाई जैसी बुनियादी समस्या को दूर करना चाहती है और उसके बाद ज्यादा आधुनिक सुविधाओं पर ध्यान देगी.

PAB के फंड से कंपोजिट स्कूल ग्रांट को भी मदद मिलेगी. यह ग्रांट स्कूलों की रोजाना की देखरेख, कामकाज और छोटी-मोटी इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरतों के लिए होती है.

हाल ही में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने 80,375 सरकारी और सरकारी मदद पाने वाले स्कूलों को कंपोजिट स्कूल ग्रांट के तहत 296.64 करोड़ रुपए बांटे. इस ग्रांट का इस्तेमाल हर साल होने वाली जरूरतों के साथ-साथ छोटी-मोटी इंफ्रास्ट्रक्चर और रखरखाव की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाता है.

विभाग स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर को सुरक्षा और जवाबदेही के नजरिए से भी देख रहा है. स्कूलों में हैंड रेल और पंखे लगाने को प्राथमिकता दी गई है. खास तौर पर इसका मकसद स्कूल की इमारतों को छात्रों के लिए ज्यादा सुरक्षित और आसानी से इस्तेमाल करने लायक बनाना है.

इसी के साथ सरकार शिक्षकों और छात्रों की अटेंडेंस पर नजर रखने के लिए एक नई व्यवस्था शुरू करने की तैयारी कर रही है. राज्य सरकार पारंपरिक बायोमेट्रिक मशीनें लगाने के बजाय जियो-रेफरेंस्ड मोबाइल ऐप का इस्तेमाल करने की योजना बना रही है. ऐसी व्यवस्था केंद्रीय सरकारी कंपनियों और कम से कम एक दूसरे राज्य असम के स्कूलों में इस्तेमाल की जा रही है. इससे बायोमेट्रिक मशीनें लगाने का खर्च कम होगा.

प्रस्तावित व्यवस्था के तहत शिक्षकों को स्कूल पहुंचने पर अपने मोबाइल फोन से फोटो खींचकर अटेंडेंस लगानी होगी. जियो-रेफरेंसिंग से यह पता चल सकेगा कि फोटो स्कूल परिसर से ही ली गई है. इसी तरह की व्यवस्था का इस्तेमाल छात्रों की अटेंडेंस दर्ज करने के लिए भी किया जा सकता है.

विभाग में इस कदम को सिर्फ अटेंडेंस में सुधार के तौर पर नहीं देखा जा रहा है. अधिकारियों का मानना है कि स्कूल में मौजूद छात्रों का रियल टाइम रिकॉर्ड कल्याणकारी योजनाओं में होने वाली गड़बड़ी को रोकने में भी मदद कर सकता है. खास तौर पर मिड-डे मील योजना में इसका फायदा हो सकता है.

फिलहाल अधिकारी मानते हैं कि स्कूलों में मिड-डे मील की निगरानी में एक लगातार बनी रहने वाली समस्या यह है कि कागजों पर छात्रों की संख्या ज्यादा दिखाई जा सकती है. अगर छात्रों की अटेंडेंस डिजिटल तरीके से दर्ज की जाती है और उसकी जियो-रेफरेंसिंग होती है, तो स्कूलों के लिए असल में मौजूद छात्रों से ज्यादा संख्या दिखाकर ज्यादा छात्रों को योजना का लाभार्थी बताना काफी मुश्किल हो जाएगा.

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