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धूप बनी दौलत : बिजली की 'खेती' कैसे दूर कर रही बुंदेलखंड की बदहाली!

बुंदेलखंड की बंजर जमीन अब सोलर ऊर्जा का बड़ा केंद्र बन रही है. भीषण गर्मी के बीच उत्पादन बढ़ा है, किसान जमीन लीज पर देकर लाखों कमा रहे हैं

India's solar capacity additions have seen significant growth in the current fiscal year, with 38 GW installed in the first eleven months, according to a report by Kotak Institutional Equities
सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 29 मई , 2026

महोबा जिले के कबरई कस्बे की सुबह इन दिनों अलग दिखती है. सूरज निकलने से पहले ही यहां फैले सोलर पैनलों की कतारें चमकने लगती हैं. कुछ साल पहले तक यही इलाका पानी की कमी, बंजर जमीन और पलायन की कहानियों के लिए जाना जाता था. आज उसी जमीन से बिजली पैदा हो रही है.

22 मई को यहां ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर-2 परियोजना के तहत बने 220 केवी उपकेंद्र से पहली बार 70 मेगावाट सौर ऊर्जा प्रदेश के ग्रिड में भेजी गई. यह सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की बदलती तस्वीर का प्रतीक है.

भीषण गर्मी से जूझ रहे बुंदेलखंड में इन दिनों तापमान लगातार 46 डिग्री सेल्सियस के पार बना हुआ है. आम लोगों के लिए यह तपिश परेशानी का कारण है लेकिन सौर ऊर्जा क्षेत्र के लिए यही मौसम अवसर लेकर आया है. लंबे समय तक धूप मिलने से मई महीने में यहां सौर ऊर्जा उत्पादन में करीब 20 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है. सुबह जल्दी सूर्योदय और देर शाम तक सूर्य की रोशनी मिलने से प्लांटों का उत्पादन समय बढ़ गया है.

कभी सूखे और खेती संकट से परेशान रहने वाला बुंदेलखंड अब उत्तर प्रदेश की ऊर्जा रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बनता जा रहा है. बंजर और अनुपयोगी जमीन पर तेजी से सोलर प्लांट लगाए जा रहे हैं. उत्तर प्रदेश नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा विकास अभिकरण (यूपीनेडा) के आंकड़ों के मुताबिक इस क्षेत्र में करीब 25 हजार एकड़ जमीन पर सौर परियोजनाएं स्थापित हो चुकी हैं या निर्माणाधीन हैं. अभी यहां 885 मेगावाट यूटिलिटी स्केल सौर परियोजनाओं से बिजली उत्पादन हो रहा है जबकि हजारों मेगावाट क्षमता की नई परियोजनाएं पाइपलाइन में हैं.

कबरई मॉडल: गर्मी बनी उत्पादन की ताकत

कबरई का सोलर प्लांट इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल बन गया है. यहां बने नए उपकेंद्र के जरिए निजी कंपनी के प्लांट से 70 मेगावाट बिजली का सफल वितरण शुरू हुआ है. उत्तर प्रदेश पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPTCL) बुंदेलखंड में 4000 मेगावाट क्षमता के सोलर प्लांटों से बिजली निकासी के लिए 5400 करोड़ रुपए की लागत से 21 विद्युत उपकेंद्र विकसित कर रहा है. इनमें 10 उपकेंद्र चालू हो चुके हैं. UPPTCL के प्रबंध निदेशक मयूर महेश्वरी के मुताबिक, ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर-2 के तहत पहली बार सोलर प्लांट से हरित ऊर्जा की सफल निकासी प्रदेश की बिजली व्यवस्था के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि है. चरखारी, डकोर, बांगरा, बमौर, बिरधा, जैतपुर, हमीरपुर, बांदा और मड़ावरा जैसे उपकेंद्र जल्द शुरू होंगे। इससे बुंदेलखंड का पारेषण तंत्र और मजबूत होगा.

यूपीनेडा के वरिष्ठ परियोजना अधिकारी नरेंद्र कुमार बताते हैं कि गर्मी के मौसम में दिन बड़े होने का सीधा फायदा सौर उत्पादन को मिलता है. सर्दियों में जहां उत्पादन सुबह सात बजे के बाद शुरू होता है, वहीं गर्मियों में साढ़े पांच बजे से ही पैनल बिजली बनाना शुरू कर देते हैं. हालांकि तापमान बहुत अधिक बढ़ने पर उत्पादन प्रभावित भी होता है. विशेषज्ञों के अनुसार सोलर पैनल सिलिकॉन आधारित सेमीकंडक्टर से बनते हैं. जब तापमान 40 डिग्री से ऊपर जाता है तो पैनलों की कार्यक्षमता कम होने लगती है. 25 से 35 डिग्री सेल्सियस का तापमान सौर उत्पादन के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है. इसलिए सुबह और शाम के समय उत्पादन सबसे बेहतर रहता है.

जालौन में निजी सोलर प्लांट में काम कर रहे इंजीनियर सौरभ सिंह कहते हैं कि अगर दोपहर का तापमान 40 डिग्री से नीचे रहे तो उत्पादन में 30 फीसदी तक बढ़ोतरी संभव है. इसके बावजूद, लंबे समय तक धूप मिलने से कुल उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है.

बंजर जमीन बनी कमाई का जरिया

बुंदेलखंड में सोलर क्रांति का सबसे बड़ा असर किसानों की आय पर दिखाई दे रहा है. महोबा जिले के पनवाड़ी क्षेत्र में अवधेश प्रताप सिंह ने अपनी 30 एकड़ जमीन सोलर कंपनी को लीज पर दी है. पहले वह गेहूं और चना उगाते थे. खेती में जुताई, बुवाई, खाद और मजदूरी पर लाखों रुपए खर्च होते थे, ऊपर से नीलगाय और जंगली जानवर फसल बर्बाद कर देते थे. कई बार मेहनत के बाद भी आठ-दस लाख रुपए की आमदनी मुश्किल से हो पाती थी. अब उनकी जमीन पर 15 मेगावाट का सोलर प्लांट लगा है. कंपनी के साथ 29 साल 11 महीने के करार के तहत उन्हें प्रति एकड़ 50 हजार रुपए सालाना किराया मिल रहा है, जिसमें हर साल तीन फीसदी बढ़ोतरी भी तय है. बिना खेती किए उनकी सालाना आय करीब 15 लाख रुपए पहुंच गई है.

गरौरा के महेंद्र राजपूत और कनकुआ के दयाशंकर दुबे जैसे कई किसान भी इसी मॉडल से जुड़ चुके हैं. हालांकि कुछ किसानों की शिकायतें भी हैं. चित्रकूट के कोटवामाफी गांव के अमित सिंह पटेल का कहना है कि कंपनियां भुगतान किस्तों में करती हैं और कई बार समय पर पैसा नहीं मिलता. ऐसे विवादों के निपटारे के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में कमेटियां बनाई गई हैं.

जालौन बन रहा ऊर्जा राजधानी

बुंदेलखंड में जालौन सबसे तेजी से उभरते सोलर केंद्र के रूप में सामने आया है. पिछले पांच वर्षों में यहां 300 मेगावाट से अधिक क्षमता की परियोजनाएं स्थापित हुई हैं. इनमें लगभग 1500 करोड़ रुपए का निवेश हुआ है. जिला प्रशासन ने यहां करीब 23 हजार एकड़ भूमि का बैंक तैयार किया है, जिसमें बंजर और अनुपयोगी जमीन को सौर परियोजनाओं के लिए चिह्नित किया गया है. इसी भूमि बैंक के जरिए करीब 4000 मेगावाट बिजली उत्पादन की संभावनाएं विकसित की जा रही हैं. बीएसयूएल, कोल इंडिया और एनएलसी जैसी कंपनियों को यहां 2350 मेगावाट की परियोजनाओं के लिए जमीन दी गई है. अनुमान है कि आने वाले वर्षों में जालौन में 16 हजार करोड़ रुपए तक का निवेश हो सकता है. इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और पलायन में कमी आएगी. जालौन के डीएम राजेश कुमार पाण्डेय का मानना है कि जिस गति से यहां सौर परियोजनाएं विकसित हो रही हैं, उससे यह जिला आने वाले समय में उत्तर भारत के बड़े ऊर्जा केंद्रों में शामिल हो सकता है.

बुंदेलखंड की तेज धूप और उपलब्ध जमीन ने निजी कंपनियों को भी आकर्षित किया है. रिन्यूएबल एनर्जी कंपनी Avaada Energy चित्रकूट में 85 मेगावाट का सोलर प्रोजेक्ट लगाने जा रही है. कंपनी इस परियोजना में करीब 250 करोड़ रुपए का निवेश करेगी. कंपनी पहले से बदायूं में 70 मेगावाट और बांदा में 90 मेगावाट की परियोजनाएं चला रही है. Avaada के सीईओ टी.आर. किशोर नायर के अनुसार बुंदेलखंड में जमीन की उपलब्धता और सोलर रेडिएशन की स्थिति अन्य इलाकों की तुलना में बेहतर है. कंपनी उत्तर प्रदेश के लिए 590 मेगावाट का फर्म एंड डिस्पैचेबल रिन्यूएबल एनर्जी (FDRE) प्रोजेक्ट भी विकसित कर रही है, जिसमें 2500 मेगावाट-घंटा बैटरी स्टोरेज शामिल होगा. इससे शाम के समय भी सौर ऊर्जा की आपूर्ति संभव हो सकेगी.

सौर ऊर्जा से बदलती अर्थव्यवस्था

बुंदेलखंड में सौर परियोजनाओं का असर सिर्फ बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है. इन परियोजनाओं ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति दी है. सड़क, ट्रांसमिशन लाइन, सबस्टेशन और निर्माण कार्यों में बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों को रोजगार मिला है. जिन जमीनों को कभी अनुपयोगी माना जाता था, वे अब करोड़ों रुपए के निवेश का आधार बन रही हैं. निजी निवेशकों को स्टांप ड्यूटी और बिजली शुल्क में छूट जैसी सुविधाएं मिलने से कंपनियां तेजी से आगे आ रही हैं.

प्रदेश सरकार ने वर्ष 2026-27 के लिए 14 हजार मेगावाट सोलर पार्क क्षमता का लक्ष्य रखा है. इसके अलावा 4500 मेगावाट आवासीय रूफटॉप सोलर, 1500 मेगावाट सरकारी और व्यावसायिक रूफटॉप तथा 2000 मेगावाट पीएम कुसुम योजना के तहत सोलर पंप लगाने की योजना है. अभी प्रदेश में कुल 2876 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन हो रहा है, जबकि 4816 मेगावाट परियोजनाएं जल्द शुरू होने वाली हैं. इनमें सबसे बड़ा हिस्सा बुंदेलखंड का है.

हालांकि इस सोलर क्रांति के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं. जमीन अधिग्रहण, किसानों को समय पर भुगतान, ट्रांसमिशन नेटवर्क की क्षमता और अत्यधिक गर्मी में उत्पादन गिरना जैसी समस्याएं बनी हुई हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में बैटरी स्टोरेज और स्मार्ट ग्रिड तकनीक पर अधिक निवेश करना होगा, ताकि दिन में बनने वाली बिजली का बेहतर उपयोग हो सके. साथ ही स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाना भी जरूरी होगा.

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